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पेट्रोल का कैन, आधी रात की धमकी और जिंदा जलाने की साजिश… सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हत्या जैसे गंभीर अपराध में ‘बिना कारण’ बेल नहीं
पहले घर पहुंचकर धमकी, फिर मारपीट और आखिर में पेट्रोल डालकर जिंदा जलाने का आरोप—हत्या के इस सनसनीखेज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत को लेकर बेहद सख्त संदेश दिया है। कोर्ट ने दो आरोपियों को मिली बेल रद्द करते हुए साफ कहा कि Murder जैसे गंभीर अपराध में जमानत कोई routine exercise नहीं है। अदालत को यह बताना होगा कि आरोपी को राहत देने का प्रथमदृष्टया आधार क्या है और उपलब्ध महत्वपूर्ण साक्ष्यों के बावजूद उसे जमानत क्यों दी जा रही है। सिर्फ आदेश लिख देना पर्याप्त नहीं—आदेश में judicial application of mind और justifiable reasons साफ

नई दिल्ली।
हत्या जैसे गंभीर अपराध में जमानत देना अदालत का सामान्य या यांत्रिक फैसला नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद गंभीर पेट्रोल-बर्निंग मर्डर केस में दो आरोपियों की जमानत रद्द करते हुए कहा है कि गंभीर अपराध में Bail Order ऐसा होना चाहिए जिससे साफ दिखाई दे कि अदालत ने मामले के महत्वपूर्ण तथ्यों, आरोपी की प्रथमदृष्टया भूमिका और अपराध की गंभीरता पर अपना न्यायिक विवेक लगाया है। केवल जमानत देने का आदेश पर्याप्त नहीं है; उसके पीछे ठोस और न्यायसंगत कारण भी दर्ज होने चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 20 अगस्त 2026 के फैसले में कहा कि इस मामले में हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट ने FIR में दर्ज उन महत्वपूर्ण परिस्थितियों को नजरअंदाज कर दिया, जिनसे प्रथमदृष्टया पता चलता था कि हमला अचानक हुए विवाद का परिणाम नहीं बल्कि पहले से तैयार की गई कार्रवाई थी। चारों आरोपी एक साथ रात में पहुंचे थे, परिवार को धमकाया गया था और उनके वाहन में पेट्रोल का कैन मौजूद था। इसके बाद शिकायतकर्ता को पकड़कर उसके शरीर पर पेट्रोल डाला गया और आग लगा दी गई।
मामला आखिर है क्या?
मामला महाराष्ट्र के सतारा का है। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार FIR No. 261/2024, Satara Taluka Police Station में 12 जून 2024 को दर्ज हुई थी। आरोप भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302, 307, 323, 109, 504 और 506 सहपठित धारा 34 के तहत लगाए गए थे। अभियोजन के अनुसार, 11 जून 2024 की रात मृतक-शिकायतकर्ता अनिल मधुकर शिंदे की पत्नी उज्ज्वला ने उन्हें फोन कर बताया कि कुछ लोग उनके घर पहुंचे हैं और उनके बेटे प्रज्वल को पुराने विवाद को लेकर माफी मांगने के लिए बाहर बुला रहे हैं। आरोप था कि चारों लोग रात में बार-बार घर पर हमला कर रहे थे और धमकी दे रहे थे कि यदि प्रज्वल ने माफी नहीं मांगी तो परिवार को नहीं छोड़ा जाएगा। परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित होकर पत्नी ने अपने पति को बुलाया। जब अनिल शिंदे घर पहुंचे तो आरोपियों ने उनके साथ मारपीट की और जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद मुख्य आरोपी शिवजीत रंजीत माने ने वाहन से पेट्रोल का कैन निकाला, मृतक के शरीर पर पेट्रोल डाला और जलती हुई माचिस फेंककर उन्हें आग के हवाले कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि बाकी आरोपी उस समय उसके साथ थे। गंभीर रूप से झुलसे अनिल शिंदे की बाद में मौत हो गई।
‘अचानक हुआ झगड़ा’ नहीं, पहले से तैयार हमला- SC
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सबसे अहम बात यही मानी कि घटना को केवल एक अचानक हुए झगड़े के रूप में नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट के अनुसार—
चारों आरोपी एक साथ घटनास्थल पर पहुंचे।
वे पहले से एक वाहन में पेट्रोल का कैन लेकर आए थे।
रात में मृतक के घर पर लगातार दबाव और हमला किया गया।
प्रज्वल से माफी मांगने की मांग की गई।
परिवार को धमकी दी गई कि माफी नहीं मांगने पर उन्हें नहीं छोड़ा जाएगा।
इसके बाद मृतक को निशाना बनाया गया और पेट्रोल डालकर आग लगा दी गई।
इन परिस्थितियों को अलग-अलग नहीं बल्कि cumulative effect में देखने पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रथमदृष्टया इसे pre-planned और premeditated attack माना।
बेल का पूरा घटनाक्रम: किसे कब मिली जमानत?
