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कुंभ के हजारों करोड़ पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी.बी. वराले का बड़ा सवाल: 0.1% शिक्षा पर खर्च होता तो बच सकते थे 100 से ज्यादा मराठी स्कूल

कुंभ जैसे विशाल आयोजनों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने एक ऐसा सवाल उठाया है, जिसने सरकारी प्राथमिकताओं पर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि बड़े धार्मिक आयोजनों और विकास परियोजनाओं पर खर्च से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन अगर इसी खर्च का महज 0.1 फीसदी हिस्सा शिक्षा पर लगाया जाता, तो महाराष्ट्र के 100 से अधिक मराठी स्कूल बंद होने से बच सकते थे। जस्टिस वराले ने आश्रमशालाओं की बदहाल स्थिति और बच्चों को आधुनिक, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने की जरूरत पर भी गंभीर चिंता जताई।

Sonali24 अग. 2026, 04:48 PM IST
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कुंभ के हजारों करोड़ पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी.बी. वराले का बड़ा सवाल: 0.1% शिक्षा पर खर्च होता तो बच सकते थे 100 से ज्यादा मराठी स्कूल

नासिक: 

 हजारों करोड़ रुपये के कुंभ इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास प्रोजेक्ट्स के बीच सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने शिक्षा के बजट और मराठी माध्यम के स्कूलों की हालत को लेकर ऐसा सवाल उठाया है, जिसने महाराष्ट्र में सरकारी खर्च की प्राथमिकताओं पर बहस तेज कर दी है। जस्टिस वराले ने कहा कि अगर कुंभ के लिए आवंटित राशि का सिर्फ 0.1 प्रतिशत भी शिक्षा पर खर्च किया जाता, तो राज्य के 100 से अधिक मराठी माध्यम के स्कूल बंद होने से बच सकते थे। जस्टिस वराले ने यह टिप्पणी 22 अगस्त 2026 को महाराष्ट्र में एक कार्यक्रम के दौरान की। वह अपने पुराने स्कूल से जुड़े कार्यक्रम में पहुंचे थे, जहां उन्होंने शिक्षा व्यवस्था, मराठी माध्यम के स्कूलों और विद्यार्थियों के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत पर विस्तार से बात की।

“मुझे हजारों करोड़ खर्च करने पर कोई आपत्ति नहीं”- जस्टिस वराले

जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले ने अपने संबोधन में साफ किया कि उन्हें सरकार द्वारा कुंभ या अन्य विकास परियोजनाओं पर पैसा खर्च किए जाने से आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार के पास बड़े-बड़े विकास कार्यों के लिए हजारों करोड़ रुपये उपलब्ध हैं, लेकिन शिक्षा के लिए अपेक्षित स्तर पर धन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक जस्टिस वराले ने कहा कि उपमुख्यमंत्री की ओर से कुंभ के लिए करीब 32,000 करोड़ रुपये और मुख्यमंत्री की ओर से करीब 34,000 करोड़ रुपये के खर्च का उल्लेख किया गया था। उन्होंने करीब 11,000 करोड़ रुपये की एक कॉरिडोर परियोजना का भी जिक्र किया। इसके बाद उन्होंने शिक्षा के लिए केवल 0.1 प्रतिशत राशि की कल्पना करते हुए कहा कि करीब 32 करोड़ रुपये शिक्षा पर लगाए जाते तो राज्य में बंद हो चुके 100 से 125 मराठी माध्यम के स्कूलों को बचाया जा सकता था। यानी जस्टिस वराले का मूल सवाल कुंभ के खर्च को रोकने का नहीं, बल्कि बड़े सरकारी बजट में शिक्षा को भी पर्याप्त प्राथमिकता देने का था।

कुंभ का आधिकारिक विकास प्लान कितना है?

