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93 साल की मां बोलीं- घर में नहीं चाहिए बेटा, HC ने लगाई मुहर; Senior Citizen बेटे का भी नहीं है मां की इच्छा के खिलाफ रहने का अधिकार

93 साल की उम्र में जब अपना ही घर सुकून की जगह डर और तनाव का कारण बन जाए, तो कानून किसके साथ खड़ा होगा? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि केवल Senior Citizen होने के आधार पर बेटा अपनी 93 वर्षीय मां की इच्छा के खिलाफ उसके घर में रहने का असीमित अधिकार नहीं जता सकता। अदालत ने कहा कि Senior Citizens Act का मकसद सिर्फ भरण-पोषण कराना नहीं, बल्कि बुजुर्गों को सम्मान, सुरक्षा और शांतिपूर्ण जीवन देना भी है।

Sonali24 अग. 2026, 03:56 PM IST
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93 साल की मां बोलीं- घर में नहीं चाहिए बेटा, HC ने लगाई मुहर; Senior Citizen बेटे का भी नहीं है मां की इच्छा के खिलाफ रहने का अधिकार


93 साल की उम्र में जब एक मां ने अपने ही घर में बेटे और बहू से कथित उत्पीड़न और अपनी सुरक्षा को खतरा बताया, तो मामला अदालत तक पहुंचा। बेटे की ओर से संपत्ति के अधिकार और खुद Senior Citizen होने की दलील दी गई। लेकिन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि सिर्फ Senior Citizen होने की उम्र सीमा पूरी कर लेने से किसी व्यक्ति को दूसरे Senior Citizen की इच्छा के खिलाफ उसके घर में बने रहने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने Senior Citizens Act को बुजुर्गों की सुरक्षा, सम्मान और शांतिपूर्ण जीवन सुनिश्चित करने वाला कल्याणकारी कानून माना। यह फैसला इसलिए बेहद अहम है क्योंकि अदालत ने एक साथ दो महत्वपूर्ण पहलुओं को स्पष्ट किया है—पहला, Senior Citizens Act के तहत राहत केवल मासिक पैसे या maintenance तक सीमित नहीं है और दूसरा, संपत्ति के मालिकाना हक का विवाद लंबित होने मात्र से बुजुर्ग की सुरक्षा के लिए Tribunal की कार्रवाई रुक नहीं जाती।


मामला क्या है?

मामला बिलासपुर की Minocha Colony स्थित एक आवासीय संपत्ति से जुड़ा है। 93 वर्षीय Santosh Khanna ने Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 के तहत शिकायत की थी। रिकॉर्ड के मुताबिक वह घर के Ground Floor पर रहती थीं, जबकि उनके बेटे Devendra Khanna और बहू Neerja Khanna First Floor पर रह रहे थे। मां ने आरोप लगाया कि बेटे और बहू की ओर से उन्हें कथित तौर पर परेशान और प्रताड़ित किया जा रहा है तथा उन्हें अपनी जान की सुरक्षा को लेकर भी आशंका है। मां ने Tribunal के सामने केवल बेदखली की मांग ही नहीं की थी, बल्कि 25 लाख रुपये की राशि वापस दिलाने और 5 लाख रुपये मुआवजे की मांग भी की थी। दूसरी ओर बेटे और बहू ने मामले को मुख्य रूप से संपत्ति के मालिकाना हक का विवाद बताया और Tribunal के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया।


Maintenance Tribunal ने क्या आदेश दिया?

मामले में Sub-Divisional Officer (Revenue), Maintenance Tribunal ने 12 सितंबर 2024 को बेटे और बहू को विवादित आवासीय हिस्से से बाहर करने का आदेश दिया।

इसके खिलाफ अपील की गई, लेकिन District Magistrate-cum-Presiding Officer, Appellate Tribunal ने 25 नवंबर 2024 को Maintenance Tribunal का आदेश बरकरार रखा। इसके बाद बेटे और बहू ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।


बेटे की बड़ी दलील—संपत्ति मेरी है

याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि Maintenance Tribunal Civil Court नहीं है और वह जटिल title तथा ownership dispute का फैसला नहीं कर सकता।

बेटे की पत्नी Neerja Khanna ने एक हिस्से की जमीन पर registered sale deed के आधार पर अपना स्वतंत्र ownership claim भी बताया। याचिकाकर्ताओं ने revenue records में mutation को लेकर भी विवाद उठाया और कहा कि mutation अपने आप ownership या title साबित नहीं करता। उनकी ओर से यह भी कहा गया कि मां को pension मिलती है और उन्होंने नियमित monthly maintenance की मांग नहीं की है। इसलिए उनके खिलाफ eviction proceedings को Senior Citizens Act के तहत maintainable नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। पेंशन मिलने का मतलब यह नहीं कि बुजुर्ग को सुरक्षा की जरूरत नहीं

