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जमीन एक बार कानूनन डी-रिजर्व हुई तो दोबारा आरक्षित नहीं की जा सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला
नासिक की जमीन पर 24 साल पुरानी reservation को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने Planning Authorities को अहम कानूनी संदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि कानून के तहत एक बार reservation खत्म होकर जमीन de-reserve हो जाए, तो बाद के Development Plan में सिर्फ उद्देश्य बदलकर उसी जमीन को फिर से reserve नहीं किया जा सकता। 1993 में Electric Sub-Station के लिए आरक्षित जमीन, 2006 के Purchase Notice और अधिग्रहण की कार्रवाई आगे न बढ़ने के बाद विवाद फिर 2017 के Development Plan तक पहुंचा—जहां हाईकोर्ट ने जमीन मालिक के पक्ष में फैसला सुनाया।

मुंबई:
बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमीन मालिकों के अधिकार से जुड़े एक अहम फैसले में कहा है कि यदि किसी जमीन की reservation कानून के संचालन से समाप्त होकर वह de-reserve हो चुकी है, तो Planning Authority बाद के Development Plan में उसी जमीन को केवल reservation का उद्देश्य बदलकर दोबारा आरक्षित नहीं कर सकती। कोर्ट ने ऐसी दोबारा की गई reservation को कानूनन टिकाऊ नहीं माना और संबंधित जमीन को reservation से मुक्त करने का आदेश दिया। यह फैसला नासिक की जमीन से जुड़े मामले में Justice Ranjitsinha Raja Bhonsale और Justice M.S. Karnik की Division Bench ने सुनाया। मामला Article 226 के तहत दायर याचिका और Maharashtra Regional and Town Planning Act, 1966 यानी MRTP Act की Section 127 से जुड़ा था।
क्या है पूरा मामला?
मामले में संबंधित जमीन को 1993 के Development Plan में Electric Sub Station बनाने के लिए reserve किया गया था। लेकिन निर्धारित अवधि में संबंधित अधिकारियों ने जमीन के अधिग्रहण की प्रभावी कार्रवाई नहीं की। इसके बाद जमीन मालिकों ने 12 दिसंबर 2006 को MRTP Act की Section 127 के तहत Purchase Notice जारी किया।
इसके बाद Maharashtra State Electricity Distribution Company ने जमीन के अधिग्रहण का प्रस्ताव वापस ले लिया। रिकॉर्ड के अनुसार, इसके पीछे जमीन की अधिक कीमत को एक कारण बताया गया था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि Section 127 की वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद पुरानी reservation समाप्त हो चुकी थी। इसलिए उसी जमीन को बाद के Development Plan में किसी दूसरे public purpose के नाम पर फिर से reserve नहीं किया जा सकता।
2017 के Development Plan में फिर आरक्षित कर दी गई जमीन
कोर्ट के सामने महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि पहली reservation के कानूनन समाप्त होने के बाद उसी जमीन को 2017 के Development Plan में public amenities space के लिए फिर से reserve कर दिया गया। अर्थात पहले जिस जमीन पर Electric Sub Station के लिए reservation थी, वह Section 127 की प्रक्रिया के बाद de-reserve हो गई, लेकिन बाद के Development Plan में Planning Authority ने उसी जमीन को एक अलग सार्वजनिक उद्देश्य के लिए फिर से reservation में डाल दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल reservation का उद्देश्य बदल देने से पहले से कानूनन समाप्त हो चुकी reservation को दोबारा जीवित नहीं किया जा सकता।
Section 127 MRTP Act क्या कहती है?
MRTP Act की Section 127 जमीन मालिक को उस स्थिति में वैधानिक रास्ता देती है जब Development Plan में जमीन किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए reserved हो लेकिन निर्धारित समय में Planning Authority जमीन का अधिग्रहण करने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाती। ऐसी स्थिति में land owner purchase notice जारी कर सकता है। यदि कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अधिग्रहण आगे नहीं बढ़ता, तो reservation lapse होने और जमीन को reservation से मुक्त होने का वैधानिक परिणाम सामने आता है। यही वह अधिकार है जिसे हाईकोर्ट ने मौजूदा मामले में महत्वपूर्ण माना।
कोर्ट ने किन पुराने फैसलों पर भरोसा किया?
बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में Supreme Court के Bhavnagar University v. Palitana Sugar Mills (P) Ltd. सहित कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया। कोर्ट ने Bombay High Court के Anil Dattatraya Girme मामले के सिद्धांत को भी लागू किया। Anil Dattatraya Girme मामले में भी सवाल यही था कि Section 127 के तहत reservation समाप्त होकर जमीन de-reserve हो जाने के बाद क्या उसे दूसरे revised Development Plan में किसी बदले हुए public purpose के लिए फिर reserve किया जा सकता है। 26 फरवरी 2020 को Bombay High Court की Division Bench ने ऐसी re-reservation को अस्वीकार किया था। उस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि Section 127 के तहत reservation lapse होने के बाद land owner को मिला अधिकार केवल इसलिए समाप्त नहीं किया जा सकता कि Planning Authority ने बाद के revised Development Plan में उसी जमीन को फिर reserve कर दिया।
Supreme Court का Godrej & Boyce फैसला भी अहम
हाईकोर्ट ने जिस कानूनी सिद्धांत पर भरोसा किया, उसका एक महत्वपूर्ण आधार Supreme Court का Godrej & Boyce Manufacturing Co. Ltd. v. State of Maharashtra फैसला भी है। इस मामले में भी जमीन पहले Railway purpose के लिए reserved थी। निर्धारित अवधि बीतने और Section 127 की प्रक्रिया पूरी होने के बाद State Government ने reservation का उद्देश्य बदलकर उसे Development Plan Road के लिए reserve करने की कोशिश की थी। Supreme Court ने माना कि जब वैधानिक अवधि पूरी होने और आवश्यक notice के बाद reservation lapse हो गई, तो State Government बाद में reservation का उद्देश्य बदलकर उसी जमीन पर नई reservation नहीं लगा सकती।
पहले से मिली जमीन मालिक की वैधानिक सुरक्षा छीनी नहीं जा सकती
Bombay High Court के पुराने फैसलों में यह सिद्धांत भी सामने आया है कि Section 127 के तहत reservation lapse होने के बाद जमीन owner के पक्ष में जो statutory right पैदा होता है, उसे केवल बाद के revised Development Plan के जरिए खत्म नहीं किया जा सकता। Kishor Siddheshwar Wadotkar मामले में भी कोर्ट ने कहा था कि reservation lapse होने के बाद Planning Authority revised Development Plan में उसी जमीन को फिर public purpose के लिए reserve करके जमीन मालिक के अर्जित अधिकार को खत्म नहीं कर सकती। इसी सिद्धांत को बाद के मामलों में भी लागू किया गया है। 2022 के Trilok Singh Pahlajsingh Rajpal मामले में Bombay High Court ने Anil Dattatraya Girme के सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि एक बार reservation lapse होकर जमीन release हो जाए तो Planning Authority उसे New Development Plan में फिर reserve नहीं कर सकती।
हाईकोर्ट का निष्कर्ष
मौजूदा मामले में Division Bench ने माना कि 1993 की मूल reservation Section 127 की वैधानिक प्रक्रिया के तहत lapse हो चुकी थी। इसलिए बाद में 2017 के Development Plan में उसी जमीन को public amenities के लिए reserve करना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। कोर्ट ने reservation को deemed lapsed माना और संबंधित जमीन को reservation से release करने का निर्देश दिया। मामले का शीर्षक Baburao Gangadhar Jadhav (Since Deceased) Through Legal Heirs v. State of Maharashtra है और यह Writ Petition No. 8829 of 2024 के रूप में दर्ज है।
फैसले का महत्व
यह फैसला महाराष्ट्र में Development Plan में लंबे समय तक reserved रहने वाली निजी जमीनों के मालिकों के लिए महत्वपूर्ण है। इसका मूल संदेश यह है कि Planning Authority किसी जमीन के अधिग्रहण में वैधानिक समयसीमा का पालन नहीं करती और Section 127 के तहत reservation कानूनन समाप्त हो जाती है, तो बाद में केवल reservation का नाम या उद्देश्य बदलकर उसी जमीन को फिर से reservation में डालना जमीन मालिक के अर्जित अधिकार को खत्म करने का रास्ता नहीं बन सकता।
दूसरे शब्दों में, “पहले reservation खत्म, फिर नए नाम से reservation” का तरीका कानून की नजर में स्वीकार्य नहीं है। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल एक जमीन विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि MRTP Act के तहत land reservation, acquisition और land owner's statutory rights के बीच संतुलन को स्पष्ट करता है।
