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बच्ची के अपहरण से शव बरामदगी तक जुड़ी हर कड़ी… ‘हत्या का प्रत्यक्ष गवाह’ नहीं फिर भी उम्रकैद कायम, आंध्र प्रदेश HC का बड़ा फैसला

‘हत्या करते किसी ने नहीं देखा’… फिर भी उम्रकैद! एक नाबालिग बच्ची के अपहरण से लेकर उसकी मौत और शव की बरामदगी तक जुड़ी परिस्थितियों की कड़ियों को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने इतना मजबूत पाया कि प्रत्यक्षदर्शी के अभाव के बावजूद दोनों आरोपियों की दोषसिद्धि और उम्रकैद बरकरार रखी। कोर्ट ने ‘Last Seen’ थ्योरी, शव बरामदगी और आरोपियों के स्पष्टीकरण के अभाव को अहम मानते हुए कहा कि हर हत्या के मामले में प्रत्यक्ष सबूत होना जरूरी नहीं है।

Sonali25 अग. 2026, 02:22 PM IST
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बच्ची के अपहरण से शव बरामदगी तक जुड़ी हर कड़ी… ‘हत्या का प्रत्यक्ष गवाह’ नहीं फिर भी उम्रकैद कायम, आंध्र प्रदेश HC का बड़ा फैसला

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्ची के अपहरण और हत्या से जुड़े करीब 12 साल पुराने मामले में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि हत्या की घटना का प्रत्यक्षदर्शी गवाह न होना अपने आप में अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करता। यदि अपहरण के बाद बच्ची को आरोपियों के साथ आखिरी बार जीवित देखा गया हो, उसके तुरंत बाद उसकी मौत सामने आए और शव समेत अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य आरोपियों से जुड़ते हों, तो परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला हत्या साबित करने के लिए पर्याप्त हो सकती है। जस्टिस के. सुरेश रेड्डी और जस्टिस चल्ला गुनाराजन की डिवीजन बेंच ने Criminal Appeal No.474 of 2018 में दोनों आरोपियों की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट की conviction और sentences को बरकरार रखा। मामला Tirumanuyam Srinivasulu Reddy @ Srunivasulu & Another v. State of Andhra Pradesh का है।

2014 में शुरू हुई थी पूरी कहानी

यह मामला 22 दिसंबर 2014 का है। अभियोजन के अनुसार नाबालिग बच्ची Vaishnavi Vidyalaya School, Tiruchanur में UKG की छात्रा थी। वह रोज स्कूल वैन से स्कूल जाती थी और लौटते समय एक tailoring shop के पास उतरती थी, जहां उसकी मां उसे लेने आती थी। 22 दिसंबर 2014 को शाम करीब 4:30 बजे बच्ची स्कूल बस से उतरी। अभियोजन के महत्वपूर्ण गवाह PW5 के अनुसार, आरोपी नंबर-1 वहां आया, बच्ची का हाथ पकड़ा और उसे मोटरसाइकिल की ओर ले गया। कुछ देर बाद बच्ची को मोटरसाइकिल पर दोनों आरोपियों के बीच बैठाकर ले जाया गया। बच्ची के घर नहीं लौटने पर उसकी मां PW1 ने उसी दिन शाम करीब 5 बजे पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शुरुआत में IPC की Section 364 के तहत kidnapping का मामला दर्ज हुआ। बाद में जांच के दौरान आरोपों में Sections 302 और 201 read with Section 34 IPC जोड़ी गईं।

₹3 लाख का कथित विवाद बना हत्या का motive

अभियोजन की कहानी में आर्थिक विवाद को भी महत्वपूर्ण motive बताया गया। रिकॉर्ड के अनुसार आरोपी नंबर-1 और बच्ची के पिता ने पहले Dubai में साथ काम किया था। आरोपी पर बच्ची के पिता के लगभग ₹3 लाख बकाया बताए गए थे। पैसे वापस करने को लेकर दोनों के बीच विवाद चल रहा था। आरोप यह भी था कि आरोपी नंबर-1 के गांव में आयोजित birthday function के दौरान बच्ची के माता-पिता और आरोपी के बीच विवाद हुआ था। अभियोजन के मुताबिक इस दौरान आरोपी ने उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी थी। गवाहों ने कथित विवाद को शांत कराया था। इसके बाद अभियोजन ने आरोप लगाया कि आरोपी नंबर-1 ने बदला लेने की नीयत से बच्ची के अपहरण की योजना बनाई।