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य भी समझना जरूरी है। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने 27 जुलाई 2026 को लोकसभा में बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए ₹22,425.39 करोड़ के व्यापक विकास प्लान को मंजूरी दी है। यह प्लान 13 मार्च 2026 को मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली Apex Committee की बैठक में मंजूर किया गया था। केंद्र सरकार को महाराष्ट्र सरकार की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक कुंभ के लिए 40 सदस्यीय Apex Committee और अलग Nashik-Trimbakeshwar Simhastha Kumbh Mela Authority भी बनाई गई है। लेकिन हालिया रिपोर्टिंग में कुंभ से जुड़े व्यापक आउटले का आंकड़ा ₹34,732 करोड़ बताया गया है, जिसमें करीब 85 प्रतिशत राशि स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च होने की बात कही गई है। 

जस्टिस वराले ने अपने जीवन का उदाहरण देकर समझाई क्षेत्रीय भाषा की अहमियत

इस बयान को और महत्वपूर्ण बनाता है जस्टिस वराले का अपना व्यक्तिगत अनुभव। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्थानीय नगरपालिका और जिला परिषद के मराठी माध्यम के स्कूलों में 10वीं कक्षा तक पढ़ाई की। उनके मुताबिक मराठी माध्यम से पढ़ाई करना उनके करियर में कभी बाधा नहीं बना। बल्कि उन्होंने कहा कि मराठी भाषा में शिक्षा ने उन्हें दूसरे लोगों को समझने और उनके प्रति भाईचारे की भावना विकसित करने में मदद की। उन्होंने संत ज्ञानेश्वर और कवि सुरेश भट के संदर्भ में भी क्षेत्रीय भाषा और मानवीय मूल्यों की बात रखी। यह बयान इसलिए खास है क्योंकि यह केवल एक जज की सरकारी स्कूलों को लेकर टिप्पणी नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश का अपना शैक्षणिक अनुभव भी है।

“बजट बढ़ना चाहिए था, लेकिन शिक्षा का हिस्सा घट गया”

जस्टिस वराले ने शिक्षा के बजट को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों की संख्या और शिक्षा की जरूरतें बढ़ने के बावजूद शिक्षा के लिए बजट आवंटन उस गति से नहीं बढ़ा। उन्होंने बताया कि पहले बजट में शिक्षा का हिस्सा करीब 8 से 12 प्रतिशत के बीच रहा है और बढ़ती जरूरतों को देखते हुए यह और बढ़ना चाहिए था। उनका जोर केवल स्कूल खोलने पर नहीं बल्कि मौजूदा स्कूलों को आधुनिक बनाने पर भी था। उन्होंने इंटरैक्टिव क्लासरूम, डिजिटल स्क्रीन, शुरुआती स्तर पर कंप्यूटर की सुविधा और आधुनिक प्रयोगशालाओं जैसे संसाधनों की जरूरत बताई।

आश्रमशालाओं की बदहाली पर जस्टिस वराले का दर्द

जस्टिस वराले ने महाराष्ट्र की आश्रमशालाओं की स्थिति को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने हाल की एक घटना का उल्लेख किया, जिसमें आश्रमशाला में छात्राओं के जमीन पर सोने और सांप के काटने से तीन छात्राओं की मौत का मामला सामने आया था। उन्होंने कहा कि कई आवासीय स्कूलों की स्थिति बेहद खराब है। यह महज एक उदाहरण नहीं था। गढ़चिरौली के जपतलाई आश्रम स्कूल के मामले में रिपोर्टों के अनुसार 9-10 अगस्त की रात छह छात्राओं को सांप ने काटा था, जिनमें तीन की मौत हो गई। रिपोर्टों के मुताबिक छात्राएं फर्श पर सो रही थीं। मामले में स्कूल के हेडमास्टर और हॉस्टल वार्डन को गिरफ्तार किया गया तथा संस्था से जुड़े अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया। यही घटना जस्टिस वराले के उस तर्क को गंभीर बनाती है कि शिक्षा का मतलब केवल किताब और क्लासरूम नहीं, बल्कि बच्चों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक आवासीय व्यवस्था भी है।

कुंभ पर इतना बड़ा खर्च क्यों?

नासिक-त्र्यंबकेश्वर में होने वाला सिंहस्थ कुंभ देश के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है। इसी कारण सरकार बड़े पैमाने पर सड़क, पुल, पानी, स्वच्छता, यातायात, सुरक्षा और अन्य नागरिक सुविधाओं के विकास पर काम कर रही है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार ₹34,732 करोड़ के व्यापक आउटले में लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा स्थायी इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च किया जाना प्रस्तावित है। यानी सरकार का तर्क है कि कुंभ के लिए किया जा रहा बड़ा खर्च केवल कुछ महीनों के आयोजन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नासिक और आसपास के क्षेत्रों में लंबे समय तक इस्तेमाल होने वाला इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करेगा। यह पहलू जस्टिस वराले की टिप्पणी को और दिलचस्प बनाता है। उनका सवाल विकास परियोजनाओं के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह है कि इसी तरह की प्राथमिकता शिक्षा के बुनियादी ढांचे के लिए क्यों नहीं दिखाई देती?