हाईकोर्ट ने माना कि किसी Senior Citizen के पास pension या अपनी आय होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसे harassment या abuse से सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि Senior Citizens Act में “maintenance” को केवल पैसे देने तक सीमित नहीं किया जा सकता। कानून का उद्देश्य बुजुर्गों को सम्मान, सुरक्षा और शांतिपूर्ण जीवन उपलब्ध कराना भी है। यही वह पहलू है जिसे पहले सामने आए इस मामले के न्यायिक रिकॉर्ड और स्वतंत्र रिपोर्टिंग ने भी रेखांकित किया है—आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बुजुर्ग भी अपने बच्चों या रिश्तेदारों से harassment, coercion या interference का सामना कर सकते हैं और ऐसी स्थिति में केवल pension मिलना उन्हें कानूनी संरक्षण से वंचित नहीं करता।


सबसे बड़ा सवाल: बेटा भी Senior Citizen है तो?

यही इस मामले का सबसे ज्यादा चर्चा में आने वाला पहलू है। याचिकाकर्ताओं में Devendra Khanna की उम्र 65 वर्ष और उनकी पत्नी Neerja Khanna की उम्र 62 वर्ष दर्ज है। यानी दोनों स्वयं Senior Citizen की श्रेणी में आते हैं। लेकिन अदालत ने यह स्वीकार नहीं किया कि Senior Citizen का दर्जा अपने आप किसी व्यक्ति को दूसरे Senior Citizen की residential property पर कब्जा बनाए रखने का superior right देता है। अर्थात कानून का उद्देश्य यह नहीं है कि “Senior Citizen” शब्द का इस्तेमाल करके एक बुजुर्ग दूसरे बुजुर्ग की इच्छा के खिलाफ उसके घर में रहने का अधिकार हासिल कर ले। अदालत की सोच का मूल आधार यह रहा कि कानून की protective jurisdiction का इस्तेमाल 93 वर्षीय मां की सुरक्षा, गरिमा और शांतिपूर्ण निवास सुनिश्चित करने के लिए किया जा सकता है। Title dispute से बुजुर्ग की सुरक्षा नहीं रुकेगी

फैसले का दूसरा बड़ा पहलू संपत्ति विवाद से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि Maintenance Tribunal किसी जटिल property title dispute का अंतिम फैसला कर सकता है। Ownership का अंतिम निर्धारण सक्षम Civil Court या अन्य competent forum में ही होगा। लेकिन अदालत ने साथ ही स्पष्ट किया कि केवल यह कह देना कि “मेरा भी property में title है” Senior Citizens Act के तहत protective proceedings को अपने आप खत्म नहीं कर देता। यानी दो अलग-अलग सवाल हैं: पहला—संपत्ति का असली मालिक कौन है? दूसरा—क्या 93 वर्षीय Senior Citizen को अपने घर में सुरक्षा और शांति से रहने के लिए तत्काल संरक्षण मिलना चाहिए? हाईकोर्ट ने माना कि दूसरे सवाल पर Tribunal protective relief दे सकता है, जबकि पहले सवाल का अंतिम फैसला सक्षम अदालत करेगी।


Mutation को लेकर भी अहम बात

याचिकाकर्ताओं ने revenue records में mutation का मुद्दा उठाया था। उनका कहना था कि mutation से किसी व्यक्ति को property का ownership right नहीं मिलता।

अदालत ने title dispute के इस पहलू को अलग रखा। यानी mutation या registered document से जुड़े जटिल सवालों का अंतिम निर्णय इस proceeding का उद्देश्य नहीं था। Tribunal का eviction order ownership declaration नहीं था, बल्कि Senior Citizen की protection के उद्देश्य से लिया गया welfare measure था।

इसलिए property dispute लंबित होने के बावजूद मां को राहत मिल सकती है—यही इस फैसले का बड़ा कानूनी संदेश है।


Senior Citizens Act आखिर देता क्या है?

Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 का उद्देश्य वृद्ध माता-पिता और Senior Citizens को neglect तथा abuse से संरक्षण देना और उनके welfare को सुनिश्चित करना है। केंद्र सरकार के आधिकारिक FAQ में भी Senior Citizens Act के तहत उपलब्ध संरक्षण और Tribunal mechanism का उल्लेख किया गया है। कानून का महत्व केवल “भरण-पोषण की रकम” तक सीमित नहीं है। अदालतों ने समय-समय पर इसकी welfare-oriented interpretation पर जोर दिया है।


