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पूर्व हाईकोर्ट जजों को बार काउंसिल में महिला सदस्य बनाने पर SC में संवैधानिक पेच, अनुच्छेद 220 पर सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

बार काउंसिल में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने की सुप्रीम कोर्ट की कोशिश अब एक बड़े संवैधानिक सवाल के सामने आ गई है। क्या किसी पूर्व हाईकोर्ट जज को महिला सदस्य के तौर पर स्टेट बार काउंसिल में को-ऑप्ट किया जा सकता है, या संविधान का अनुच्छेद 220 इसके आड़े आएगा? 24 अगस्त को CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ के सामने यही अहम सवाल उठा। अदालत ने संकेत दिया कि इस संवैधानिक पेच की जांच की जाएगी। यानी महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मुहिम अब Article 220, Article 142 और Advocates Act के बीच कानूनी टकराव की नई परीक्षा बन गई है।

Sonali24 अग. 2026, 06:30 PM IST
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पूर्व हाईकोर्ट जजों को बार काउंसिल में महिला सदस्य बनाने पर SC में संवैधानिक पेच, अनुच्छेद 220 पर सुप्रीम कोर्ट करेगा विचार

नई दिल्ली: 

स्टेट बार काउंसिल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के सुप्रीम कोर्ट के प्रयास के बीच अब एक अहम संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। सवाल यह है कि क्या किसी पूर्व हाईकोर्ट जज को स्टेट बार काउंसिल में महिला सदस्य के रूप में को-ऑप्ट किया जा सकता है, जबकि संविधान का अनुच्छेद 220 पूर्व स्थायी हाईकोर्ट जज को संबंधित अदालत में प्रैक्टिस करने से रोकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 24 अगस्त 2026 को संकेत दिया कि वह इस संवैधानिक प्रश्न पर विचार करेगा। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने छह स्टेट बार काउंसिलों की ओर से इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने अदालत के सामने यह सवाल रखा कि अगर पूर्व हाईकोर्ट जज को उसी न्यायिक क्षेत्र की स्टेट बार काउंसिल में सदस्य बनाया जाता है तो क्या यह संविधान के अनुच्छेद 220 में लगाए गए प्रतिबंध के दायरे में आएगा। यह विवाद केवल एक नियुक्ति तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बार काउंसिलों में महिलाओं के 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछले साल से जारी निर्देशों की पूरी श्रृंखला है।

आखिर पूरा मामला शुरू कहां से हुआ?

मामला Yogamaya M.G. v. Union of India से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में स्टेट बार काउंसिलों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए 30 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। 8 दिसंबर 2025 के आदेश के तहत व्यवस्था को इस तरह आगे बढ़ाया गया कि कुल 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व में 20 प्रतिशत हिस्सा चुनाव के माध्यम से और 10 प्रतिशत हिस्सा co-option के जरिए सुनिश्चित किया जा सके। इसका मकसद यह था कि चुनावी प्रक्रिया में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम रहने की स्थिति में भी बार काउंसिल की निर्णय लेने वाली संस्था में महिलाओं की पर्याप्त मौजूदगी सुनिश्चित हो। बाद में इस व्यवस्था के क्रियान्वयन को लेकर कई आवेदन सुप्रीम कोर्ट के सामने आने लगे। अलग-अलग पक्षों की ओर से co-option की प्रक्रिया, उम्मीदवारों की पात्रता और चयन के तरीके को लेकर सवाल उठाए गए।

Justice Sudhanshu Dhulia Committee की भी हुई भूमिका

विवाद बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मामलों की निगरानी के लिए Justice Sudhanshu Dhulia की अध्यक्षता वाली High-Powered Election Supervisory Committee की भूमिका तय की। समिति को चुनाव और co-option से संबंधित मुद्दों पर विचार करने का काम सौंपा गया। इस दौरान बार काउंसिलों की संरचना और महिलाओं की भागीदारी से जुड़े विभिन्न पहलू अदालत के सामने आते रहे। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने सोमवार को सुनवाई के दौरान इसी व्यापक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कहा कि अदालत ने पहले के आदेश पारित करते समय कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं, जिनमें Dhulia Committee की रिपोर्ट भी शामिल है, पर पर्याप्त विचार नहीं किया।

