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अलग रहने के बाद पति-पत्नी में शारीरिक संबंध से पुरानी वैवाहिक क्रूरता माफ नहीं हो जाती: कलकत्ता हाईकोर्ट

पति-पत्नी अलग हो चुके हों, रिश्ते में कड़वाहट हो और इसके बावजूद कुछ मौकों पर दोनों फिर साथ रहें या उनके बीच शारीरिक संबंध बनें—क्या इससे पहले की गई वैवाहिक क्रूरता कानूनी तौर पर ‘माफ’ मानी जाएगी? कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस बेहद संवेदनशील सवाल पर अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि जवाब हर बार ‘हां’ नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि अलगाव के बाद पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंधों के कुछ अलग-अलग उदाहरण अपने आप पुरानी क्रूरता को माफ कर देने के बराबर नहीं हैं।

Sonali24 अग. 2026, 06:31 PM IST
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अलग रहने के बाद पति-पत्नी में शारीरिक संबंध से पुरानी वैवाहिक क्रूरता माफ नहीं हो जाती: कलकत्ता हाईकोर्ट

कोलकाता: 

पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद के बाद कुछ समय के लिए दोबारा साथ रहना या शारीरिक संबंध बनना यह साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि पहले की गई वैवाहिक क्रूरता को माफ कर दिया गया था। कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण वैवाहिक विवाद में यह स्पष्ट करते हुए पति को मिली तलाक की डिक्री बरकरार रखी है।

जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य की डिवीजन बेंच ने कहा कि अलगाव के बाद पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंधों के कुछ अलग-अलग उदाहरण अपने आप में पहले की क्रूरता को ‘condone’ यानी क्षमा कर देने के बराबर नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि माफी या क्षमादान पूर्ण और बिना शर्त नहीं होता, बल्कि आगे क्रूरता दोहराई न जाए, इस शर्त से जुड़ा होता है।

क्या था पूरा मामला?

पति और पत्नी ने 18 जून 2009 को Special Marriage Act के तहत विवाह किया था। अप्रैल 2013 में उनके यहां बच्चे का जन्म हुआ। इसके बाद वैवाहिक विवादों के चलते वर्ष 2014 में दोनों अलग रहने लगे। पति ने बाद में फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की। उसका आरोप था कि पत्नी ने उसके और उसके परिवार के खिलाफ बार-बार गंभीर और झूठे आरोप लगाए, आपराधिक शिकायतें कीं और उस पर अपनी आश्रित विधवा मां से अलग रहने का दबाव बनाया। फैमिली कोर्ट ने दिसंबर 2021 में पति के पक्ष में मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की डिक्री पारित कर दी। इसके बाद पत्नी ने इस फैसले को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पत्नी की दलील- अगर माफ नहीं किया तो दोबारा साथ क्यों रहे?

हाईकोर्ट में पत्नी की ओर से दलील दी गई कि अलग होने के बाद वह कई बार अपने पति के पास वापस गई और प्रत्येक बार करीब 7-8 दिन तक पति-पत्नी की तरह साथ रही। इस दौरान उनके बीच वैवाहिक संबंध भी बने। पत्नी का तर्क था कि यदि पति वास्तव में उसके कथित आचरण को क्रूरता मानता था, तो वह उसके साथ दोबारा क्यों रहा? उसके अनुसार, यह आचरण इस बात का संकेत था कि पति ने पहले की कथित क्रूरता को माफ कर दिया था। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा- ‘कुछ दिन साथ रहना’ माफी नहीं

डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि अलगाव के बाद पति-पत्नी के बीच कभी-कभार साथ रहने या शारीरिक संबंध बनाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पहले की वैवाहिक क्रूरता पूरी तरह माफ कर दी गई। कोर्ट के अनुसार, अलगाव के बाद शारीरिक संबंधों के अलग-अलग मामलों के कई संभावित कारण हो सकते हैं। इसलिए केवल ऐसे संबंधों के आधार पर ‘condonation’ का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पति-पत्नी का कभी-कभार साथ रहना अपने आप में क्रूरता की माफी नहीं माना जा सकता।

‘Condonation’ का मतलब क्या है?

