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दहेज मांगने वालों पर अब सख्ती की तैयारी, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और हाईकोर्ट्स को दिए बड़े निर्देश; 304-B और 498-A के मामलों की होगी कड़ी निगरानी
दहेज मांगने वालों की अब खैर नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रथा के खिलाफ बड़ा कदम उठाते हुए राज्यों, हाईकोर्ट्स और ट्रायल कोर्ट्स को साफ संदेश दिया है कि ऐसे मामलों को सालों तक तारीखों में नहीं उलझाया जा सकता। 304-B और 498-A जैसे गंभीर मामलों की निगरानी से लेकर पुराने केसों की पहचान, समय पर आरोप तय करने, गवाहों की सुनवाई और नियमित Compliance Report तक—सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी व्यवस्था बनाने पर जोर दिया है, जिससे दहेज के मामलों में कानून का असर जमीन पर दिखाई दे। खास बात यह है कि कोर्ट ने दहेज को सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि महिलाओं की समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय से जुड़ा गंभीर मुद्दा माना है।

नई दिल्ली:
दहेज जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने अब सिर्फ कानून बनाने तक सीमित रहने के बजाय उसके जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दहेज से जुड़े मामलों में जांच, ट्रायल और निगरानी की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, हाईकोर्ट्स और ट्रायल कोर्ट्स को कई महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा है कि दहेज के मामलों में कानून का प्रभावी इस्तेमाल, सामाजिक जागरूकता और मुकदमों का समयबद्ध निपटारा—तीनों पर एक साथ काम करना जरूरी है। यह आदेश 20 अगस्त 2026 को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने State of U.P. v. Ajmal Beg मामले में जारी किया। यह मामला सुप्रीम कोर्ट के 15 दिसंबर 2025 के फैसले में दिए गए निर्देशों के अनुपालन से जुड़ा था। नई सुनवाई में कोर्ट ने दहेज निषेध कानून और IPC की धारा 304-B व 498-A तथा इनके समकक्ष BNS की धाराओं 80 और 85 के मामलों की स्थिति पर गंभीरता से निगरानी जारी रखने का फैसला किया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिए ये निर्देश?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में दहेज प्रथा को गहरी सामाजिक जड़ें रखने वाली समस्या बताया। अदालत ने चिंता जताई कि कई मामलों में दहेज मांगने और देने की प्रथा खुले तौर पर जारी रहने के बावजूद लोग कानून की कार्रवाई से बच जाते हैं। कोर्ट ने माना कि केवल कानून मौजूद होना पर्याप्त नहीं है। पुलिस, अभियोजन, न्यायपालिका, प्रशासन और समाज—सभी को मिलकर दहेज प्रथा के खिलाफ काम करना होगा। अदालत ने विशेष रूप से मुकदमों में होने वाली देरी और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की कमी को दूर करने पर जोर दिया।
3 साल से ज्यादा पुराने मामलों की होगी पहचान
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिला न्यायपालिका को उन मामलों की पहचान करनी चाहिए जो तीन साल से अधिक समय से लंबित हैं। खास तौर पर वे मामले जिनमें अभी आरोप तय नहीं हुए हैं या साक्ष्य दर्ज किए जाने की प्रक्रिया लंबित है, उनकी नियमित निगरानी की जाए। इसके लिए मासिक या त्रैमासिक समीक्षा व्यवस्था अपनाने की बात कही गई है, ताकि पुराने मुकदमे केवल तारीख पर तारीख के कारण लंबित न रहें।