इस केस में अलग-अलग आरोपियों को अलग-अलग समय पर जमानत मिली और यही बाद में सुप्रीम कोर्ट के सामने बड़ा सवाल बना।
12 नवंबर 2025: आरोपी नंबर-4 को हाईकोर्ट से बेल
बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपी नंबर-4 ज्योतिरादित्य अजितसिंह जाधव को 12 नवंबर 2025 को regular bail दी। हाईकोर्ट ने रिकॉर्डिंग को देखते हुए यह माना था कि आरोपी ने घटना का वीडियो रिकॉर्ड किया था और मुख्य आरोपी द्वारा पेट्रोल डालकर आग लगाने की घटना में उसकी प्रत्यक्ष भूमिका अलग से सामने नहीं आती थी। यही bail order बाद में पूरे विवाद की “foundational order” बन गया।
8 जनवरी 2026: एक अन्य आरोपी को भी बेल
हाईकोर्ट ने आरोपी नंबर-5 रंजीत उर्फ दादासो बालकृष्ण माने को भी 8 जनवरी 2026 को regular bail दी। उसके बारे में कोर्ट ने यह ध्यान में रखा कि वह उस समय घटनास्थल पर मौजूद नहीं था जब मृतक को आग लगाई गई। उसके खिलाफ आरोप मुख्य रूप से instigation और पेट्रोल उपलब्ध कराने से संबंधित थे।
13 जनवरी 2026: Parity के आधार पर तीसरे आरोपी को बेल
इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 13 जनवरी 2026 को आरोपी नंबर-3 पृथ्वीराज राजेंद्र शिंदे को regular bail दे दी। इसका प्रमुख आधार parity था—यानी सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी थी।
27 मार्च 2026: आरोपी नंबर-2 की बेल हाईकोर्ट ने ठुकराई
दूसरी ओर, आरोपी नंबर-2 यश महेश गायकवाड़ की bail application को हाईकोर्ट ने 27 मार्च 2026 को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया अपराध को heinous और premeditated माना तथा उसके खिलाफ वाहन चलाने और घटनास्थल से जुड़े अन्य आरोपों को गंभीरता से लिया।
महाराष्ट्र सरकार पहुंची सुप्रीम कोर्ट
जमानत के इन आदेशों से असंतुष्ट महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। राज्य ने आरोपी नंबर-3, नंबर-4 और नंबर-5 को मिली जमानत को चुनौती दी, जबकि आरोपी नंबर-2 ने अपनी जमानत याचिका खारिज किए जाने को चुनौती दी। राज्य की ओर से यह तर्क दिया गया कि आरोपियों की पहचान Test Identification Proceedings के जरिए हुई और उनके घटनास्थल पर मौजूद होने तथा अपराध में भागीदारी के संबंध में सामग्री रिकॉर्ड पर मौजूद थी।
SC ने कहा- High Court ने FIR के महत्वपूर्ण facts ही नजरअंदाज कर दिए
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी नंबर-4 ज्योतिरादित्य को मिली जमानत को उस पूरे chain की “foundation” माना, जिसके आधार पर आरोपी नंबर-3 पृथ्वीराज को parity का लाभ मिला। लेकिन कोर्ट ने कहा कि 12 नवंबर 2025 के bail order में ऐसे पर्याप्त कारण नहीं थे जो गंभीर आरोपों के बावजूद जमानत देने को justify कर सकें। कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट ने FIR में दर्ज उन तथ्यों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जिनमें चारों आरोपियों द्वारा शिकायतकर्ता के घर पर लगातार हमला, परिवार को धमकी और पेट्रोल लेकर पहुंचने जैसी परिस्थितियां शामिल थीं। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा दिए गए कारणों को “flimsy and untenable in the eyes of law” माना।
‘वीडियो बना रहा था’ इसलिए आरोपी अलग नहीं हो जाता: कोर्ट का महत्वपूर्ण दृष्टिकोण