4 अगस्त के आदेश ने विवाद को नया मोड़ दिया

4 अगस्त 2026 को CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने स्टेट बार काउंसिलों में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए co-option की प्रक्रिया को और स्पष्ट किया। अदालत ने प्रत्येक स्टेट बार काउंसिल में दो महिला सदस्यों को co-opt करने की व्यवस्था बताई। इनमें पूर्व महिला हाईकोर्ट जज और वरिष्ठ महिला अधिवक्ता जैसे उम्मीदवारों को शामिल किए जाने की व्यवस्था सामने आई। नामांकन की प्रक्रिया में संबंधित हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की भूमिका भी रखी गई।

इसी व्यवस्था के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह सामने आया है कि यदि किसी पूर्व हाईकोर्ट जज को बार काउंसिल में सदस्य बनाया जाता है तो क्या वह Article 220 की संवैधानिक सीमा से प्रभावित होगा।

“Men's Club” वाली टिप्पणी भी रही चर्चा में

महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी चिंता व्यक्त की थी। 4 अगस्त की सुनवाई के दौरान बार काउंसिलों को लेकर अदालत की ओर से “men's clubs” वाली टिप्पणी व्यापक रूप से चर्चा में रही। अदालत का जोर यह था कि कानूनी पेशे में महिलाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व उसी अनुपात में दिखाई नहीं देता। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए चुनावी व्यवस्था के साथ-साथ co-option का रास्ता भी अपनाया।

अब Article 220 का असली सवाल क्या है?

संविधान का अनुच्छेद 220 स्थायी हाईकोर्ट जज के पद पर रह चुके व्यक्ति के लिए पेशेवर प्रतिबंध निर्धारित करता है। इसके तहत ऐसा व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट और अन्य हाईकोर्ट को छोड़कर किसी कोर्ट या authority के सामने plead या act नहीं कर सकता। यहीं से सोमवार की सुनवाई में महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न पैदा हुआ। यदि किसी पूर्व हाईकोर्ट जज को स्टेट बार काउंसिल का सदस्य बनाया जाता है, तो क्या बार काउंसिल की सदस्यता या उसके कार्य Article 220 में इस्तेमाल किए गए “authority” और “act” जैसे शब्दों के दायरे में आएंगे? अभी सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का अंतिम उत्तर नहीं दिया है। यही सावधानी खबर में जरूरी है—अदालत ने पूर्व जजों को बार काउंसिल में शामिल करना असंवैधानिक घोषित नहीं किया है, बल्कि इस संभावित संवैधानिक टकराव पर विचार करने की बात कही है।

Article 142 बनाम Advocates Act का सवाल

सुनवाई में एक दूसरा महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा भी उठा। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने सवाल किया कि क्या सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत ऐसी व्यवस्था बना सकता है जो Advocates Act में मौजूद वैधानिक व्यवस्था से अलग हो। Article 142 सुप्रीम कोर्ट को “complete justice” के लिए व्यापक आदेश पारित करने की शक्ति देता है। लेकिन इस शक्ति की सीमा और उसका संसद द्वारा बनाए गए कानून के साथ संबंध लंबे समय से संवैधानिक न्यायशास्त्र का महत्वपूर्ण विषय रहा है। पारिख की दलील का सार यह था कि महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की कोशिश अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके लिए बनाई गई व्यवस्था को मौजूदा वैधानिक ढांचे और संवैधानिक प्रतिबंधों के साथ भी परखा जाना चाहिए।

CJI सूर्यकांत ने क्या जवाब दिया?

