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तलाक के समझौते में छोड़े पैसों का दावा DV Act में दोबारा नहीं उठा सकती पत्नी, लेकिन बेटी के अधिकार सुरक्षित: सुप्रीम कोर्ट

तलाक के वक्त पति-पत्नी के बीच हुआ समझौता बाद में नए मुकदमे की जमीन नहीं बन सकता—खासकर तब, जब पत्नी खुद कोर्ट में हलफनामा देकर मेंटेनेंस और तमाम आर्थिक दावों को छोड़ने की पुष्टि कर चुकी हो। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया कि पहले से स्वेच्छा से छोड़े गए पैसों के दावों को DV Act की कार्यवाही के जरिए दोबारा जिंदा नहीं किया जा सकता। हालांकि, इसी फैसले में कोर्ट ने एक अहम संतुलन भी कायम रखा—समझौते में शामिल नहीं रही बालिग बेटी के स्वतंत्र आर्थिक अधिकार खत्म नहीं होंगे।

Sonali25 अग. 2026, 04:51 PM IST
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तलाक के समझौते में छोड़े पैसों का दावा DV Act में दोबारा नहीं उठा सकती पत्नी, लेकिन बेटी के अधिकार सुरक्षित: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली।

 तलाक के समय किया गया समझौता अगर सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि अदालत के सामने भी स्वेच्छा से स्वीकार किया गया हो, तो बाद में उसी समझौते के तहत छोड़े गए आर्थिक दावों को दूसरी कानूनी कार्यवाही के जरिए दोबारा जिंदा नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने 24 अगस्त 2026 को एक अहम फैसले में यह स्पष्ट किया।

जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने पति की अपील स्वीकार करते हुए केरल हाईकोर्ट का 2018 का आदेश रद्द कर दिया और पत्नी की ओर से Domestic Violence Act, 2005 के तहत शुरू की गई कार्यवाही को समाप्त कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने दंपति की बालिग बेटी के अधिकारों को अलग माना, क्योंकि वह पति-पत्नी के बीच हुए Settlement Agreement की पक्षकार नहीं थी।

क्या है पूरा मामला?

मामला Reji Baby और Subi Mary के वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। पति और पत्नी के बीच विवाद के बाद 23 जुलाई 2016 को एक Settlement Agreement हुआ था।

समझौते में दोनों के बीच सभी आर्थिक लेन-देन समाप्त होने की बात कही गई थी। पत्नी ने यह भी स्वीकार किया था कि वह पति से किसी तरह का Maintenance यानी भरण-पोषण भत्ता नहीं मांगेगी और भविष्य में दोनों एक-दूसरे के खिलाफ कोई Financial Claim नहीं करेंगे। इसके बाद दोनों ने Divorce Act, 1869 की Section 10A के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए संयुक्त याचिका दायर की। वर्ष 2017 में तलाक की डिक्री पारित हो गई।

सिर्फ समझौता नहीं, Family Court में हलफनामा भी दिया

सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि पत्नी ने Settlement Agreement पर हस्ताक्षर करने के बाद Family Court में दाखिल Affidavit में भी अपने निर्णय की पुष्टि की थी। हलफनामे में पत्नी ने कहा था कि दोनों के बीच सभी claims और liabilities का निपटारा हो चुका है और उसने पति के खिलाफ अपने maintenance claim को छोड़ दिया है। उसने यह भी कहा था कि आपसी सहमति से तलाक की याचिका उसकी अपनी इच्छा और विवाह समाप्त करने की इच्छा से दायर की जा रही है तथा इसमें कोई coercion या undue pressure नहीं है। यही दस्तावेज बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में निर्णायक साबित हुए।

तलाक के बाद पत्नी-बेटी ने दाखिल की DV Act शिकायत

तलाक की डिक्री के बाद पत्नी और बेटी ने पति के खिलाफ Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 के तहत कार्यवाही शुरू की। पति ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर इस कार्यवाही को रद्द करने की मांग की। उसका तर्क था कि पत्नी ने पहले ही सभी आर्थिक और maintenance claims छोड़ दिए थे और तलाक भी आपसी समझौते के आधार पर हो चुका था। लेकिन 26 अक्टूबर 2018 को केरल हाईकोर्ट ने पति की चुनौती खारिज कर दी। इसके बाद पति ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

पति की सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील थी?