इस मामले में आरोपी नंबर-4 के पक्ष में एक अहम तर्क यह था कि उसने घटना को रिकॉर्ड किया था और खुद पेट्रोल डालकर आग नहीं लगाई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पूरे घटनाक्रम को केवल उस एक overt act तक सीमित करके देखने के बजाय चारों आरोपियों की सामूहिक गतिविधियों को देखा। कोर्ट ने कहा कि चारों आरोपी एक साथ आए, घर पर लगातार दबाव बनाया, परिवार को धमकाया और उसी घटनाक्रम में मृतक को पेट्रोल डालकर जला दिया गया। इस पूरी sequence को देखते हुए common intention और premeditation के प्रथमदृष्टया संकेतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया- Bail stage पर पूरा Trial नहीं होता
यह फैसला यह नहीं कहता कि जमानत के समय अदालत को पूरे मामले का मिनी-ट्रायल करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि bail stage पर evidence की detailed examination या merits का exhaustive analysis नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन serious offence में bail order में यह जरूर दिखना चाहिए कि अदालत ने relevant factors पर विचार किया है। यानी दो सीमाएं एक साथ लागू होती हैं— पहली, अदालत को bail stage पर पूरे evidence का अंतिम मूल्यांकन नहीं करना है। दूसरी, अदालत गंभीर अपराध में बिना कारण या mechanical तरीके से bail भी नहीं दे सकती।
Kalyan Chandra Sarkar का 2004 वाला सिद्धांत फिर दोहराया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने landmark decision Kalyan Chandra Sarkar v. Rajesh Ranjan, (2004) 7 SCC 528 को दोहराते हुए कहा कि bail देते समय अदालत को judicial discretion का इस्तेमाल judicious तरीके से करना चाहिए, routine तरीके से नहीं। विशेषकर serious offence में आदेश में prima facie यह बताना जरूरी है कि आरोपी को जमानत क्यों दी जा रही है। यदि ऐसा कोई reasoned basis नहीं है, तो order non-application of mind से प्रभावित माना जा सकता है।
Mahipal, Ram Govind और Ramesh Bhavan Rathod का भी सहारा
पीठ ने केवल Kalyan Chandra Sarkar पर निर्भर नहीं किया। कोर्ट ने Ram Govind Upadhyay v. Sudarshan Singh, Mahipal v. Rajesh Kumar और Ramesh Bhavan Rathod v. Vishanbhai Hirabhai Makwana जैसे फैसलों का भी हवाला दिया। इन फैसलों के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि हत्या जैसे गंभीर अपराध में bail order में facts पर proper application of mind और justifiable reasons दिखाई देने चाहिए।
Shabeen Ahmed और Ajwar फैसलों से भी जोड़ा कानूनी सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने Shabeen Ahmed v. State of Uttar Pradesh, (2025) 4 SCC 172 का भी उल्लेख किया। इसमें bail parameters के superficial application को गंभीर अपराधों की gravity को कमजोर करने वाला बताया गया था।
इसके साथ Ajwar v. Waseem, (2024) 10 SCC 768 के principles भी सामने रखे गए। इसके अनुसार गंभीर अपराध में bail पर विचार करते समय अदालत को कई factors देखने चाहिए, जैसे—
आरोपों की प्रकृति,
अपराध करने का तरीका,
अपराध की गंभीरता,
आरोपी की भूमिका,
criminal antecedents,
गवाहों को प्रभावित करने की संभावना,
दोबारा अपराध करने की संभावना,
आरोपी के फरार होने की आशंका,
न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने की संभावना,
और आरोपी को bail देने की overall desirability।
बेल मिलने के बाद भी बिना Misuse के बेल रद्द हो सकती है?
