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40 साल तक पैरोल पर जेल से बाहर रहा उम्रकैद का कैदी, सरकारी शिक्षक बनकर जीता ‘बेस्ट टीचर’ अवॉर्ड; 73 की उम्र में पत्नी की पैरोल मांग भी खारिज

73 साल की उम्र में पैरोल की गुहार लेकर हाईकोर्ट पहुंची पत्नी को अदालत से राहत नहीं मिली। वजह सिर्फ उम्र नहीं, बल्कि उस कैदी की 40 साल पुरानी कहानी है—हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा के बाद पैरोल पर जेल से निकला शख्स वापस ही नहीं लौटा। चार दशक तक पुलिस की पकड़ से दूर रहकर वह सरकारी शिक्षक बना, ‘बेस्ट टीचर’ का पुरस्कार पाया और नौकरी से रिटायर भी हो गया। 40 साल बाद गिरफ्तारी हुई तो अब पैरोल की मांग पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया।

Sonali26 अग. 2026, 01:46 PM IST
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40 साल तक पैरोल पर जेल से बाहर रहा उम्रकैद का कैदी, सरकारी शिक्षक बनकर जीता ‘बेस्ट टीचर’ अवॉर्ड; 73 की उम्र में पत्नी की पैरोल मांग भी खारिज

हैदराबाद: 

तेलंगाना हाईकोर्ट के सामने एक ऐसा मामला आया है, जिसने जेल प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाए एक कैदी ने 1983 में पैरोल पर जेल से बाहर आने के बाद करीब 40 साल तक जेल का मुंह नहीं देखा। इस दौरान उसने सरकारी शिक्षक की नौकरी हासिल की, 2004 में ‘बेस्ट टीचर’ पुरस्कार भी प्राप्त किया और 2013 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो गया। लेकिन चार दशक बाद मई 2024 में स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने उसे पकड़ लिया। अब 73 वर्षीय कैदी की पत्नी ने पैरोल और फर्लो पर लगी तीन साल की रोक को चुनौती देते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। जस्टिस टी. माधवी देवी ने याचिका खारिज कर दी। अदालत ने साथ ही पैरोल पर रिहा होने वाले कैदियों की निगरानी के लिए बेहतर व्यवस्था और विशेष टास्क फोर्स गठित करने के निर्देश दिए।

ऑर्डर कब हुआ?

तेलंगाना हाईकोर्ट का यह फैसला अगस्त 2026 में आया। 25 अगस्त 2026 की रिपोर्टों में फैसले को विस्तार से प्रकाशित किया गया है। अदालत की अध्यक्षता जस्टिस टी. माधवी देवी ने की। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार हाईकोर्ट ने पत्नी की याचिका खारिज करते हुए कैदी पर लगाए गए तीन साल के पैरोल और फर्लो प्रतिबंध को बरकरार रखा।

1983 में हत्या के मामले में मिली थी उम्रकैद

अदालत के सामने रखे रिकॉर्ड के मुताबिक, Sandula Veerana को 1983 में वारंगल की एक जिला अदालत ने हत्या और दंगा संबंधी मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। सजा काटने के करीब छह महीने बाद उसे 17 दिसंबर 1983 को 30 दिनों की पैरोल मिली। बाद में पैरोल की अवधि बढ़ाकर 17 मार्च 1984 तक कर दी गई। उसे 18 मार्च 1984 को जेल में वापस रिपोर्ट करना था, लेकिन वह वापस नहीं लौटा।

जेल से बाहर रहकर बन गया सरकारी शिक्षक

जेल लौटने के बजाय Veerana ने बाहर रहकर सामान्य जीवन जीना शुरू कर दिया। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार उसने आंध्र प्रदेश के गुडिवाडा में सरकारी शिक्षक की नौकरी हासिल की और वर्षों तक सेवा करता रहा। इतना ही नहीं, उसे 2004 में ‘बेस्ट टीचर’ अवॉर्ड भी मिला। वह 2013 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुआ और इसके बाद पेंशन भी प्राप्त करता रहा। यानी जिस व्यक्ति को उम्रकैद की सजा काटनी थी, उसने करीब चार दशकों तक जेल से बाहर रहकर सरकारी नौकरी की और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहा।

40 साल बाद STF ने ऐसे पकड़ा

करीब चार दशक तक जेल वापस नहीं लौटने वाले Veerana को आखिरकार 16 मई 2024 को स्पेशल टास्क फोर्स ने गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद उसे केंद्रीय जेल भेज दिया गया और बाद में वह Cherlapalli Central Prison में बंद है। रिपोर्टों के मुताबिक, जेल प्रशासन ने उसके लंबे समय तक फरार रहने के मामले में कार्रवाई करते हुए उसकी करीब 27 दिनों की अर्जित रिमिशन भी जब्त कर ली और तीन साल के लिए पैरोल तथा फर्लो पर रोक लगा दी। यह रोक मेडिकल आधार पर मांगी जाने वाली पैरोल पर भी लागू थी।

पत्नी ने हाईकोर्ट में क्या दलील दी?