CJI सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान बताया कि सुप्रीम कोर्ट को co-option के तरीके को लेकर लगातार आवेदन और नई-नई मांगें मिल रही थीं। अदालत के सामने हर दिन नई application और नए criteria सुझाए जा रहे थे, जिससे व्यवस्था को लागू करना मुश्किल हो रहा था। CJI ने यह भी रेखांकित किया कि अदालत का उद्देश्य महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना था और इस उद्देश्य का व्यापक रूप से स्वागत किया गया था। इससे साफ है कि अदालत फिलहाल महिला प्रतिनिधित्व के मूल उद्देश्य से पीछे हटने के बजाय उसके implementation को संवैधानिक और वैधानिक ढांचे के भीतर व्यवस्थित करने की कोशिश कर रही है।

13 अगस्त को महिला उम्मीदवारों ने भी उठाया था सवाल

इस मामले में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम 13 अगस्त 2026 को सामने आया। दो महिला उम्मीदवारों ने, जिन्हें बार काउंसिल चुनाव में छठा और सातवां स्थान मिला था, 4 अगस्त के co-option mechanism को लेकर reconsideration/recall की मांग की। उनका तर्क था कि जिन उम्मीदवारों पर इस व्यवस्था का प्रभाव पड़ता है, उन्हें पर्याप्त सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए। इस घटनाक्रम ने भी यह सवाल महत्वपूर्ण बना दिया कि चुनाव में पहले से मौजूद महिला उम्मीदवारों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित co-option mechanism के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए।

सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था क्यों जरूरी मानी गई?

बार काउंसिल चुनावों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। कानूनी पेशे में महिला अधिवक्ताओं की संख्या बढ़ने के बावजूद कई State Bar Councils में निर्वाचित महिला प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम रहा है। सुप्रीम कोर्ट का 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का प्रयास इसी अंतर को कम करने की कोशिश है।

लेकिन अब अदालत को यह तय करना होगा कि प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए अपनाया गया co-option mechanism संविधान के Article 220 और Advocates Act के साथ किस तरह सामंजस्य बैठाता है।

मामला अब किस दिशा में जा सकता है?

24 अगस्त की सुनवाई के बाद फिलहाल तीन बड़े कानूनी प्रश्न सामने हैं— पहला, क्या पूर्व हाईकोर्ट जज को State Bar Council का co-opted member बनाया जाना Article 220 के प्रतिबंध के दायरे में आता है? दूसरा, क्या Bar Council की सदस्यता को ऐसी authority के सामने “act” करना माना जा सकता है, जैसा Article 220 में उल्लेख है?

तीसरा, क्या सुप्रीम कोर्ट Article 142 के तहत Advocates Act में मौजूद व्यवस्था के अतिरिक्त ऐसा mechanism निर्धारित कर सकता है? इन सवालों का जवाब केवल वर्तमान co-option प्रक्रिया के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं होगा, बल्कि भविष्य में Bar Councils में महिला प्रतिनिधित्व और पूर्व न्यायाधीशों की भूमिका से जुड़े मामलों के लिए भी मिसाल बन सकता है।

अभी क्या तय हुआ है?

फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व हाईकोर्ट जजों को बार काउंसिल का सदस्य बनाए जाने पर रोक लगा दी है। 24 अगस्त 2026 को अदालत ने केवल Article 220 से जुड़े संवैधानिक प्रश्न पर विचार करने की बात कही है। अंतिम निर्णय आने तक 4 अगस्त की महिला प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित नहीं माना जा सकता। यानी इस समय मामला “नियुक्ति पर रोक” का नहीं, बल्कि “संवैधानिक सीमा की व्याख्या” का है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

यह मामला भारतीय कानूनी व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण उद्देश्यों के बीच संतुलन का उदाहरण बन गया है—एक तरफ Bar Councils में महिलाओं का वास्तविक और प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना और दूसरी तरफ संविधान तथा Advocates Act में निर्धारित सीमाओं का पालन करना। यदि सुप्रीम कोर्ट Article 220 की व्याख्या करते हुए पूर्व हाईकोर्ट जजों की Bar Council membership को वैध मानता है, तो co-option mechanism को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकता है। वहीं, यदि अदालत Article 220 को व्यापक रूप से लागू मानती है, तो महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए वैकल्पिक उम्मीदवारों या नए mechanism पर विचार करना पड़ सकता है। इसलिए 24 अगस्त की सुनवाई केवल Bar Council की नियुक्तियों से जुड़ा विवाद नहीं है, बल्कि Article 220, Article 142 और Advocates Act के आपसी संबंध की संवैधानिक व्याख्या के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।