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पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत: UP Police की गिरफ्तारी पर रोक, भविष्य में दर्ज होने वाली FIR पर भी लागू होगा आदेश
राम मंदिर दान विवाद की रिपोर्टिंग से सुर्खियों में आए पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी अंतरिम राहत दी है। CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने उत्तर प्रदेश पुलिस को मौजूदा FIR में ही नहीं, बल्कि भविष्य में दर्ज होने वाली किसी FIR में भी फिलहाल कोई coercive action लेने से रोक दिया है। कोर्ट ने FIR की कॉपी पत्रकार को देने का आदेश देते हुए उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता भी दी है। अब 7 सितंबर की सुनवाई पर गाजियाबाद पुलिस को अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।

नई दिल्ली/लखनऊ।
राम मंदिर दान में कथित चोरी और अनियमितताओं की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी अंतरिम राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को निर्देश दिया है कि उपाध्याय के खिलाफ पहले से दर्ज FIR में फिलहाल कोई coercive action यानी गिरफ्तारी या अन्य दमनात्मक कार्रवाई न की जाए। खास बात यह है कि कोर्ट ने यह अंतरिम सुरक्षा भविष्य में उनके खिलाफ दर्ज की जाने वाली किसी FIR तक भी विस्तारित कर दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने यह आदेश 25 अगस्त 2026 को पारित किया। कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस को संबंधित FIR की कॉपी पत्रकार को उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया है। पुलिस कमिश्नर, गाजियाबाद को अगली सुनवाई पर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी।
‘पहले FIR की कॉपी दीजिए, फिर हाईकोर्ट जाइए’
सुनवाई के दौरान पत्रकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के खिलाफ लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार और मनगढ़ंत हैं। उन्होंने कहा कि जिस घटना को आधार बनाकर FIR दर्ज की गई है, वहां का CCTV फुटेज उपलब्ध है और उससे वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। राय ने यह भी आरोप लगाया कि उपाध्याय के खिलाफ कार्रवाई उनकी खोजी पत्रकारिता और राम मंदिर दान से जुड़े कथित घोटाले को उजागर करने के कारण की जा रही है। उन्होंने निष्पक्ष जांच के लिए जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने की मांग भी रखी। पीठ ने हालांकि इस स्तर पर FIR रद्द करने का अंतिम आदेश नहीं दिया। CJI सूर्यकांत ने संकेत दिया कि FIR की प्रति मिलने के बाद पत्रकार इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं और वहां FIR रद्द करने सहित उपयुक्त राहत मांग सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का अहम अंतरिम आदेश क्या है?
कोर्ट ने अपने आदेश में तीन महत्वपूर्ण बातें कहीं—
अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ पहले से दर्ज FIR में फिलहाल कोई coercive action नहीं लिया जाएगा।
यदि उनके खिलाफ भविष्य में कोई अन्य FIR दर्ज की जाती है, तो उस पर भी यह अंतरिम सुरक्षा लागू रहेगी।
इंदिरापुरम, गाजियाबाद में दर्ज FIR की कॉपी उन्हें तत्काल उपलब्ध कराई जाए ताकि वे उचित कानूनी उपाय अपना सकें।
गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को यह बताना होगा कि FIR की कॉपी उपलब्ध कराने के कोर्ट के निर्देश का पालन हुआ या नहीं। इस संबंध में अनुपालन रिपोर्ट 7 सितंबर को दाखिल की जानी है।
आखिर किस मामले में दर्ज हुई FIR?
उपाध्याय के खिलाफ गाजियाबाद के इंदिरापुरम थाना क्षेत्र में 18 अगस्त को कथित रोड-रेज की घटना को लेकर FIR दर्ज की गई थी। आरोप है कि एक दोपहिया वाहन सवार व्यक्ति के साथ सड़क पर विवाद हुआ और उसके साथ कथित तौर पर मारपीट/धमकी तथा अभद्रता की गई। रिपोर्ट के अनुसार FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधान भी लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि उपाध्याय ने उसके वाहन को पीछे से टक्कर मारी और बाद में उसे धमकाया तथा गाली-गलौज की। उपाध्याय ने इन आरोपों से साफ इनकार किया है।
पत्रकार का दावा—‘घटना वैसी हुई ही नहीं जैसी FIR में बताई गई’
उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में आरोप लगाया कि FIR उनके खिलाफ स्वतंत्र खोजी पत्रकारिता के कारण उत्पीड़न की कोशिश है। उनके अनुसार वह अपनी नाबालिग बेटी को स्कूल से लेकर लौट रहे थे। इसी दौरान एक मोटरसाइकिल सवार उनकी कार के पास आया और विवाद जैसी स्थिति पैदा हुई। याचिका में दावा किया गया कि न तो कोई टक्कर हुई और न ही कोई शारीरिक संघर्ष हुआ। याचिका में CCTV फुटेज को महत्वपूर्ण बताया गया है। उपाध्याय का आरोप है कि घटना वाले स्थान के आसपास मौजूद दुकानदारों से CCTV फुटेज के संबंध में पुलिस ने संपर्क किया और कुछ फुटेज हटाने या उपलब्ध नहीं कराने के लिए दबाव बनाया गया। याचिका में मोटरसाइकिल के नंबर को लेकर भी सवाल उठाया गया है। Bar & Bench के मुताबिक, याचिका में दावा किया गया कि FIR में वाहन के मॉडल और उसके कथित मालिक से संबंधित विवरण वास्तविक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते। इन आरोपों की स्वतंत्र न्यायिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
‘कई FIR हो चुकी हैं, अब नई FIR का डर’—SC में क्या कहा गया?
