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15 साल से कब्जे में थी Defence Land, Pune में JCB से हटाए गए अवैध ढांचे
पुणे: महाराष्ट्र के पुणे स्थित लुल्लानगर में रक्षा विभाग ने करीब 15 साल पुराने कथित अतिक्रमण के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है। रक्षा संपदा कार्यालय ने लगभग 1.2 एकड़ Defence Land को कब्जामुक्त कराया। अभियान के दौरान जमीन पर बने टिन शेड और लोहे के ढांचे हटाए गए। अब जमीन की बाड़बंदी कर इसे दोबारा अतिक्रमण से बचाने की तैयारी है।

पुणे: महाराष्ट्र के पुणे में रक्षा भूमि पर लंबे समय से चले आ रहे कथित अतिक्रमण के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की गई है। लुल्लानगर इलाके में रक्षा संपदा कार्यालय (DEO), दक्षिणी कमान ने करीब 1.2 एकड़ महत्वपूर्ण रक्षा भूमि को लगभग 15 साल बाद अतिक्रमण मुक्त कराया। मंगलवार को चलाए गए अभियान में जेसीबी मशीनों की मदद से जमीन पर बने सैकड़ों टिन शेड और लोहे के ढांचे हटाए गए। अधिकारियों के मुताबिक, जमीन पर लंबे समय से निजी ठेकेदारों द्वारा अनधिकृत कब्जे का आरोप था। कार्रवाई के बाद अब जमीन की बाड़बंदी की जाएगी, ताकि दोबारा अतिक्रमण न हो।
2011 से जमीन पर कथित कब्जा
रिपोर्ट के अनुसार, लुल्लानगर की इस रक्षा भूमि पर करीब वर्ष 2011 से कथित तौर पर अनधिकृत कब्जा था। जमीन पर धीरे-धीरे बड़ी संख्या में टिन शेड, लोहे के ढांचे और अन्य अस्थायी निर्माण खड़े हो गए थे। बताया गया है कि इस जमीन का इस्तेमाल मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (MES) से जुड़े निजी ठेकेदारों द्वारा किया जा रहा था। चूंकि ये ठेकेदार रक्षा प्रतिष्ठानों से जुड़े काम करते थे, इसलिए लंबे समय तक जमीन के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठ रहे हैं। करीब 15 वर्षों तक कब्जा बने रहने की वजह से यह मामला सिर्फ अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी जमीन की निगरानी और उसकी सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
करोड़ों रुपये की बताई जा रही जमीन
लुल्लानगर की यह जमीन बेहद महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित बताई जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, जमीन प्रिंसिपल डायरेक्टर, डिफेंस एस्टेट्स के कार्यालय से करीब 500 मीटर की दूरी पर है। इसके अलावा यह दक्षिणी कमान अस्पताल समेत कई महत्वपूर्ण रक्षा प्रतिष्ठानों के आसपास स्थित है। ऐसे में रक्षा भूमि पर लंबे समय तक अस्थायी ढांचे बने रहने को लेकर सुरक्षा और प्रशासनिक निगरानी पर भी सवाल उठे हैं। रिपोर्टों में जमीन को करोड़ों रुपये मूल्य की महत्वपूर्ण रक्षा संपत्ति बताया गया है।
जेसीबी से हटाए गए सैकड़ों ढांचे
मंगलवार को रक्षा संपदा कार्यालय की टीम ने जमीन खाली कराने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया। कार्रवाई में जेसीबी मशीनों और मजदूरों की मदद ली गई। जमीन पर मौजूद टिन शेड और लोहे के ढांचों को एक-एक करके हटाया गया। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, पूरी कार्रवाई करीब छह घंटे में पूरी हुई। अभियान के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की तैनाती भी की गई थी। रक्षा संपदा कार्यालय के अधिकारियों की मौजूदगी में जमीन को खाली कराकर उसका कब्जा रक्षा विभाग ने वापस ले लिया।
पहले भी जारी किए गए थे नोटिस
रक्षा संपदा कार्यालय के अनुसार, जमीन खाली कराने के लिए पहले भी संबंधित लोगों को नोटिस दिए गए थे। अधिकारियों ने बताया कि जमीन खाली कराने के प्रयास पहले भी किए गए, लेकिन विभाग पहले इसका वास्तविक कब्जा हासिल नहीं कर सका था। रक्षा संपदा अधिकारी पुणे विकास कुमार के अनुसार, संबंधित ठेकेदारों ने लंबे समय तक जमीन खाली नहीं की। कुछ कब्जाधारियों की ओर से अदालत का रुख किए जाने की बात भी सामने आई है। हालांकि, अधिकारियों के अनुसार इससे जमीन के कथित अनधिकृत इस्तेमाल की स्थिति नहीं बदली।
A-2 श्रेणी की रक्षा भूमि
यह जमीन रक्षा रिकॉर्ड में A-2 श्रेणी की रक्षा भूमि के रूप में दर्ज बताई गई है। रक्षा संपदा कार्यालय रक्षा भूमि के रिकॉर्ड और उसकी देखरेख से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालता है। एक हालिया नोटिस में पुणे कैंटोनमेंट की रक्षा भूमि से अनधिकृत कब्जा हटाने के लिए संबंधित कब्जाधारियों को जमीन खाली करने का निर्देश दिया गया था। नोटिस में अस्थायी ढांचे हटाने और जमीन का शांतिपूर्ण कब्जा रक्षा विभाग को सौंपने की बात कही गई थी।
अब जमीन की होगी बाड़बंदी
अतिक्रमण हटाने के बाद रक्षा संपदा कार्यालय अब जमीन की बाड़बंदी कराने की तैयारी कर रहा है। इसका उद्देश्य खाली कराई गई जमीन को दोबारा कब्जे से सुरक्षित रखना है। इसके साथ ही विभाग की ओर से जमीन के कथित अनधिकृत इस्तेमाल की अवधि के लिए Occupation Charges यानी उपयोग शुल्क की वसूली की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जाएगी। इससे लंबे समय तक सरकारी जमीन के अनधिकृत इस्तेमाल से जुड़े वित्तीय नुकसान की भरपाई का रास्ता खुलेगा।
15 साल तक कब्जा कैसे बना रहा?