सिर्फ स्कूल बचाना नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था बदलने की जरूरत

जस्टिस वराले की टिप्पणी को केवल “100 स्कूल बचाने” तक सीमित करके देखना अधूरा होगा। उनके बयान में तीन बड़े मुद्दे सामने आते हैं— पहला, मराठी माध्यम के स्कूलों का अस्तित्व और क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा। दूसरा, सरकारी शिक्षा बजट में पर्याप्त निवेश। तीसरा, स्कूलों और आश्रमशालाओं में आधुनिक एवं सुरक्षित इंफ्रास्ट्रक्चर। यानी सवाल यह है कि क्या सरकार का शिक्षा बजट सिर्फ स्कूलों के संचालन तक सीमित रहे या उसमें भविष्य की शिक्षा व्यवस्था तैयार करने के लिए पर्याप्त निवेश भी हो?

कुंभ पर खर्च और शिक्षा—दोनों के बीच संतुलन का सवाल

यह भी महत्वपूर्ण है कि जस्टिस वराले ने कुंभ परियोजनाओं को गलत नहीं बताया। उनका बयान मूल रूप से “विकास बनाम शिक्षा” की लड़ाई नहीं है। बल्कि वह यह सवाल उठाता है कि जब सरकार हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं को वित्त दे सकती है, तो शिक्षा जैसे मूलभूत क्षेत्र के लिए अपेक्षाकृत छोटी अतिरिक्त राशि क्यों पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हो सकती? इसी संदर्भ में उनका 0.1 प्रतिशत वाला उदाहरण बेहद प्रभावी बन जाता है। करीब ₹32 करोड़—कुल हजारों करोड़ के मुकाबले बेहद छोटी राशि—और जस्टिस वराले के मुताबिक इससे 100 से अधिक मराठी माध्यम स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था।

बड़ी बात: जस्टिस वराले ने शिक्षा को बताया भविष्य का असली इंफ्रास्ट्रक्चर

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले का यह बयान महाराष्ट्र में शिक्षा की प्राथमिकताओं पर गंभीर बहस खड़ी कर सकता है।एक ओर नासिक को कुंभ के जरिए सड़क, पुल, पानी और दूसरी स्थायी सुविधाओं का बड़ा नेटवर्क मिलने जा रहा है। दूसरी ओर राज्य के कुछ स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और विद्यार्थियों की सुरक्षा तक के सवाल सामने आ रहे हैं। यही वह अंतर है जिस पर जस्टिस वराले ने ध्यान खींचा है। उनका संदेश साफ है—सड़क, पुल और कॉरिडोर जरूरी हैं, लेकिन बच्चों के लिए सुरक्षित स्कूल, आधुनिक कक्षाएं, डिजिटल शिक्षा, प्रयोगशालाएं और अच्छी आवासीय सुविधाएं भी किसी भी समाज का उतना ही महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले का बयान इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने किसी राजनीतिक मंच से नहीं, बल्कि एक शैक्षणिक कार्यक्रम में अपने व्यक्तिगत अनुभव और शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों के आधार पर सवाल उठाया है। उनका 0.1 प्रतिशत वाला उदाहरण एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है—जब सरकार हजारों करोड़ रुपये के विकास प्रोजेक्ट्स पर खर्च कर सकती है, तो क्या उसी विकास मॉडल में बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा के लिए भी पर्याप्त हिस्सा सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिए? कुंभ का इंफ्रास्ट्रक्चर नासिक को लंबे समय तक फायदा दे सकता है, लेकिन जस्टिस वराले का संदेश है कि स्कूलों में लगाया गया पैसा भी किसी समाज का सबसे स्थायी निवेश होता है। और शायद इसी वजह से उनका सवाल सिर्फ महाराष्ट्र के मराठी स्कूलों तक सीमित नहीं रहता—यह पूरे देश में सरकारी शिक्षा की प्राथमिकता और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल पर एक बड़ी बहस को जन्म देता है।