बच्ची को Vikruthamala tank ले जाने का आरोप

Prosecution version के मुताबिक बच्ची को 22 दिसंबर 2014 की शाम करीब 6 बजे Vikruthamala tank, Yerpedu Mandal की ओर ले जाया गया। आरोप था कि वहां बच्ची को पानी में डुबो दिया गया और उसकी मौत हो गई। इसके बाद आरोपियों ने tank के पास गड्ढा खोदकर शव को छिपाने का प्रयास किया। आरोप था कि शव को दफनाने में दोनों आरोपियों ने भूमिका निभाई।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने भी prosecution story को support किया

मेडिकल evidence भी मामले की महत्वपूर्ण कड़ी बना। उपलब्ध judgment record में post-mortem examination का उल्लेख है और cause of death को drowning के परिणामस्वरूप asphyxia बताया गया है। इससे prosecution की उस कहानी को medical evidence से समर्थन मिला कि बच्ची की मौत पानी में डूबने से हुई थी।

‘लास्ट सीन’ थ्योरी बनी केस की सबसे मजबूत कड़ी

इस मामले में prosecution के लिए सबसे महत्वपूर्ण evidence PW4 और PW5 की गवाही रही। PW5 ने अदालत के सामने बताया कि 22 दिसंबर 2014 को करीब 4:30 बजे वह bus stop पर उतरी थी। बच्ची भी वहां उतरी। इसके बाद आरोपी नंबर-1 आया, उसने बच्ची को पकड़ा और मोटरसाइकिल की तरफ ले गया। फिर बच्ची को बाइक पर दोनों व्यक्तियों के बीच बैठाकर ले जाया गया। PW4 की गवाही ने भी इस version को corroborate किया। उसने आरोपी नंबर-1 को बच्ची को अपने साथ ले जाते हुए देखने की बात कही थी। आरोपी ने कथित तौर पर यह कहा था कि वह बच्ची को उसकी बड़ी मौसी के घर ले जाएगा। यानी बच्ची को आखिरी बार जीवित अवस्था में आरोपियों के साथ देखा गया और इसके बाद उसका शव बरामद हुआ। यही ‘last seen’ circumstance prosecution की chain में निर्णायक कड़ी बनी।

Test Identification Parade भी महत्वपूर्ण

Defence ने Test Identification Parade पर सवाल उठाते हुए कहा था कि आरोपी को घटना के कुछ दिन बाद television पर दिखाया गया था, इसलिए witnesses की पहचान पर भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन 2021 की proceedings में हाईकोर्ट ने PW4 और PW5 की गवाही को prima facie महत्वपूर्ण माना। PW5 ने Magistrate द्वारा कराई गई Test Identification Parade में आरोपी नंबर-1 की पहचान भी की थी। यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि 2018 में appeal admit होने के समय भी हाईकोर्ट ने bail देने से इनकार कर दिया था। अदालत ने उस समय कहा था कि आरोपी Section 302 IPC में convicted है और उसे life imprisonment मिली है तथा bail के लिए कोई special reason सामने नहीं आया।

2021 में भी हाईकोर्ट ने bail देने से किया था इनकार

Criminal Appeal No.474 of 2018 लंबित रहने के दौरान आरोपी नंबर-1 ने 2021 में bail मांगी। उसकी ओर से defence ने कहा कि FIR में motorcycle number का उल्लेख होने के बावजूद वाहन का ownership prosecution साबित नहीं कर पाया। PW1 से PW5 की गवाही में contradictions का भी दावा किया गया और TIP पर भी सवाल उठाया गया। लेकिन हाईकोर्ट ने PW4 और PW5 की गवाही तथा पहले bail rejection order को देखते हुए bail application खारिज कर दी। अदालत ने Supreme Court के Kashmira Singh और Preet Pal Singh जैसे फैसलों के सिद्धांतों पर भी भरोसा किया कि conviction के बाद sentence suspension और bail के लिए केवल सामान्य bail principles पर्याप्त नहीं होते; मजबूत और compelling reasons की आवश्यकता होती है।

2024 में medical grounds पर भी राहत नहीं

2024 में आरोपी नंबर-1 ने Section 389(1) CrPC के तहत sentence suspend कर medical grounds पर bail मांगी। उपलब्ध case record के अनुसार इस application पर 11 मार्च 2024 को सुनवाई हुई। हाईकोर्ट ने application dismiss कर दी। हालांकि जेल अधिकारियों को आरोपी को आवश्यक medical treatment उपलब्ध कराने और जरूरत पड़ने पर surgery कराने के निर्देश दिए गए। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि final appeal का फैसला आने से पहले आरोपी की ओर से conviction के बाद राहत पाने के कई प्रयास किए गए थे।

Trial Court में prosecution ने कितने सबूत दिए?