60 से 90 दिन में आरोप तय करने की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट्स से कहा है कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी की उपस्थिति जल्द सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाए और सामान्य परिस्थितियों में चार्जशीट दाखिल होने के 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप तय करने की कोशिश की जाए। आरोप तय होने के बाद साक्ष्य की रिकॉर्डिंग भी उचित समय में शुरू होनी चाहिए। कोर्ट ने CrPC की धारा 309 और BNSS की धारा 346 के अनुरूप साक्ष्य की कार्यवाही लगातार या दिन-प्रतिदिन आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये समय-सीमाएं सामान्य तौर पर दिशानिर्देशात्मक मानक हैं। कई आरोपी, अतिरिक्त चार्जशीट, फॉरेंसिक रिपोर्ट में देरी, आरोपी की अनुपलब्धता या अन्य असाधारण परिस्थितियों में देरी हो सकती है, लेकिन उसके कारण रिकॉर्ड किए जाने चाहिए।
बार-बार तारीख लेने पर भी रोक
कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट्स को अनावश्यक स्थगन यानी adjournment से बचने का निर्देश दिया है। यदि स्थगन दिया जाता है तो उसके कारण लिखित रूप में दर्ज किए जाने चाहिए। अगर आरोपी का वकील पर्याप्त कारण के बिना बार-बार अनुपस्थित रहता है तो कार्यवाही को अनावश्यक रूप से रोकने के बजाय उचित परिस्थितियों में Legal Aid Counsel या Amicus Curiae की सहायता ली जा सकती है।
गवाहों के लिए बनेगा Witness Calendar
आरोप तय होने के तुरंत बाद ट्रायल कोर्ट को, जहां व्यावहारिक हो, महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही, समन की सेवा और साक्ष्य की क्रमबद्धता के लिए Witness Calendar तैयार करना चाहिए। इसका उद्देश्य गवाहों की बार-बार अनुपस्थिति और तारीखों के दोहराव के कारण होने वाली देरी को कम करना है। जांच अधिकारियों को भी समन की समय पर तामील और गवाहों की पेशी सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है।
हाईकोर्ट्स में डिजिटल मॉनिटरिंग पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स को मौजूदा Court Dashboards और CIS infrastructure के भीतर दहेज मामलों की डिजिटल निगरानी की व्यवस्था विकसित करने का प्रयास करने को कहा है। इसमें स्टेज-वाइज पेंडेंसी ट्रैकिंग, डिजिटल डैशबोर्ड, पुराने मामलों के लिए ऑटोमेटेड अलर्ट और केस मॉनिटरिंग सिस्टम शामिल हैं। इसका सीधा उद्देश्य यह पता लगाना है कि कोई मामला किस चरण में लंबित है और किन पुराने मामलों पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
हाईकोर्ट्स पुराने अपील और जमानत मामलों की भी समीक्षा करें
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स को पुराने आपराधिक अपील, रिवीजन, CrPC की धारा 482/BNSS की धारा 528 के तहत लंबित याचिकाओं और जमानत मामलों की समय-समय पर समीक्षा करने को कहा है। विशेष रूप से उन मामलों पर ध्यान देने की बात कही गई है जिनमें ट्रायल पर अंतरिम रोक लगी हुई है। ऐसे मामलों में कानून के अनुसार स्टे आदेशों की समय-समय पर समीक्षा और मामलों की शीघ्र सुनवाई की दिशा में कदम उठाने को कहा गया है।
Dowry Prohibition Officers की भूमिका होगी मजबूत
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को Dowry Prohibition Officers के प्रभावी कामकाज और उनके बारे में लोगों तक जानकारी पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करने को कहा गया है। इसके साथ ही One Stop Centres, Family Counselling Centres, Women Help Desks, पीड़ित सहायता तंत्र, हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली को भी मजबूत करने का निर्देश दिया गया है, ताकि पीड़ित महिलाओं को सहायता और कानूनी उपाय आसानी से मिल सकें।
स्कूल-कॉलेजों और समाज में जागरूकता अभियान
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दहेज के खिलाफ लड़ाई केवल अदालतों और पुलिस तक सीमित नहीं रह सकती। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शिक्षा विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, State Legal Services Authorities और अन्य संबंधित संस्थाओं के साथ मिलकर दहेज प्रथा, लैंगिक समानता, संवैधानिक मूल्यों और महिलाओं के अधिकारों पर लगातार जागरूकता कार्यक्रम चलाने चाहिए। शैक्षणिक पाठ्यक्रम, जन-जागरूकता अभियान, सामुदायिक कार्यक्रम और कानूनी साक्षरता कार्यक्रम इसके माध्यम हो सकते हैं।