वैवाहिक कानून में ‘condonation’ का अर्थ सामान्य तौर पर किसी वैवाहिक अपराध या क्रूरता को माफ कर देना और वैवाहिक संबंध को जारी रखने की इच्छा से जुड़ा है।

लेकिन हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण बात कही कि यह माफी बिना शर्त नहीं होती। यदि जिस पति या पत्नी के आचरण को माफ किया गया है, वह बाद में फिर क्रूरता करता है, तो पहले की माफी का कानूनी प्रभाव समाप्त हो सकता है। यानी केवल यह तथ्य कि पति-पत्नी ने किसी समय फिर से साथ समय बिताया या शारीरिक संबंध बनाए, पहले के गंभीर आरोपों को स्वतः खत्म नहीं कर देता।

गंभीर और बेबुनियाद आरोप भी मानसिक क्रूरता हो सकते हैं

कोर्ट ने मामले में पत्नी द्वारा पति और उसके परिवार पर लगाए गए कई गंभीर आरोपों को भी देखा। इनमें दहेज की मांग, उसके मायके की संपत्ति के दुरुपयोग, जबरन गर्भपात और सास द्वारा बच्चे के साथ अनुचित व्यवहार जैसे आरोप शामिल थे। हाईकोर्ट ने पाया कि इन गंभीर आरोपों के समर्थन में पर्याप्त विश्वसनीय सामग्री नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी पति या पत्नी पर गंभीर, निराधार और असत्यापित आरोप लगाए जाते हैं, जो उसकी प्रतिष्ठा या चरित्र को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं और उसे मानसिक पीड़ा पहुंचाते हैं, तो ऐसे आरोप स्वयं मानसिक क्रूरता का आधार बन सकते हैं।

सास से अलग रहने की मांग पर भी कोर्ट की अहम टिप्पणी

पत्नी ने यह भी मांग की थी कि उसका पति अपनी आश्रित विधवा मां से अलग होकर रहे। इस मांग के पीछे उसने अपनी सास पर गंभीर आरोप लगाए थे और दावा किया था कि सास ने उनके नाबालिग बेटे के साथ अनुचित यौन व्यवहार किया था। हालांकि कोर्ट को इस आरोप के समर्थन में कोई दस्तावेज, गवाह या उस समय की कोई शिकायत नहीं मिली। कोर्ट ने कहा कि आधुनिक समाज में पत्नी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह अनिवार्य रूप से पति और उसके परिवार की सेवा करे। लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अलग रहने की मांग को भी परिस्थितियों से पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता। अदालत ने टिप्पणी की कि उदार दृष्टिकोण को इस हद तक नहीं ले जाया जा सकता कि वह स्वयं एक रूढ़िवादी धारणा में बदल जाए।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने सिद्धांत से भी जुड़ा है फैसला

इस फैसले का महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने ‘condonation’ और अलगाव के बाद शारीरिक संबंधों को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा विकसित सिद्धांतों को लागू किया। फैसले में Supreme Court के Dr. N.G. Dastane मामले सहित वैवाहिक क्रूरता से जुड़े फैसलों के सिद्धांतों पर चर्चा की गई है। Dastane के संदर्भ में यह अंतर महत्वपूर्ण है कि लंबे समय तक सामान्य वैवाहिक जीवन और अंतरंग संबंध बनाए रखना कुछ परिस्थितियों में क्षमा और वैवाहिक संबंध बहाल करने की मंशा दिखा सकता है, जबकि अलग होने के बाद केवल एक-दो या कुछ अलग-अलग शारीरिक संबंधों का अर्थ स्वतः ऐसा नहीं माना जा सकता।

फैमिली कोर्ट का तलाक बरकरार

पूरे मामले के तथ्यों और दोनों पक्षों के आचरण को देखते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने पति के पक्ष में पारित तलाक की डिक्री में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी स्थायी गुजारा भत्ता यानी permanent alimony के लिए स्वतंत्र रूप से उचित कानूनी उपाय अपना सकती है।

फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि वैवाहिक संबंधों में ‘माफी’ का निर्धारण केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि अलग होने के बाद पति-पत्नी कभी फिर साथ रहे या उनके बीच शारीरिक संबंध बने। अदालत पूरे वैवाहिक जीवन, आरोपों की प्रकृति, उनके समर्थन में उपलब्ध साक्ष्य, बाद के आचरण और दोनों पक्षों के बीच संबंधों की वास्तविक स्थिति को समग्र रूप से देखेगी। इसलिए अलगाव के बाद पति-पत्नी के बीच बना कोई एक या कुछ शारीरिक संबंध अपने आप पहले की मानसिक क्रूरता के कानूनी प्रभाव को समाप्त नहीं करता।