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लखनऊ में वकीलों के चैंबर पर बुलडोजर का रास्ता साफ, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

लखनऊ में वकीलों के चैंबरों पर बुलडोजर रोकने की आखिरी कानूनी कोशिश भी नाकाम हो गई। करीब 40 साल पुराने होने की दलील, वैकल्पिक जगह देने की मांग और विरोध के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कथित अतिक्रमण के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया। अब नजर 30 अगस्त की प्रस्तावित कार्रवाई पर है—क्या हटेंगे विवादित चैंबर और क्या इस फैसले से ‘वकील होने’ के नाम पर अवैध कब्जे को संरक्षण देने की बहस खत्म होगी?

Sonali25 अग. 2026, 02:22 PM IST
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लखनऊ में वकीलों के चैंबर पर बुलडोजर का रास्ता साफ, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

लखनऊ में वकीलों के चैंबरों पर चलने वाली demolition कार्रवाई को रोकने की आखिरी कोशिश भी नाकाम हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने 25 अगस्त 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ताओं की ओर से चैंबरों के करीब 40 साल पुराने होने और वकीलों के लिए वैकल्पिक जगह की मांग जैसे तर्क रखे गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कथित अतिक्रमण को केवल इस आधार पर संरक्षण देने से इनकार कर दिया कि वहां अधिवक्ता काम करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के समक्ष 25 अगस्त को लखनऊ के वकीलों के चैंबरों से जुड़ी याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता पक्ष ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी था, जिसके तहत सार्वजनिक जमीन/रास्ते पर बने कथित अनधिकृत निर्माणों को हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी। इसका सीधा असर यह है कि हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार आगे demolition की प्रशासनिक कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।

विवाद की जड़ क्या है?

मामला लखनऊ के कैसरबाग स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर और उसके आसपास मौजूद वकीलों के चैंबरों तथा अन्य संरचनाओं से जुड़ा है। प्रशासन का आरोप है कि इनमें से कई निर्माण सार्वजनिक रास्ते अथवा सार्वजनिक उपयोग के लिए निर्धारित जमीन पर बिना वैध अधिकार के बनाए गए हैं। वहीं प्रभावित अधिवक्ताओं की ओर से इन चैंबरों के लंबे समय से अस्तित्व में होने और उन्हें हटाने से वकीलों के कामकाज पर गंभीर असर पड़ने की दलील दी गई। यही विवाद आगे चलकर इलाहाबाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

40 साल पुराने हैं चैंबर—सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी गई?

24 अगस्त को मामले की तत्काल सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में उल्लेख किया गया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि कुछ चैंबर करीब 40 वर्षों से मौजूद हैं। यह भी बताया गया कि demolition notices जारी हो चुके हैं और 30 अगस्त को कार्रवाई प्रस्तावित है। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने उस समय यह सवाल भी उठा कि राहत के लिए हाईकोर्ट का रुख क्यों नहीं किया गया। याचिकाकर्ता पक्ष ने जवाब दिया कि demolition का आदेश स्वयं हाईकोर्ट ने दिया है। हालांकि, 25 अगस्त को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने चुनौती में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने 6 अगस्त को क्या कहा था?

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 6 अगस्त 2026 को कथित अतिक्रमणकारियों को एक और अवसर दिया था।

अदालत ने करीब 72 चिन्हित संरचनाओं/कब्जों के संबंध में संबंधित लोगों को नोटिस देकर यह अवसर देने का निर्देश दिया कि वे:

  • चैंबर खाली करें, या

  • जमीन/निर्माण पर अपना वैध अधिकार साबित करें।

यदि वे अपना वैध अधिकार साबित नहीं कर पाते हैं, तो नगर निगम को कानून के अनुसार demolition की कार्रवाई करने का रास्ता दिया गया था।

इसलिए इसे केवल “बिना नोटिस बुलडोजर चलाने” का मामला बताना सही नहीं होगा। अदालत ने पहले दस्तावेज पेश करने और वैध अधिकार साबित करने का अवसर दिया था।

72 चैंबरों का मामला, लेकिन 100 से ज्यादा पहले ही हटाए गए

इस विवाद का एक अहम तथ्य यह है कि 72 और 100+ के आंकड़े अलग-अलग चरणों से संबंधित हैं। 6 अगस्त की सुनवाई में लखनऊ नगर निगम की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया था कि पहले के निर्देशों के अनुपालन में 100 से ज्यादा अवैध रूप से निर्मित चैंबर हटाए जा चुके हैं। वहीं 72 चिन्हित अतिक्रमणों के नए चरण में केवल 14 संरचनाएं हटाई जा सकी थीं। रिपोर्टों के मुताबिक अधिवक्ताओं के विरोध के कारण कार्रवाई में बाधा आई थी। यानी 72 का आंकड़ा पूरे विवाद में मौजूद सभी चैंबरों की कुल संख्या नहीं है, बल्कि उस चरण में चिन्हित कथित अतिक्रमणों से जुड़ा आंकड़ा है।

मई में क्यों भड़का था विवाद?