पति की ओर से कहा गया कि DV Act की कार्यवाही में जिन आर्थिक दावों को उठाया गया है, वे उसी पुराने वैवाहिक विवाद से जुड़े हैं जिसका दोनों पक्षों ने Settlement Agreement के जरिए निपटारा कर लिया था। दलील दी गई कि पत्नी ने न केवल समझौते पर हस्ताक्षर किए, बल्कि Family Court में शपथपत्र देकर भी अपने maintenance claim को छोड़ने की पुष्टि की थी। इसलिए बाद में उसी claim को नई कार्यवाही में दोबारा उठाना Settlement Agreement की finality को खत्म करने जैसा होगा।

पत्नी ने कहा- समझौता दबाव में हुआ था

इसके विपरीत पत्नी की ओर से कहा गया कि Settlement Agreement उसकी स्वतंत्र इच्छा से नहीं हुआ था। उसका कहना था कि उस समय वह जल्द से जल्द अमेरिका जाना चाहती थी और इसी वजह से तलाक हासिल करने के लिए उसने समझौते की शर्तें स्वीकार की थीं। यह भी तर्क दिया गया कि Settlement Agreement में पत्नी के maintenance का कोई प्रावधान नहीं था। इसलिए इसे वास्तविक और स्वैच्छिक settlement नहीं माना जाना चाहिए। पत्नी की ओर से यह भी कहा गया कि कानूनी अधिकारों को छोड़ने वाला ऐसा समझौता Public Policy के खिलाफ होने के कारण लागू नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट: सिर्फ दबाव का आरोप पर्याप्त नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों पर गौर करते हुए पाया कि पत्नी ने Settlement Agreement पर हस्ताक्षर करने के साथ-साथ Family Court में affidavit भी दाखिल किया था।

उस affidavit में उसने साफ कहा था कि:

  • सभी दावे और देनदारियां निपट चुकी हैं;

  • उसने maintenance claim छोड़ दिया है;

  • भविष्य में एक-दूसरे के खिलाफ कोई दावा नहीं होगा;

  • mutual-consent divorce अपनी इच्छा से किया जा रहा है;

  • कोई coercion या undue pressure नहीं है।

कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि पत्नी ने Settlement Agreement या Divorce Decree को रद्द कराने के लिए कोई स्वतंत्र कानूनी कार्यवाही शुरू नहीं की थी।

ऐसे में बाद में केवल यह कहना कि समझौता दबाव में हुआ था, पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

पढ़े-लिखे पक्षों के समझौते को कोर्ट ने दिया महत्व

पीठ ने माना कि दोनों पक्ष अच्छी तरह पढ़े-लिखे थे और अपने अधिकारों से परिचित थे। उन्होंने Settlement Agreement और बाद में mutual-consent divorce petition पर हस्ताक्षर किए थे। ऐसे परिस्थितियों में अदालत ने यह माना कि समझौता सोच-समझकर और स्वेच्छा से किया गया था। कोर्ट की reasoning का मूल संदेश यह है कि यदि कोई पक्ष किसी settlement को चुनौती देना चाहता है, तो उसे उचित कानूनी प्रक्रिया के जरिए settlement की वैधता को चुनौती देनी होगी। केवल बाद में दबाव या मजबूरी का सामान्य आरोप लगाकर पहले से स्वीकार किए गए settlement को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।

DV Act की कार्यवाही में पुराने छोड़े गए दावे फिर नहीं उठाए जा सकते

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि DV Act की शिकायत में लगाए गए आरोप और आर्थिक दावे Settlement Agreement से पहले की घटनाओं से जुड़े थे। कोर्ट को तलाक के बाद कोई नया cause of action नहीं दिखा, जिसके आधार पर पत्नी पहले छोड़े गए monetary claims को दोबारा उठा सके। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बार जब पत्नी ने Family Court के समक्ष Settlement Agreement और affidavit के जरिए maintenance समेत आर्थिक दावों को स्वेच्छा से छोड़ दिया, तो बाद की कार्यवाही में उन्हीं दावों को फिर से उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बेटी को लेकर क्यों बदला रुख?

फैसले का सबसे अहम और संतुलित पहलू बेटी के अधिकारों से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी और बेटी के दावों को एक जैसा नहीं माना। Court ने पाया कि Settlement Agreement केवल पति और पत्नी के बीच हुआ था। बेटी उस समझौते की पक्षकार नहीं थी। साथ ही settlement के समय वह बालिग थी। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि बेटी ने भी अपने आर्थिक अधिकार छोड़ दिए थे।

बेटी को नई कार्यवाही की आजादी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बेटी कानून के अनुसार पति के खिलाफ monetary relief पाने के लिए स्वतंत्र रूप से नई कार्यवाही शुरू कर सकती है। हालांकि, ऐसी कार्यवाही में उसे अपने दावे को कानून के अनुसार साबित करना होगा और अदालत उसके मामले का फैसला merits पर करेगी। इस तरह कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच हुए settlement की finality को कायम रखते हुए बेटी के स्वतंत्र अधिकारों को भी सुरक्षित रखा।

