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10 साल की सजा के बाद तरुण तेजपाल की ‘सरेंडर’ पर सुप्रीम कोर्ट में जंग, कपिल सिब्बल vs तुषार मेहता की दलीलें
बरी होने से दोषी ठहराए जाने तक और अब जेल जाने से बचने की कोशिश तक—तरुण तेजपाल के 13 साल पुराने मामले में कानूनी लड़ाई का एक और बड़ा अध्याय शुरू हो गया है। 10 साल की सजा के बाद सवाल अब सिर्फ दोषसिद्धि का नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या तेजपाल को सरेंडर किए बिना सुप्रीम कोर्ट में अपनी चुनौती आगे बढ़ाने की इजाजत मिलेगी? इसी अहम सवाल पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई और अदालत ने आदेश सुरक्षित रख लिया।

नई दिल्ली:
13 साल पुराने चर्चित यौन उत्पीड़न मामले में पूर्व तहलका संपादक तरुण तेजपाल की मुश्किलें फिलहाल कम होती नजर नहीं आ रही हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ से 10 साल की कठोर कैद की सजा मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तेजपाल की उस अर्जी पर सोमवार, 24 अगस्त 2026 को सुनवाई हुई, जिसमें उन्होंने सजा के खिलाफ चुनौती देने से पहले सरेंडर करने से छूट मांगी है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की संक्षिप्त दलीलें सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया। मामले की सुनवाई जस्टिस अलोक अराधे के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान गोवा सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तेजपाल की याचिका की maintainability पर ही सवाल खड़ा कर दिया। वहीं, तेजपाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इसका विरोध करते हुए कहा कि हाईकोर्ट पहले ही उन्हें सरेंडर करने के लिए चार सप्ताह का समय दे चुका है।
गोवा सरकार का तर्क- पहले सरेंडर या फिर छूट की अर्जी जरूरी
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013 के Order XXII Rule 5 के तहत किसी दोषसिद्ध व्यक्ति की अपील में यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसने सरेंडर किया है या नहीं। गोवा सरकार का कहना था कि यदि दोषी ने अभी सरेंडर नहीं किया है तो उसे सरेंडर से छूट की अलग अर्जी के साथ अदालत का रुख करना होगा। सरकार के मुताबिक इन दोनों में से किसी एक प्रक्रिया का पालन किए बिना अपील को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यानी सरकार का मूल सवाल यह है कि जब किसी व्यक्ति को निचली अदालत या हाईकोर्ट से सजा मिल चुकी है और वह उस सजा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रहा है, तो क्या वह पहले सरेंडर किए बिना अपनी अपील आगे बढ़ा सकता है?
कपिल सिब्बल ने क्यों किया विरोध?
तरुण तेजपाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने गोवा सरकार की आपत्ति का विरोध किया। उनका तर्क था कि इस मामले में सामान्य नियम को उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि बॉम्बे हाईकोर्ट ने तेजपाल को सरेंडर करने के लिए पहले ही चार सप्ताह का समय दिया है। दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से संकेत दिया कि वह इस मुद्दे पर आदेश पारित करेगा। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक 24 अगस्त की cause list में भी तरुणजीत तेजपाल बनाम स्टेट ऑफ गोवा मामले में जस्टिस अलोक अराधे के समक्ष “Exemption from surrendering within time” का उल्लेख दर्ज है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला नवंबर 2013 का है। आरोप था कि तहलका के तत्कालीन प्रधान संपादक तरुण तेजपाल ने गोवा में आयोजित तहलका के एक कार्यक्रम के दौरान एक होटल की लिफ्ट में अपनी एक जूनियर महिला सहकर्मी का यौन उत्पीड़न किया। मामले में जांच और मुकदमे के बाद गोवा की ट्रायल कोर्ट ने 2021 में तेजपाल को बरी कर दिया था। इसके बाद गोवा सरकार ने इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
6 अगस्त को बॉम्बे हाईकोर्ट ने पलट दिया था बरी करने का फैसला
लगभग 13 साल पुराने इस मामले में 6 अगस्त 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने बड़ा फैसला सुनाया। जस्टिस नीला गोखले और जस्टिस अमित जामसंदेकर की पीठ ने ट्रायल कोर्ट के 2021 के बरी करने के फैसले को पलटते हुए तरुण तेजपाल को दोषी ठहराया और 10 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने संबंधित IPC प्रावधानों के तहत उन्हें बलात्कार, यौन उत्पीड़न और महिला के कपड़े उतारने के इरादे से हमला करने जैसे अपराधों के लिए दोषी ठहराया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने 10,21,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया, जिसे पीड़िता को दिए जाने का निर्देश दिया गया।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर क्यों जताई आपत्ति?
बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में ट्रायल कोर्ट की उस सोच की आलोचना की गई जिसमें शिकायतकर्ता के व्यवहार को कथित तौर पर एक “आदर्श पीड़िता” की अपेक्षाओं के आधार पर परखा गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि यौन हिंसा की पीड़िता से किसी एक तय तरीके से प्रतिक्रिया देने की उम्मीद नहीं की जा सकती। अदालत ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, जिनमें माफी वाले ईमेल और CCTV फुटेज सहित अन्य सामग्री शामिल थी, पर भी विचार किया। हाईकोर्ट ने 2021 के बरी करने वाले फैसले को बेहद कठोर शब्दों में खारिज किया और उसके निष्कर्षों को “perverse” बताया।
हाईकोर्ट ने उम्रकैद क्यों नहीं दी?
गोवा सरकार ने हाईकोर्ट के समक्ष तेजपाल को अधिकतम सजा यानी उम्रकैद देने की मांग की थी। लेकिन अदालत ने 10 साल की कठोर कैद को पर्याप्त माना। रिपोर्टों के अनुसार हाईकोर्ट ने इस बात को ध्यान में रखा कि घटना को लगभग 13 साल बीत चुके हैं और इसके बाद तेजपाल के खिलाफ किसी अन्य आपराधिक कदाचार की रिपोर्ट सामने नहीं आई। जिस प्रावधान के तहत उन्हें दोषी ठहराया गया, उसमें न्यूनतम 10 साल की सजा और उम्रकैद तक का प्रावधान था।
अब मामला सुप्रीम कोर्ट में दो तरफ से पहुंचा
हाईकोर्ट के फैसले के बाद तरुण तेजपाल ने खुद सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 20 अगस्त को उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के 6 अगस्त के फैसले और 10 साल की सजा को चुनौती दी।
दूसरी ओर, गोवा सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर सजा को 10 साल से बढ़ाकर उम्रकैद करने की मांग की है। हालांकि राज्य सरकार ने दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी है, बल्कि सजा बढ़ाने की मांग की है। इस तरह अब सुप्रीम कोर्ट के सामने मामले के दो अहम पहलू हैं—तेजपाल की ओर से दोषसिद्धि और सजा को चुनौती तथा गोवा सरकार की ओर से सजा बढ़ाकर उम्रकैद करने की मांग।
अभी सुप्रीम कोर्ट ने क्या तय किया है?
24 अगस्त की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अभी तेजपाल की दोषसिद्धि या 10 साल की सजा पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। सोमवार की सुनवाई फिलहाल इस सवाल पर केंद्रित रही कि सरेंडर किए बिना उनकी अपील/याचिका को आगे बढ़ाया जा सकता है या नहीं। कोर्ट ने इस मुद्दे पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने तेजपाल को सरेंडर से स्थायी राहत दे दी है।
13 साल बाद भी जारी है कानूनी लड़ाई
तरुण तेजपाल का यह मामला 2013 से लगातार न्यायिक प्रक्रिया में रहा है। 2021 में ट्रायल कोर्ट से बरी होने के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा और 6 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि सुनाते हुए 10 साल की सजा दी। अब अगस्त 2026 में यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट में अगला महत्वपूर्ण कदम इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत सरेंडर से छूट की मांग पर क्या आदेश देती है। इसके बाद तेजपाल की दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देने वाली अपील तथा गोवा सरकार की सजा बढ़ाने की मांग पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया का रास्ता स्पष्ट होगा।