यह फैसले का बेहद महत्वपूर्ण legal point है। सुप्रीम कोर्ट ने Ajwar के सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि सामान्य तौर पर bail मिलने के बाद उसे mechanical तरीके से cancel नहीं किया जा सकता। लेकिन यदि bail order itself unreasoned या perverse है, या अदालत ने relevant material और offence की gravity को नजरअंदाज किया है, तो superior court उस order में हस्तक्षेप कर सकता है। अर्थात bail cancellation के लिए हर मामले में यह जरूरी नहीं कि आरोपी ने bail मिलने के बाद कोई नया अपराध किया हो या witness को धमकाया हो। यदि मूल bail order ही कानून की दृष्टि से perverse या material facts की अनदेखी पर आधारित है, तो वह appellate scrutiny के अधीन हो सकता है।
लेकिन आरोपी नंबर-5 की बेल क्यों नहीं रद्द हुई?
सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोपियों को एक ही नजर से नहीं देखा। आरोपी नंबर-5 रंजीत उर्फ दादासो के बारे में कोर्ट ने माना कि वह उस समय घटनास्थल पर मौजूद नहीं था जब मृतक को आग लगाई गई। उसके खिलाफ conspiracy और पेट्रोल उपलब्ध कराने के आरोपों का evidence circumstantial nature का था। इसी materially different position को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसकी bail बरकरार रखी और राज्य की उसके खिलाफ appeal खारिज कर दी। यह distinction महत्वपूर्ण है क्योंकि फैसला यह नहीं कहता कि हत्या के हर आरोपी की bail स्वतः रद्द होनी चाहिए। Court ने प्रत्येक आरोपी की prima facie role और उपलब्ध material को अलग-अलग देखा।
आरोपी नंबर-2 को भी सुप्रीम कोर्ट से बेल नहीं मिली
आरोपी नंबर-2 यश महेश गायकवाड़ ने अपनी bail rejection को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। लेकिन कोर्ट ने उसकी appeal भी खारिज कर दी। दूसरी ओर राज्य की आरोपी नंबर-5 रंजीत के खिलाफ appeal भी खारिज हुई। यानी सुप्रीम कोर्ट ने चारों connected appeals में आरोपियों की व्यक्तिगत भूमिका और उपलब्ध सामग्री के आधार पर अलग-अलग निष्कर्ष निकाले।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने—
आरोपी नंबर-4 ज्योतिरादित्य अजितसिंह जाधव की 12 नवंबर 2025 की bail रद्द की;
आरोपी नंबर-3 पृथ्वीराज राजेंद्र शिंदे की 13 जनवरी 2026 की bail रद्द की;
दोनों को तीन सप्ताह के भीतर surrender करने का निर्देश दिया;
surrender नहीं करने पर trial court को उन्हें गिरफ्तार कर trial के लिए पेश करने की कार्रवाई करने को कहा;
आरोपी नंबर-2 यश महेश गायकवाड़ की bail appeal खारिज की;
आरोपी नंबर-5 रंजीत उर्फ दादासो को मिली bail बरकरार रखी।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को मुकदमे को आदेश पेश किए जाने की तारीख से दो साल के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया।
फैसला merits पर अंतिम राय नहीं है
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सावधानी भी बरती। पीठ ने स्पष्ट किया कि उसके observations केवल bail grant या cancellation के प्रश्न तक सीमित हैं। इन्हें मुकदमे के merits पर अंतिम राय नहीं माना जाएगा और trial court इन टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना मामले का स्वतंत्र रूप से फैसला करेगा।
इस फैसले का बड़ा कानूनी संदेश
यह फैसला यह नहीं कहता कि गंभीर अपराध में हर आरोपी को bail से वंचित किया जाए। बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने एक संतुलित principle दोहराया है—bail पर फैसला करते समय अदालत को detailed trial नहीं करना है, लेकिन गंभीर अपराध में relevant facts को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। खासकर murder जैसे मामलों में bail order से यह स्पष्ट होना चाहिए कि अदालत ने अपराध की प्रकृति, आरोपी की भूमिका, प्रथमदृष्टया evidence, अपराध के तरीके, gravity और अन्य relevant circumstances पर विचार किया है। यही वजह है कि इस मामले में Supreme Court ने सिर्फ यह नहीं देखा कि आरोपियों ने bail की शर्तों का उल्लंघन किया या नहीं, बल्कि यह भी जांचा कि उन्हें bail देते समय नीचे की अदालतों ने अपने judicial discretion का सही इस्तेमाल किया था या नहीं।
