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सुप्रीम कोर्ट की ‘समाधान’ पहल का बड़ा असर: 3 दिन में 1,712 मुकदमे खत्म, ₹240.94 करोड़ का निपटारा; CJI सूर्यकांत का ‘दोनों पक्ष जीतें’ मॉडल

लंबी तारीखों, बढ़ते मुकदमों और वर्षों के इंतजार के बीच सुप्रीम कोर्ट ने ‘समाधान’ का नया रास्ता दिखाया है। 21 से 23 अगस्त तक चली स्पेशल लोक अदालत में 1,712 मामलों का निपटारा हुआ और ₹240.94 करोड़ से अधिक की राशि वितरित की गई। खास बात यह रही कि यह सिर्फ तीन दिन की कवायद नहीं थी—CJI सूर्यकांत की अगुवाई में अप्रैल से ही मामलों की पहचान और समझौते की तैयारी शुरू कर दी गई थी, ताकि अदालत से निकलते समय कोई खुद को हारा हुआ नहीं, बल्कि समाधान का विजेता महसूस करे।

Sonali25 अग. 2026, 02:21 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट की ‘समाधान’ पहल का बड़ा असर: 3 दिन में 1,712 मुकदमे खत्म, ₹240.94 करोड़ का निपटारा; CJI सूर्यकांत का ‘दोनों पक्ष जीतें’ मॉडल

नई दिल्ली: 

सुप्रीम कोर्ट में लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने और विवादों को अदालत के लंबे चक्कर से बाहर निकालकर सहमति से सुलझाने की दिशा में SAMADHAN SAMAROH 2026 ने बड़ा परिणाम दिया है। 21 से 23 अगस्त तक चली तीन दिवसीय स्पेशल लोक अदालत में कुल 3,285 मामले सूचीबद्ध किए गए और 1,712 मामलों का निपटारा हुआ। इस दौरान ₹2,40,94,37,087.38 यानी करीब ₹240.94 करोड़ की राशि वितरित की गई।

CJI सूर्यकांत का बड़ा संदेश- दोनों पक्षों को लगे कि हम जीते हैं

इस पूरी पहल को समझने के लिए CJI सूर्यकांत का मध्यस्थता को लेकर हालिया दृष्टिकोण बेहद महत्वपूर्ण है। SAMADHAN SAMAROH पर बात करते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि इसका उद्देश्य ऐसे विवादों की पहचान करना है जिनमें पक्षकार आपसी सहमति और मध्यस्थता के जरिए समाधान तक पहुंच सकते हैं। CJI सूर्यकांत के मुताबिक लंबे समय तक चलने वाली मुकदमेबाजी का असर केवल अदालत और फाइलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे पक्षकारों पर आर्थिक बोझ, तनाव और उनके पारिवारिक तथा सामाजिक संबंधों पर भी असर पड़ता है। उनका लक्ष्य यह है कि समझौते के बाद किसी एक पक्ष को यह महसूस न हो कि वह हार गया। CJI ने कहा कि कोशिश यह होनी चाहिए कि “दोनों पक्ष मुस्कुराते हुए जाएं और दोनों को लगे कि हम जीते हैं।” यही सोच SAMADHAN SAMAROH को सामान्य लोक अदालत से आगे एक व्यापक संस्थागत प्रयास बनाती है।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा ने बताया- मध्यस्थता में फैसला पक्षकार खुद करते हैं

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा ने भी SAMADHAN SAMAROH के पीछे की सोच को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि मध्यस्थता का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि विवाद का समाधान पक्षकारों पर थोपा नहीं जाता, बल्कि वे खुद अपनी सहमति से समाधान तय करते हैं। उनके अनुसार, अपनी इच्छा और निर्णय से किया गया समाधान अक्सर किसी न्यायिक आदेश से अधिक टिकाऊ और संतोषजनक हो सकता है। जस्टिस नरसिम्हा ने इसे केवल लंबित मामलों की संख्या घटाने की कवायद मानने के बजाय भविष्य में मध्यस्थता के लिए स्थायी संस्थागत व्यवस्था विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने जोर दिया कि ऐसे अभियानों से मिलने वाले अनुभव को संस्थागत स्मृति में बदला जाना चाहिए, ताकि हर अगली लोक अदालत पिछली प्रक्रिया से सीख लेकर बेहतर हो।

3 दिन में 1,712 मामलों का निपटारा

सुप्रीम कोर्ट के 24 अगस्त के बयान के अनुसार, 3,285 मामलों में से 1,664 मामलों का लोक अदालत प्रक्रिया के जरिए निपटारा या समझौता हुआ। इसके अलावा 48 मामले मध्यस्थता के जरिए सुलझाए गए। कुल मिलाकर 1,712 मामलों का निपटारा हुआ।

दिनवार आंकड़े इस प्रकार रहे:

  • 21 अगस्त: 588 मामले सूचीबद्ध, 402 मामलों का निपटारा/समझौता

  • 22 अगस्त: 1,159 मामले सूचीबद्ध, 350 मामलों का निपटारा/समझौता

  • 23 अगस्त: 1,538 मामले सूचीबद्ध, 912 मामलों का निपटारा/समझौता

सबसे ज्यादा 912 मामलों का निपटारा 23 अगस्त को हुआ।

21 अप्रैल से चल रही थी तैयारी, सिर्फ तीन दिन का कार्यक्रम नहीं

सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक SAMADHAN SAMAROH की शुरुआत 21 अप्रैल 2026 को हुई थी और 21, 22 तथा 23 अगस्त को आयोजित विशेष लोक अदालत के साथ इसका समापन हुआ। इसका उद्देश्य लंबित मामलों को सहमति आधारित समाधान तंत्र के जरिए निपटाना था। यानी 21 से 23 अगस्त की लोक अदालत को केवल तीन दिन का कार्यक्रम समझना सही नहीं होगा। इसके पीछे करीब चार महीने की तैयारी थी, जिसमें समझौते की संभावना वाले मामलों की पहचान, पक्षकारों और वकीलों से संपर्क तथा पहले से समाधान की संभावनाएं तलाशना शामिल था। इतना ही नहीं, 21 अगस्त से पहले 20 अगस्त तक भी कई मामलों का सौहार्दपूर्ण तरीके से निपटारा किया गया।

किन मामलों को समाधान के लिए चुना गया?