पुलिस, जज और अभियोजकों की ट्रेनिंग भी होगी
अदालत ने Judicial Officers, Police Officials, Prosecutors, Protection Officers और Counsellors समेत दहेज मामलों से जुड़े अन्य अधिकारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण और संवेदनशीलता कार्यक्रम आयोजित करने पर जोर दिया है। राज्यों को यह प्रयास करने के लिए भी कहा गया है कि IPC की धारा 304-B और 498-A से जुड़े मामलों की पैरवी के लिए महिलाओं के खिलाफ अपराधों से संबंधित अनुभव रखने वाले संवेदनशील अभियोजकों को नामित किया जाए।
हर साल तीन बार सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि सभी हाईकोर्ट्स और राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों को 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को स्टेटस एवं Compliance Reports दाखिल करनी होंगी। इन रिपोर्टों में लंबित और निस्तारित मामलों के आंकड़े, मामलों की वर्तमान स्थिति, जागरूकता अभियान, Dowry Prohibition Officers की नियुक्ति/नामांकन, प्रशिक्षण कार्यक्रम और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर की गई कार्रवाई का विवरण देना होगा। यह रिपोर्टिंग तब तक जारी रहेगी जब तक 304-B, 498-A और Dowry Prohibition Act से जुड़े मामलों की लंबित संख्या में पर्याप्त कमी नहीं आती। मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर 2026 को Compliance-cum-Periodic Reports पर विचार के लिए सूचीबद्ध की गई है।
2025 के Ajmal Beg फैसले से कैसे जुड़ा है पूरा मामला?
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि सुप्रीम कोर्ट का 15 दिसंबर 2025 का State of U.P. v. Ajmal Beg फैसला है। उस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई बरी करने की राहत को चुनौती दी थी। मामला एक युवती की दहेज मृत्यु से जुड़ा था। रिकॉर्ड के अनुसार विवाह के करीब एक साल बाद महिला की मृत्यु हुई और अभियोजन के अनुसार रंगीन टीवी, मोटरसाइकिल और 15,000 रुपये की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का बरी करने वाला फैसला पलटते हुए ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि बहाल कर दी थी। 15 दिसंबर 2025 के फैसले की पीठ में जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमईकापम कोटिश्वर सिंह शामिल थे। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दहेज को गंभीर सामाजिक बुराई बताते हुए कहा था कि इसे समाप्त करना केवल Dowry Prohibition Act लागू करने का प्रश्न नहीं, बल्कि संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय से जुड़ा विषय है। अदालत ने जमीनी स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाने और संबंधित संस्थाओं को सक्रिय करने की दिशा में भी निर्देश दिए थे।
जस्टिस संजय करोल की सख्त टिप्पणी: दहेज सिर्फ कानून का नहीं, संवैधानिक समानता का सवाल
15 दिसंबर 2025 के State of U.P. v. Ajmal Beg फैसले में जस्टिस संजय करोल ने दहेज प्रथा को केवल एक आपराधिक कानून के उल्लंघन के रूप में देखने के बजाय व्यापक सामाजिक और संवैधानिक समस्या के रूप में रेखांकित किया। फैसले में दहेज को समाज में गहरी जड़ें जमा चुकी बुराई बताया गया और इसके उन्मूलन के लिए व्यापक संस्थागत प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया गया। जस्टिस संजय करोल की लिखी इस judgment में यह स्पष्ट किया गया कि दहेज के खिलाफ लड़ाई केवल Dowry Prohibition Act, 1961 के तहत कार्रवाई करने से पूरी नहीं होगी। इसके लिए सामाजिक सोच में बदलाव, महिलाओं की समानता और गरिमा की रक्षा तथा संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करना भी जरूरी है।