Dhananjay Rathi फैसले से कैसे जुड़ता है मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हालिया Dhananjay Rathi v. Ruchika Rathi मामले का भी संदर्भ लिया। इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने matrimonial dispute में mediated settlement की finality और settlement से पीछे हटने के लिए ठोस कानूनी आधार की आवश्यकता पर जोर दिया था। यानी Reji Baby मामले को सुप्रीम कोर्ट की उस व्यापक judicial approach की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा सकता है जिसमें अदालतें वैध, स्वैच्छिक और न्यायिक रूप से स्वीकार किए गए settlements को महत्व दे रही हैं। लेकिन दोनों मामलों में एक बात समझना जरूरी है—यह कोई blanket rule नहीं है कि तलाक के बाद DV Act की कार्यवाही कभी नहीं हो सकती।

मुख्य सवाल यह रहेगा कि:

क्या दावा पहले settlement में स्पष्ट रूप से छोड़ा गया था?

क्या settlement स्वेच्छा से हुआ था?

क्या उसे बाद में कानूनी रूप से चुनौती दी गई?

क्या बाद की कार्यवाही पुराने settled dispute पर आधारित है या कोई नया cause of action सामने आया है?

2018 में Kerala High Court ने क्या कहा था?

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2018 में Kerala High Court ने पति की quashing petition खारिज कर दी थी।High Court के सामने उस समय यह सवाल था कि तलाक के बाद भी पत्नी पुराने matrimonial relationship में हुई alleged domestic violence से जुड़े दावे DV Act के तहत उठा सकती है या नहीं। पति की याचिका खारिज होने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। Supreme Court ने अब Settlement Agreement, पत्नी के affidavit, divorce decree और बाद की DV proceedings को एक साथ देखते हुए अलग निष्कर्ष निकाला। इससे साफ है कि Supreme Court का वर्तमान फैसला केवल “divorce के बाद DV Act लागू नहीं होता” वाली बात नहीं है, बल्कि इस विशेष मामले में पहले से settled और voluntarily waived monetary claims को revive करने के प्रयास से संबंधित है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने पति की अपील स्वीकार करते हुए:

  1. Kerala High Court का 2018 का फैसला रद्द कर दिया।

  2. Judicial First Class Magistrate, Kalamassery के समक्ष पत्नी से संबंधित लंबित DV proceedings को समाप्त कर दिया।

  3. Settlement Agreement के तहत पत्नी द्वारा voluntarily waived किए गए monetary और maintenance claims को दोबारा उठाने की अनुमति नहीं दी।

  4. बेटी को उसके स्वतंत्र आर्थिक अधिकारों के लिए नई कानूनी कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता दी।

  5. स्पष्ट किया कि बेटी की ऐसी कार्यवाही का फैसला उसके अपने merits पर किया जाएगा।

फैसले का कानूनी मतलब क्या है?

इस फैसले को यह कहकर नहीं समझना चाहिए कि “तलाक के बाद महिला DV Act के तहत केस नहीं कर सकती।”

सुप्रीम कोर्ट ने इससे कहीं अधिक सीमित और तथ्य-विशिष्ट सिद्धांत लागू किया है।

जहां पत्नी ने:

  • settlement पर स्वयं हस्ताक्षर किए हों,

  • Family Court के सामने उसी settlement की पुष्टि की हो,

  • maintenance और monetary claims छोड़ने की बात affidavit में कही हो,

  • mutual-consent divorce लिया हो,

  • और बाद में settlement या divorce decree को कानूनी रूप से चुनौती भी न दी हो,

वहां उन्हीं पुराने और छोड़े गए आर्थिक दावों को दूसरी कार्यवाही में फिर से उठाना स्वीकार्य नहीं होगा। वहीं, settlement में शामिल नहीं रहे व्यक्ति के स्वतंत्र अधिकार अपने आप समाप्त नहीं होंगे। सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है—अदालत के सामने सोच-समझकर और स्वेच्छा से किया गया settlement केवल इसलिए बेअसर नहीं हो सकता कि बाद में पक्षकार का रुख बदल गया। लेकिन settlement की finality का मतलब यह भी नहीं है कि ऐसे व्यक्ति के स्वतंत्र कानूनी अधिकार खत्म हो जाएं जो उस समझौते का पक्षकार ही नहीं था। इसीलिए पत्नी के पुराने waived monetary claims पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बालिग बेटी के स्वतंत्र दावों का रास्ता खुला रखा।