सुप्रीम कोर्ट ने SAMADHAN SAMAROH के लिए कई श्रेणियां पहले से चिन्हित की थीं। इनमें बैंकिंग विवाद, सिविल मामले, मुआवजा और मोटर दुर्घटना दावे, कंज्यूमर और RERA विवाद, नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट से जुड़े मामले, पारिवारिक विवाद, श्रम एवं औद्योगिक मामले, भूमि अधिग्रहण, संपत्ति कर, किराया एवं बेदखली, सेवा मामले और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कर संबंधी मामले शामिल थे।

₹240.94 करोड़ से अधिक की राशि का वितरण

तीन दिवसीय प्रक्रिया के दौरान कुल ₹2,40,94,37,087.38 यानी लगभग ₹240.94 करोड़ की राशि वितरित की गई। यह आंकड़ा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि लोक अदालत में बड़ी संख्या में मुआवजा और आर्थिक दावों से जुड़े विवाद भी शामिल थे।

CJI पहले ही बता चुके हैं- भारत बन सकता है ग्लोबल मेडिएशन सेंटर

SAMADHAN SAMAROH की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि CJI सूर्यकांत पहले ही भारत में मध्यस्थता की भूमिका को लेकर बड़ा विजन सामने रख चुके हैं।

7 अगस्त 2026 को एक अंतरराष्ट्रीय ADR सम्मेलन में CJI सूर्यकांत ने मध्यस्थता को “गहराई से मनोवैज्ञानिक” प्रक्रिया बताया था और कहा था कि भारत के पास वैश्विक समुदाय के लिए मध्यस्थता का वास्तविक केंद्र बनने की क्षमता है। उन्होंने यह भी कहा कि केवल पर्याप्त विवाद समाधान ढांचा बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि भारत को ऐसी अत्याधुनिक व्यवस्था विकसित करनी होगी जो देश की तेज आर्थिक और सामाजिक वृद्धि के साथ कदम मिला सके। CJI ने यह भी रेखांकित किया था कि विभिन्न न्यायक्षेत्रों में किए गए शोध से संकेत मिलता है कि लोग उन समझौतों का अधिक सम्मान करते हैं जिन्हें बनाने में उनकी अपनी भूमिका रही हो।

जस्टिस नरसिम्हा के मुताबिक अगली चुनौती क्या है?

SAMADHAN के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसी प्रक्रिया को नियमित और स्थायी व्यवस्था बनाया जा सकता है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा के मुताबिक केवल समय-समय पर लोक अदालत आयोजित करने से पर्याप्त परिणाम नहीं मिलेंगे। इसके लिए स्थायी संस्थागत ढांचा, प्रशिक्षित मध्यस्थ, विषय-विशेषज्ञता और पिछले अभियानों से मिली सीख को सुरक्षित रखना जरूरी है। उन्होंने इस पहल को भविष्य की संस्थागत व्यवस्था की दिशा में एक “stepping stone” के रूप में देखा और जोर दिया कि संस्थाएं धीरे-धीरे अनुभव और सीख के आधार पर मजबूत होती हैं।

सुप्रीम कोर्ट के लिए क्यों अहम है यह मॉडल?

SAMADHAN का सबसे बड़ा फायदा यह है कि जिन मामलों में समझौते की वास्तविक संभावना है, उन्हें लंबी सुनवाई और अंतिम फैसले की प्रक्रिया से बचाया जा सकता है।

इससे तीन स्तरों पर फायदा होता है—पक्षकारों को जल्दी समाधान मिलता है, मुकदमे की लागत और तनाव कम होता है और अदालत का न्यायिक समय उन मामलों के लिए बचता है जिनमें वास्तव में न्यायिक निर्णय आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि सहमति और संवाद के जरिए समाधान से मुकदमेबाजी का समय और खर्च कम होता है, पक्षकारों को अधिक निश्चितता और अंतिमता मिलती है तथा लंबित मामलों का बोझ घटाने में मदद मिलती है।

अब आगे की राह क्या?

SAMADHAN SAMAROH 2026 का तीन दिवसीय चरण 23 अगस्त को समाप्त हो चुका है, लेकिन इसकी असली परीक्षा अब यह होगी कि इससे मिले अनुभव को कितनी मजबूती से स्थायी मध्यस्थता तंत्र में बदला जाता है। 1,712 मामलों का निपटारा और ₹240.94 करोड़ से अधिक की राशि का वितरण निश्चित तौर पर बड़ा आंकड़ा है, लेकिन CJI सूर्यकांत और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा के बयानों से साफ है कि लक्ष्य केवल आंकड़े हासिल करना नहीं है। लक्ष्य ऐसी न्याय व्यवस्था विकसित करना है जिसमें जहां संभव हो, विवाद का समाधान इस तरह हो कि मुकदमे से बाहर निकलते समय दोनों पक्ष खुद को पराजित नहीं, बल्कि समाधान का भागीदार महसूस करें।