शादी में महिला को समान अधिकार और सम्मान मिले
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्वपूर्ण संदेश यह था कि विवाह को ऐसी व्यवस्था नहीं बनाया जा सकता जिसमें महिला या उसके परिवार पर आर्थिक मांगों का बोझ डाला जाए। विवाह में महिला की स्थिति समान अधिकार और सम्मान वाली होनी चाहिए। कोर्ट ने आने वाली पीढ़ी को दहेज जैसी सामाजिक बुराई के प्रति संवेदनशील बनाने और विवाह में समानता की सोच विकसित करने की जरूरत पर भी जोर दिया था। यही वजह है कि अदालत ने सामाजिक जागरूकता और शैक्षणिक कार्यक्रमों को भी दहेज उन्मूलन की रणनीति का हिस्सा माना।
दहेज के खिलाफ लड़ाई अदालत से आगे समाज तक
सुप्रीम कोर्ट की सोच का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दहेज की समस्या का समाधान सिर्फ FIR, चार्जशीट और सजा से नहीं होगा। इसके लिए प्रशासन, न्यायपालिका, पुलिस, शिक्षण संस्थानों और समाज—सभी को साथ काम करना होगा। इसी व्यापक दृष्टिकोण के कारण कोर्ट ने दहेज मामलों की तेज सुनवाई के साथ-साथ जागरूकता अभियान, Dowry Prohibition Officers की प्रभावी भूमिका, अधिकारियों की ट्रेनिंग और लंबित मुकदमों की निगरानी जैसे कदमों पर जोर दिया है। 20 अगस्त 2026 के नए आदेश में इन्हीं प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए संस्थागत समर्थन, जागरूकता, केस मॉनिटरिंग और प्रशिक्षण के लिए विस्तृत निर्देश दिए गए हैं।
यही वजह है कि 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने निगरानी और कड़ी की
15 दिसंबर 2025 के फैसले में दिए गए व्यापक निर्देशों के अनुपालन को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 20 अगस्त 2026 की सुनवाई में राज्यों और हाईकोर्ट्स से दहेज से जुड़े मामलों की स्थिति पर नियमित रिपोर्टिंग और निगरानी जारी रखने को कहा। इसका मतलब साफ है—सुप्रीम कोर्ट अब दहेज के खिलाफ अपने निर्देशों को केवल कागजी आदेश बनाकर छोड़ने के बजाय उनके वास्तविक क्रियान्वयन पर भी नजर रख रहा है। कोर्ट ने हर साल 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को Compliance Reports दाखिल करने का निर्देश दिया है और मामले को 15 अक्टूबर 2026 को फिर सूचीबद्ध किया है।
IPC से BNS तक क्या बदला?
2023 में लागू Bharatiya Nyaya Sanhita के बाद पुराने IPC प्रावधानों के समकक्ष नए प्रावधान लागू हैं। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा निर्देशों में दहेज मृत्यु से संबंधित IPC की धारा 304-B और पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता से संबंधित धारा 498-A के साथ BNS की संबंधित धाराओं 80 और 85 का भी उल्लेख किया गया है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान आदेश पुराने और नए दोनों कानूनी प्रावधानों के तहत लंबित मामलों की निगरानी और शीघ्र निपटारे से संबंधित है।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश
इस आदेश का संदेश साफ है—दहेज के खिलाफ कानून तभी प्रभावी होगा जब शिकायत से लेकर जांच, चार्जशीट, आरोप तय करने, गवाहों की गवाही और अंतिम फैसले तक पूरी प्रक्रिया में अनावश्यक देरी न हो। सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ पीड़ित महिलाओं के लिए सहायता तंत्र मजबूत करने को कहा है, वहीं दूसरी तरफ अदालतों में लंबित मामलों की निगरानी, अनावश्यक तारीखों पर रोक और डिजिटल ट्रैकिंग का रास्ता भी सुझाया है। अब राज्यों और हाईकोर्ट्स की जिम्मेदारी केवल निर्देशों को लागू करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उन्हें निर्धारित अंतराल पर सुप्रीम कोर्ट के सामने Compliance Reports के जरिए अपनी प्रगति भी बतानी होगी।