सुप्रीम कोर्ट का हालिया रुख भी इसी दिशा में

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला किसी अलग-थलग कानूनी सोच का हिस्सा नहीं है। Senior Citizens Act के तहत eviction और Tribunal की powers को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल के फैसलों में महत्वपूर्ण बातें कही हैं। अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि Senior Citizens Act के तहत गठित Tribunal, जरूरत पड़ने पर Senior Citizen की maintenance, protection और dignity सुनिश्चित करने के लिए बच्चे या अन्य occupant को property से evict करने का आदेश दे सकता है। यह फैसला Justice P.S. Narasimha और Justice Alok Aradhe की Bench ने दिया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था कि Senior Citizens Act के तहत Tribunal को प्रभावी relief देने की शक्ति को इतना संकीर्ण नहीं पढ़ा जा सकता कि कानून का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाए। 2025 के Kamalakant Mishra मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि Senior Citizens Act के तहत Tribunal कुछ परिस्थितियों में बच्चे को Senior Citizen की property से evict कर सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि welfare legislation को उसके लाभकारी उद्देश्य को आगे बढ़ाने वाले तरीके से पढ़ा जाना चाहिए।


एक और महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट फैसला—S. Vanitha

हालांकि यहां एक जरूरी कानूनी अंतर समझना भी जरूरी है। S. Vanitha v. Deputy Commissioner मामले में सुप्रीम कोर्ट ने Senior Citizens Act और महिलाओं के shared household अधिकारों के बीच टकराव पर विचार किया था। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि Senior Citizens Act के तहत हर परिस्थिति में बिना किसी अन्य कानूनी अधिकार की जांच किए किसी occupant को बाहर किया जा सकता है। परिस्थितियां, दूसरे कानूनों के तहत अधिकार और मामले के तथ्य महत्वपूर्ण रहते हैं।

लेकिन Devendra Khanna मामले में हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल 93 वर्षीय मां की alleged harassment और peaceful residence की protection था।


फैसले का असर क्या होगा?

इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन मामलों पर पड़ सकता है जहां बुजुर्ग माता-पिता अपने ही घर में बच्चों या रिश्तेदारों के साथ विवाद के कारण असुरक्षित महसूस करते हैं।

फैसला यह नहीं कहता कि हर property dispute में बेटे या बेटी को तुरंत घर से निकाल दिया जाएगा। 

बल्कि इसका संदेश यह है कि:

• Senior Citizen होना अपने आप किसी दूसरे Senior Citizen की property पर रहने का असीमित अधिकार नहीं देता।

• Pension या आर्थिक आत्मनिर्भरता होने से बुजुर्ग का protection claim खत्म नहीं होता।

• Maintenance का अर्थ केवल monthly money नहीं है।

• Property title dispute और Senior Citizen की तत्काल सुरक्षा—दो अलग कानूनी प्रश्न हैं।

• Tribunal ownership का अंतिम फैसला किए बिना भी protective relief दे सकता है, यदि परिस्थितियां ऐसी राहत को उचित ठहराती हों।

• यदि किसी व्यक्ति का स्वतंत्र title claim है, तो वह सक्षम Civil/Revenue Court में उसे साबित कर सकता है।


देशभर में क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

देश में Senior Citizens से जुड़े property disputes लंबे समय से अदालतों के सामने आते रहे हैं। कई मामलों में माता-पिता अपनी संपत्ति बच्चों को transfer करने या उन्हें रहने की अनुमति देने के बाद neglect अथवा harassment का आरोप लगाते हैं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने भी Senior Citizens Act को केवल technical property law की तरह नहीं, बल्कि elderly welfare legislation के रूप में पढ़ने पर जोर दिया है। हालांकि हर मामला अपने facts पर निर्भर करेगा। विशेष रूप से जहां किसी occupant के पास स्वतंत्र ownership, co-ownership, inheritance या shared household जैसे अधिकारों का दावा हो, वहां संबंधित कानूनी अधिकारों की अलग से जांच जरूरी होगी।

 छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस मामले का सबसे मजबूत संदेश यही है कि उम्र का प्रमाणपत्र किसी को दूसरे बुजुर्ग की इच्छा के खिलाफ उसके घर में रहने का “लाइसेंस” नहीं देता। 93 वर्षीय मां ने जब अपने घर में कथित harassment और सुरक्षा के खतरे की शिकायत की, तो अदालत ने Senior Citizens Act के welfare objective को केंद्र में रखा। बेटे की Senior Citizen status, pension का सवाल और property title dispute—इनमें से कोई भी अपने आप मां की सुरक्षा और शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार को खत्म करने वाला आधार नहीं बना। यानी कानून की नजर में सवाल केवल यह नहीं है कि घर में रहने वाला व्यक्ति कितनी उम्र का है। असली सवाल यह भी है कि उस घर में रहने से 93 वर्षीय Senior Citizen की सुरक्षा, गरिमा और शांतिपूर्ण जीवन पर क्या असर पड़ रहा है।