इस कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर जमीन पर वर्ष 2011 से कथित अनधिकृत कब्जा था, तो इसे इतने लंबे समय तक हटाया क्यों नहीं जा सका। स्थानीय नागरिक कार्यकर्ताओं ने मामले की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि जमीन पर कब्जे की शुरुआत कैसे हुई, संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी कब मिली और पहले जारी किए गए नोटिस के बाद भी कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई। खास तौर पर यह सवाल उठ रहा है कि जब जमीन रक्षा प्रतिष्ठानों और वरिष्ठ रक्षा संपदा अधिकारियों के कार्यालय के नजदीक थी, तो वहां सैकड़ों अस्थायी ढांचे बनने तक प्रभावी निगरानी क्यों नहीं हो सकी।
MES से जुड़े ठेकेदारों की भूमिका पर भी सवाल
मामले में मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस (MES) से जुड़े निजी ठेकेदारों की भूमिका भी चर्चा में है। रिपोर्टों के मुताबिक, जमीन का इस्तेमाल इन्हीं से जुड़े ठेकेदारों द्वारा किए जाने का आरोप है। इसी वजह से अब यह सवाल भी उठ रहा है कि ठेकेदारों को जमीन का इस्तेमाल किस आधार पर मिला था और यदि इस्तेमाल की कोई वैध अनुमति नहीं थी, तो उन्हें इतने लंबे समय तक वहां बने रहने की अनुमति कैसे मिली। स्थानीय कार्यकर्ताओं ने पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदारी तय करने की मांग की है।
पुणे की दूसरी रक्षा जमीनों पर भी बढ़ी चिंता
लुल्लानगर की कार्रवाई ने पुणे और खड़की की दूसरी रक्षा जमीनों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। अधिकारियों और कार्यकर्ताओं के मुताबिक, कुछ खाली रक्षा भूखंड अतिक्रमण के अलावा कचरा और निर्माण मलबा डालने तथा अनधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल के लिहाज से भी संवेदनशील हैं। रिपोर्ट में पुणे के अन्य इलाकों में पहले से खाली कराई गई रक्षा जमीन पर दोबारा कब्जे की आशंका का भी उल्लेख किया गया है। ऐसे में लुल्लानगर की कार्रवाई के बाद अब दूसरी रक्षा संपत्तियों की निगरानी बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।
करीब 72 हजार एकड़ रक्षा भूमि की जिम्मेदारी
रक्षा संपदा कार्यालय, पुणे सर्किल की जिम्मेदारी बड़े क्षेत्र में फैली रक्षा भूमि के रिकॉर्ड और देखरेख से जुड़ी है। रिपोर्ट के अनुसार, इसके अधिकार क्षेत्र में करीब 72,000 एकड़ रक्षा भूमि आती है। इसमें पुणे, खड़की, देहू रोड, अहमदनगर और औरंगाबाद के कैंटोनमेंट क्षेत्रों के साथ पुणे, सातारा, सांगली, कोल्हापुर, रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और अन्य जिलों की रक्षा भूमि भी शामिल है।
अब जांच और जवाबदेही पर नजर
लुल्लानगर में करीब 1.2 एकड़ जमीन को आखिरकार अतिक्रमण मुक्त करा लिया गया है, लेकिन अब इस मामले का अगला महत्वपूर्ण पहलू जवाबदेही तय करना होगा। जमीन पर कथित कब्जा कब शुरू हुआ, इसकी जानकारी अधिकारियों को कब मिली, कितने नोटिस जारी किए गए, कार्रवाई में देरी क्यों हुई और जमीन का इस्तेमाल किस आधार पर किया जा रहा था—इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी हैं। फिलहाल रक्षा विभाग ने जमीन वापस अपने नियंत्रण में ले ली है। बाड़बंदी और उपयोग शुल्क की वसूली के बाद यह देखना अहम होगा कि भविष्य में इस जमीन पर दोबारा अतिक्रमण न हो और पुणे की अन्य रक्षा संपत्तियों की सुरक्षा के लिए भी प्रभावी कदम उठाए जाएं।