कैदी की पत्नी Sandela Charamma ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर प्रशासनिक कार्रवाई को चुनौती दी। उसकी ओर से दलील दी गई कि राज्य ने करीब 40 वर्षों तक उसके पति को पकड़ने के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं की और अब इतने लंबे समय बाद दंडात्मक कार्रवाई करना उचित नहीं है। पत्नी ने यह भी बताया कि उसका पति 73 वर्ष का है और उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहा है। परिवार की परिस्थितियों का हवाला देते हुए पैरोल की मांग की गई। याचिका में पैरोल से जुड़े तेलंगाना के नियमों का भी हवाला दिया गया था।

हाईकोर्ट ने राहत देने से क्यों इनकार किया?

हाईकोर्ट ने माना कि Veerana ने पैरोल की अवधि समाप्त होने के बाद स्वेच्छा से जेल में वापस रिपोर्ट नहीं किया था। इसके बजाय उसने गिरफ्तारी से बचने के लिए जानबूझकर खुद को कानून की पहुंच से दूर रखा। अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि उसने सरकारी शिक्षक के रूप में नौकरी की और सेवानिवृत्ति तक सेवा की। कोर्ट के मुताबिक, इससे यह संकेत मिलता है कि उसने अपनी सजा और दोषसिद्धि को छिपाकर सरकारी नौकरी हासिल की। अदालत ने यह भी कहा कि उसने अपनी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा जेल से बाहर रहकर बिताया और उन सभी लाभों का आनंद लिया, जो उसे उम्रकैद की सजा के दौरान नहीं मिलने चाहिए थे।

मेडिकल ग्राउंड पर भी पैरोल नहीं

73 वर्ष की उम्र और स्वास्थ्य संबंधी दलीलों के बावजूद हाईकोर्ट ने मेडिकल आधार पर भी पैरोल देने से इनकार कर दिया। अदालत ने जेल प्रशासन के जवाब का हवाला देते हुए कहा कि जेल में चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं। रिपोर्टों के अनुसार Cherlapalli Central Prison में 50 बेड का अस्पताल है और अदालत ने माना कि उम्र संबंधी सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं का वहां इलाज किया जा सकता है।

40 साल तक कैदी का पता न लगने पर जेल प्रशासन पर सवाल

इस मामले में हाईकोर्ट ने केवल कैदी को राहत देने से इनकार नहीं किया, बल्कि जेल और पुलिस प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि एक कैदी का 40 वर्षों तक पैरोल के बाद वापस जेल न लौटना, इस दौरान सरकारी नौकरी करना और सेवानिवृत्त हो जाना जेल अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति से दूसरे कैदियों को भी पैरोल का दुरुपयोग करने और लंबे समय तक फरार रहने का हौसला मिल सकता है।

पैरोल पर बाहर जाने वाले कैदियों की निगरानी के लिए STF

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पैरोल पर छोड़े गए कैदियों की निगरानी के लिए प्रभावी दिशानिर्देश और व्यवस्था तैयार करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह सुनिश्चित करने के लिए विशेष टास्क फोर्स गठित करने को कहा कि पैरोल की अवधि समाप्त होने पर कैदी समय पर जेल लौटें और उनके ठिकाने की निगरानी की जा सके।

अदालत ने पुराने मामले से भी की तुलना

अदालत ने 81 वर्षीय और बिस्तर पर रहने वाली एक महिला कैदी से संबंधित ‘Kailash Wati v. State of Delhi’ मामले को भी अलग माना। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में कैदी ने अपनी सजा का बड़ा हिस्सा जेल से बाहर रहकर बिताया और फरारी के दौरान सक्रिय रूप से सरकारी नौकरी की। इसलिए केवल उम्र अधिक होने के आधार पर उसे पैरोल का लाभ देना उचित नहीं होगा।

अब क्या होगा?

तेलंगाना हाईकोर्ट द्वारा पत्नी की याचिका खारिज किए जाने के बाद Veerana को अपनी उम्रकैद की शेष सजा जेल में ही काटनी होगी। अदालत ने उसके खिलाफ पैरोल और फर्लो पर तीन साल की रोक को बरकरार रखा है। यह मामला एक तरफ पैरोल के दुरुपयोग और दूसरी तरफ जेल प्रशासन की निगरानी व्यवस्था की बड़ी खामी को सामने लाता है। चार दशक तक एक उम्रकैद का कैदी सरकारी शिक्षक के रूप में नौकरी करता रहा और सेवानिवृत्त भी हो गया, जबकि उसे 1984 में ही जेल वापस लौटना था।