मामले को तत्काल सूचीबद्ध कराने के दौरान उपाध्याय के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि पत्रकार के खिलाफ पहले से कई FIR दर्ज की जा चुकी हैं और अब SC/ST Act के कड़े प्रावधानों वाली एक और FIR दर्ज की गई है। वकील ने यह भी आरोप लगाया था कि 20 अगस्त को पुलिस की एक टीम उपाध्याय के घर पहुंची थी। इसी वजह से पत्रकार को आशंका थी कि उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। इसी संदर्भ में आज की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य में दर्ज होने वाली FIR को भी अंतरिम सुरक्षा के दायरे में शामिल किया। यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राहत केवल मौजूदा FIR तक सीमित नहीं रखी गई।
राम मंदिर दान विवाद से क्या है कनेक्शन?
अभिषेक उपाध्याय ने अयोध्या स्थित राम मंदिर में श्रद्धालुओं से प्राप्त दान के कथित दुरुपयोग और अनियमितताओं से संबंधित रिपोर्टिंग की थी। इस मामले ने बाद में व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद का रूप लिया। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राम मंदिर दान मामले में जून 2026 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने SIT की प्रारंभिक जांच के आधार पर FIR दर्ज की थी और आठ लोगों की गिरफ्तारी की खबर सामने आई थी। इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि उपाध्याय ने जिस कथित दान घोटाले/अनियमितताओं की रिपोर्टिंग की थी, वह बाद में आधिकारिक जांच और FIR की कार्रवाई तक पहुंचा।
‘यह FIR पत्रकारिता के कारण प्रतिशोध है’—याचिका में आरोप
उपाध्याय की याचिका का मूल आरोप यह है कि रोड-रेज की FIR सामान्य आपराधिक मामला नहीं बल्कि उनकी खोजी पत्रकारिता के खिलाफ कथित प्रतिशोध का हिस्सा है।
उन्होंने FIR रद्द करने की मांग के साथ वैकल्पिक रूप से जांच को उत्तर प्रदेश पुलिस से हटाकर किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने की मांग की है। याचिका में यह भी कहा गया कि वह जांच में सहयोग करने को तैयार हैं। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये सभी आरोप याचिकाकर्ता की ओर से लगाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इन आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है और मामले की जांच/कानूनी merits पर अंतिम फैसला भी नहीं हुआ है।
अनुच्छेद 32 के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचे?
उपाध्याय ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उनका कहना था कि उन्हें तत्काल गिरफ्तारी और अन्य coercive action की आशंका है तथा परिस्थितियों के कारण वह प्रभावी राहत के लिए पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने की स्थिति में नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल FIR को रद्द करने के बजाय अंतरिम सुरक्षा का रास्ता अपनाया है और पत्रकार को FIR की प्रति मिलने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी है।
CJI की टिप्पणी ने क्या संकेत दिया?
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट उपाध्याय की गिरफ्तारी की आशंका को समझता है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर आरोपों की सच्चाई पर टिप्पणी नहीं कर रही है, लेकिन याचिकाकर्ता की आशंका को देखते हुए अंतरिम सुरक्षा दी जा सकती है। इससे साफ है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह तय नहीं किया है कि FIR झूठी है या पत्रकार को जानबूझकर फंसाया गया है। फिलहाल अदालत का फोकस उन्हें कानूनी remedy हासिल करने का पर्याप्त अवसर देने और तब तक coercive action से सुरक्षा देने पर है।
अब आगे क्या होगा?
अब गाजियाबाद पुलिस को उपाध्याय को FIR की पूरी कॉपी उपलब्ध करानी होगी और अगली सुनवाई पर इसकी compliance report सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करनी होगी।
FIR की कॉपी मिलने के बाद उपाध्याय इलाहाबाद हाईकोर्ट में FIR quashing और अन्य उपयुक्त राहत की मांग कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए उन्हें स्पष्ट स्वतंत्रता दी है। 7 सितंबर की सुनवाई में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस कोर्ट के निर्देश का कितना पालन करती है और मामले में आगे जांच किस दिशा में बढ़ती है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह आदेश?
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल एक कथित रोड-रेज FIR तक सीमित नहीं है। एक तरफ पत्रकार का दावा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई उनकी खोजी रिपोर्टिंग से जुड़ी है, वहीं दूसरी ओर पुलिस की FIR में एक अलग आपराधिक घटना के आरोप हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद का अंतिम फैसला किए बिना फिलहाल पत्रकार को गिरफ्तारी और अन्य coercive action से सुरक्षा दी है। साथ ही भविष्य की FIR को भी अंतरिम संरक्षण में शामिल करना इस आदेश का सबसे उल्लेखनीय पहलू है।
अब असली सवाल 7 सितंबर की सुनवाई में सामने आएगा—क्या पुलिस FIR की कॉपी और अनुपालन रिपोर्ट के साथ कोर्ट को संतुष्ट कर पाती है और क्या यह मामला आगे इलाहाबाद हाईकोर्ट में FIR quashing की कार्यवाही तक पहुंचता है।