मामले में prosecution ने कुल 18 witnesses यानी PW1 से PW18 तक गवाह पेश किए। इसके अलावा Ex.P1 से Ex.P20 तक 20 documents और M.O.1 से M.O.10 तक 10 material objects record पर रखे गए। Defence की ओर से कोई oral evidence नहीं दिया गया। हालांकि Ex.D1 के रूप में PW6 द्वारा आरोपी नंबर-1 को दिया गया एक letter mark किया गया था।

Section 106 Evidence Act ने क्यों बदला केस का रुख?

फैसले का एक अहम कानूनी पहलू Evidence Act की Section 106 है।

इसका मूल सिद्धांत यह है कि किसी विशेष तथ्य का knowledge यदि विशेष रूप से किसी व्यक्ति के पास है, तो उस तथ्य को साबित करने का burden उस व्यक्ति पर हो सकता है। इस मामले में prosecution ने पहले circumstances establish किए—बच्ची आरोपियों के साथ गई, उसके बाद उसकी मौत हुई और शव बरामद हुआ। ऐसे में बच्ची के आरोपियों के साथ रहने के बाद उसके साथ क्या हुआ, इसका संतोषजनक explanation देना defence के लिए महत्वपूर्ण था। जब आरोपी इस महत्वपूर्ण circumstance की कोई विश्वसनीय alternative explanation नहीं दे सके, तो यह prosecution की circumstantial chain में एक और कड़ी बन गया।

हत्या का direct evidence क्यों जरूरी नहीं?

Defence की मुख्य आपत्तियों में से एक यह थी कि किसी ने आरोपियों को बच्ची की हत्या करते हुए नहीं देखा। 

लेकिन हाईकोर्ट ने परिस्थितियों की पूरी chain को देखा। अदालत के सामने सवाल केवल यह नहीं था कि “हत्या करते हुए किसने देखा?”, बल्कि यह था कि—

बच्ची आखिरी बार किसके साथ थी?

वह वहां से कैसे गई?

उसके बाद उसके साथ क्या हुआ?

शव कहां मिला?

शव तक पुलिस कैसे पहुंची?

क्या medical evidence prosecution story को support करता है?

और क्या accused इन परिस्थितियों का कोई विश्वसनीय alternative explanation दे पाए?

हाईकोर्ट ने इन सभी परिस्थितियों को एक साथ पढ़ते हुए पाया कि prosecution द्वारा प्रस्तुत circumstances आपस में जुड़कर ऐसी complete chain बनाते हैं जो आरोपियों की guilt की ओर स्पष्ट रूप से इशारा करती है।

2018 से 2026 तक चला appeal

यह मामला केवल एक पुराना murder trial नहीं था, बल्कि conviction के बाद लगभग आठ साल तक appeal proceedings में भी रहा। Criminal Appeal No.474 of 2018 में 2018 में appeal admit हुई और उसी समय bail application reject हुई। 2021 में फिर bail application खारिज हुई। 2024 में medical grounds पर राहत नहीं मिली। आखिरकार 2026 में Division Bench ने मुख्य criminal appeal पर फैसला सुनाते हुए conviction और sentences को confirm कर दिया।

कोर्ट का अंतिम निष्कर्ष

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने Criminal Appeal No.474 of 2018 को dismiss कर दिया और trial court द्वारा दोनों आरोपियों के खिलाफ दी गई conviction और sentences को बरकरार रखा। फैसले का व्यापक कानूनी संदेश यह है कि केवल इसलिए murder conviction असफल नहीं हो जाती क्योंकि हत्या का कोई प्रत्यक्षदर्शी उपलब्ध नहीं है। Circumstantial evidence पर conviction पूरी तरह संभव है, बशर्ते परिस्थितियों की chain इतनी मजबूत हो कि आरोपी की guilt के अलावा कोई reasonable alternative hypothesis न बचे।

फैसले की सबसे बड़ी कानूनी सीख

यह फैसला तीन महत्वपूर्ण principles को एक साथ सामने लाता है—

  1. हत्या का प्रत्यक्षदर्शी हर मामले में अनिवार्य नहीं है।

  2. ‘Last seen theory’ अकेले नहीं, बल्कि अन्य corroborating circumstances के साथ conviction का आधार बन सकती है।

  3. जब prosecution पहले ऐसी परिस्थितियां स्थापित कर दे जिनका विशेष ज्ञान accused के पास है, तो Section 106 Evidence Act के तहत accused का satisfactory explanation महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस केस में prosecution ने alleged kidnapping, last-seen evidence, identification, recovery और medical evidence को एक साथ रखा। हाईकोर्ट ने इन circumstances को अलग-अलग नहीं बल्कि पूरी chain के रूप में देखा और conviction को बरकरार रखा।