मई 2026 में लखनऊ में नगर निगम की demolition कार्रवाई के दौरान मामला बेहद तनावपूर्ण हो गया था। वकीलों ने कार्रवाई का विरोध किया और न्यायिक कार्य से दूरी बनाने का फैसला भी किया। मीडिया रिपोर्टों में पुलिस और अधिवक्ताओं के बीच टकराव, विरोध प्रदर्शन और कई लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई थी।

इस घटनाक्रम ने चैंबर विवाद को सिर्फ अतिक्रमण हटाने का प्रशासनिक मामला नहीं रहने दिया, बल्कि यह न्यायपालिका, बार और प्रशासन के बीच बड़ा टकराव बन गया।

वकीलों ने करीब 240 चैंबर गिराने का आरोप लगाया

विवाद के दौरान कुछ प्रदर्शनकारी वकीलों की ओर से यह आरोप लगाया गया कि हाईकोर्ट के आदेश में 72 चैंबरों की बात थी, लेकिन प्रशासन ने करीब 240 चैंबरों को गिरा दिया। यह दावा वकील पक्ष की ओर से लगाया गया था और इसे स्थापित न्यायिक तथ्य के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए। यही वजह है कि खबर में प्रशासन का पक्ष और अदालत के आदेश की वास्तविक सीमा दोनों को अलग-अलग बताना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने रविवार को कार्रवाई का निर्देश क्यों दिया?

हाईकोर्ट ने demolition की कार्रवाई रविवार को करने का निर्देश दिया था, ताकि न्यायिक कामकाज प्रभावित न हो। साथ ही पुलिस प्रशासन, जिलाधिकारी और नगर निगम के अधिकारियों को आपसी समन्वय के साथ कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए थे। इससे अदालत का उद्देश्य यह था कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के कारण नियमित न्यायिक कार्य बाधित न हो।

Bar Association की ओर से भी आया अहम रुख

मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया कि बार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने कथित अवैध कब्जे का खुलकर बचाव नहीं किया। रिपोर्टों के अनुसार, Lucknow Bar Association की ओर से कहा गया कि यदि कब्जा वास्तव में अवैध है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही कुछ पक्षों की ओर से अधिवक्ताओं के लिए वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया था। यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि पूरा बार समुदाय कथित अतिक्रमण को वैध ठहराने के एक ही रुख पर नहीं था।

वकीलों की हड़ताल पर भी हाईकोर्ट सख्त

चैंबर विवाद के दौरान न्यायिक कार्य से abstain करने को लेकर भी हाईकोर्ट का रुख सख्त रहा। मई में Lucknow Bar Association और Central Bar Association की ओर से न्यायिक कार्य से दूरी बनाने के मामले में बार पदाधिकारियों तथा कुछ अधिवक्ताओं को show-cause notices जारी किए गए थे। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि बार की नाराजगी के कारण न्यायिक कार्य को अनिश्चितकाल तक प्रभावित नहीं किया जा सकता।

अब 30 अगस्त पर क्या होगा?

24 अगस्त की सुप्रीम कोर्ट कार्यवाही में बताया गया था कि demolition notices जारी किए जा चुके हैं और 30 अगस्त को प्रस्तावित कार्रवाई की तारीख बताई गई थी।

अब 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार प्रशासनिक कार्रवाई पर लगी अंतिम न्यायिक चुनौती भी फिलहाल खत्म हो गई है। हालांकि, जिन लोगों के पास जमीन या निर्माण पर वैध अधिकार का दावा है, उनके मामलों में संबंधित दस्तावेज और न्यायिक/प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण रहेगा।

क्या सिर्फ पुराना होना निर्माण को वैध बना देता है?

यह इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल है। किसी निर्माण का 20, 30 या 40 साल पुराना होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि निर्माण कानूनी रूप से अधिकृत है। यदि जमीन सार्वजनिक उपयोग के लिए निर्धारित है और संबंधित व्यक्ति के पास वैध allotment, lease, ownership या अन्य कानूनी अधिकार का दस्तावेज नहीं है, तो केवल लंबे समय से कब्जे में होने की दलील पर्याप्त नहीं हो सकती। इसीलिए हाईकोर्ट ने संबंधित लोगों को अपना वैध अधिकार साबित करने का अवसर दिया था।

कानून के पेशे से जुड़े लोगों के लिए भी अलग नियम नहीं

सुप्रीम कोर्ट के आज के रुख का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अधिवक्ता होना अपने आप में सार्वजनिक जमीन पर कथित अनधिकृत निर्माण के लिए कोई विशेष immunity नहीं देता। यदि निर्माण अवैध है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। यही बात इस मामले को व्यापक महत्व देती है—क्योंकि अदालत ने बार और प्रशासन के विवाद से ऊपर कानून और सार्वजनिक भूमि के अधिकार के सवाल को रखा है। लखनऊ के वकीलों के चैंबरों का विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। वर्षों पुराने होने और अधिवक्ताओं के इस्तेमाल में होने की दलील के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया। अब असली परीक्षा प्रशासन की होगी—क्या वह हाईकोर्ट द्वारा तय प्रक्रिया, नोटिस और वैध अधिकार की जांच का पालन करते हुए कार्रवाई करता है या नहीं। 

यह फैसला एक व्यापक संदेश भी देता है: सार्वजनिक भूमि और रास्तों पर कथित अतिक्रमण के मामले में किसी पेशे, पद या लंबे कब्जे के आधार पर स्वतः कानूनी संरक्षण नहीं मिल सकता।