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मेडिकल जांच का विरोध करना सरकारी काम में बाधा नहीं, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला; महिला के खिलाफ FIR रद्द
एक महिला ने मेडिकल जांच का विरोध क्या किया, उस पर सरकारी काम में बाधा डालने का मुकदमा दर्ज हो गया। मामला 2021 की FIR से शुरू होकर 2026 में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने साफ कर दिया कि मेडिकल जांच से इनकार या उसका विरोध अपने-आप में सरकारी कर्मचारी को उसके कर्तव्य से रोकने का अपराध नहीं बन जाता। अदालत ने कहा कि आरोपों को सही मानकर भी IPC की संबंधित धाराओं के जरूरी कानूनी तत्व पूरे नहीं होते। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने महिला के खिलाफ दर्ज FIR और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

सिर्फ अपनी मेडिकल जांच का कुछ समय के लिए विरोध कर देना अपने-आप में लोक सेवक के सार्वजनिक कार्य में बाधा डालने का अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 25 अगस्त 2026 को दिए एक अहम फैसले में एक महिला के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करते हुए कहा कि इस मामले में IPC की धारा 186 और 189 के साथ महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की संबंधित धाराओं के आवश्यक कानूनी तत्व पूरे नहीं होते। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि महिला ने शुरुआत में मेडिकल जांच का विरोध किया, लेकिन बाद में उसका मेडिकल परीक्षण पूरा हो गया। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के 19 नवंबर 2025 के आदेश को पलटते हुए अपील स्वीकार कर ली। यह मामला Ashwini Anantrao Deshpande v. State of Maharashtra से संबंधित है
4 मई 2021 को क्या हुआ था?
यह मामला महाराष्ट्र के अमरावती जिले के अचलपुर का है। FIR के मुताबिक, 4 मई 2021 को अपीलकर्ता, जो परतवाड़ा के Forest Range Office में लेखापाल/क्लर्क के रूप में कार्यरत थीं, कथित तौर पर शराब के नशे में थीं और हंगामा कर रही थीं। पुलिस उन्हें मेडिकल जांच के लिए Sub-District Hospital, Achalpur ले गई। अभियोजन के अनुसार, उन्होंने शुरुआत में मेडिकल जांच कराने का विरोध किया और वहां भी हंगामा किया। हालांकि बाद में उनका रक्त नमूना लिया गया और मेडिकल जांच पूरी हो गई। इसी घटना के आधार पर अचलपुर पुलिस स्टेशन में Crime No. 0131/2021 दर्ज किया गया। FIR में IPC की धारा 186 और 189 तथा महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 110 और 117 लगाई गई थीं।
लेकिन महिला ने लगाए थे गंभीर आरोप
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि महिला ने हाईकोर्ट के सामने घटना का अलग संस्करण रखा था। उनकी ओर से दलील दी गई थी कि 4 मई 2021 को उनके वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें लंच के लिए बुलाया था। उनके अनुसार, वह पंजाब ढाबा गई थीं, जहां कथित तौर पर उन्हें कोल्ड ड्रिंक में कोई अज्ञात पदार्थ दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वहां मौजूद एक व्यक्ति ने उनके साथ अनुचित तरीके से छूने की कोशिश की और विरोध करने पर उनके साथ गाली-गलौज की गई। महिला के अनुसार, इसके बाद उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया। ये सभी बातें महिला की ओर से रखी गई बचाव की दलीलें थीं और इन्हें स्थापित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि उनके पक्ष के आरोप के रूप में देखा जाना चाहिए।
मेडिकल रिपोर्ट को लेकर भी उठे थे सवाल
हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में महिला की ओर से मेडिकल जांच और रक्त नमूने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए थे। बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि रक्त का नमूना फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे जाने से पहले कुछ समय तक Forest Department की custody में रहा। बचाव पक्ष ने इस आधार पर नमूने के साथ छेड़छाड़ या contamination की आशंका भी जताई थी। रिकॉर्ड में Alcohol Examination Certificate में 0.086 mg की मात्रा का उल्लेख किया गया था। हालांकि, इस पहलू को खबर में बचाव पक्ष की दलील के रूप में ही रखना उचित है।
हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से किया था इनकार
महिला ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच का रुख किया था और FIR तथा उसके आधार पर चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। 19 नवंबर 2025 को जस्टिस उर्मिला जोशी-फाळके और जस्टिस नंदेश एस. देशपांडे की पीठ ने राहत देने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने माना था कि रिकॉर्ड पर प्रथम दृष्टया ऐसी सामग्री मौजूद है जिसे ट्रायल के दौरान जांचना जरूरी है। हाईकोर्ट के मुताबिक, पुलिसकर्मियों को कथित धमकी और गवाहों के बयान जैसे पहलुओं को देखते हुए मामले को सिर्फ FIR के स्तर पर खत्म करना उचित नहीं था। इसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट में कैसे पहुंचा मामला?
हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट में Special Leave Petition (Criminal) के जरिए चुनौती दी। रिकॉर्ड में यह मामला SLP (Criminal) Diary No. 8373/2026 के रूप में दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट ने FIR में लगाए गए आरोपों और संबंधित कानूनी प्रावधानों को अलग-अलग परखा और यह देखा कि आरोपों को उनकी अधिकतम सीमा तक सही मानने पर भी क्या संबंधित अपराधों के आवश्यक ingredients पूरे होते हैं।
धारा 186 IPC पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
IPC की धारा 186 लोक सेवक को उसके सार्वजनिक कार्य के निर्वहन में स्वेच्छा से बाधा डालने से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा कि अभियोजन के अपने बयानों से पता चलता है कि अपीलकर्ता ने शुरुआत में मेडिकल जांच का विरोध किया, लेकिन अंततः उसने मेडिकल परीक्षण करा लिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में अपीलकर्ता के कृत्य को उस अर्थ में “voluntarily obstructs any public servant in the discharge of his public function” नहीं माना जा सकता, जो धारा 186 IPC के तहत अपराध बनाने के लिए आवश्यक है। यही इस फैसले का सबसे अहम कानूनी बिंदु है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर विरोध धारा 186 से बाहर है
इस फैसले को यह कहकर पेश करना सही नहीं होगा कि मेडिकल जांच का विरोध करना कभी भी अपराध नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने मामले के विशिष्ट तथ्यों और अभियोजन की अपनी सामग्री को देखते हुए फैसला दिया। खास तौर पर यहां यह तथ्य महत्वपूर्ण था कि शुरुआती विरोध के बावजूद मेडिकल जांच अंततः पूरी हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट Section 186 IPC के scope पर पहले भी विचार कर चुका है। 2025 में Devendra Kumar v. State (NCT of Delhi) मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि obstruction सिर्फ physical force तक सीमित नहीं है; ऐसा जानबूझकर किया गया व्यवहार भी बाधा हो सकता है जिससे लोक सेवक का काम कठिन या बाधित हो। इसलिए मौजूदा फैसला परिस्थितियों और उपलब्ध आरोपों के आधार पर दिया गया विशिष्ट निर्णय है, न कि धारा 186 के सभी मामलों के लिए blanket immunity।
धारा 189 IPC भी नहीं लगी
सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 189 को भी अलग से जांचा। इस धारा के तहत केवल लोक सेवक के सामने विरोध करना पर्याप्त नहीं है। इसमें लोक सेवक या उससे संबंधित व्यक्ति को injury की धमकी देने और उस धमकी के जरिए लोक सेवक को अपने सार्वजनिक कार्य से जुड़े किसी काम को करने, रोकने या उसमें देरी करने के लिए प्रेरित करने जैसे तत्व आवश्यक हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस मामले में धारा 189 के जरूरी तत्व भी सामने नहीं आते। यानी केवल मेडिकल जांच को लेकर प्रतिरोध को धारा 189 के तहत आपराधिक धमकी नहीं माना जा सकता, जब तक कानून में बताए गए आवश्यक तत्व मौजूद न हों।
महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धाराओं पर भी कोर्ट ने सवाल उठाया
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धाराओं 110 और 117 को भी परखा। कोर्ट के अनुसार, Section 110 में indecent language या disorderly behaviour जैसे कृत्य शामिल हैं, जबकि संबंधित Section 112 threatening, abusive या insulting words/behaviour से जुड़ा है, जब उससे breach of peace की स्थिति पैदा होने या उसे उकसाने का इरादा हो। Section 117 इन प्रावधानों के उल्लंघन की penalty से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध आरोपों के आधार पर यह समझना मुश्किल है कि इन धाराओं के आवश्यक तत्व इस मामले में कैसे पूरे होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने आखिर क्या आदेश दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने महिला की अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 19 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया और अपीलकर्ता के खिलाफ दर्ज FIR तथा उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को क्वैश कर दिया। इस तरह 4 मई 2021 की घटना से शुरू हुई आपराधिक कार्यवाही करीब पांच साल बाद सुप्रीम कोर्ट में खत्म हुई।
फैसले का बड़ा कानूनी संदेश
इस फैसले का महत्व सिर्फ FIR रद्द होने तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने के लिए FIR में किसी धारा का उल्लेख भर पर्याप्त नहीं है। अदालत यह देख सकती है कि आरोपों को सही मान लेने के बाद भी क्या उस विशेष अपराध के सभी आवश्यक कानूनी तत्व प्रथम दृष्टया मौजूद हैं।
इस मामले में कोर्ट ने पाया कि:
मेडिकल जांच का शुरुआती विरोध हुआ, लेकिन जांच बाद में पूरी हो गई।
धारा 186 IPC के लिए आवश्यक “voluntary obstruction” का आधार पर्याप्त नहीं था।
धारा 189 IPC के लिए आवश्यक धमकी के तत्व सामने नहीं आए।
महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की संबंधित धाराओं के आवश्यक ingredients भी स्थापित नहीं हुए।
इसी आधार पर FIR को जारी रखना उचित नहीं माना गया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सार यह है कि किसी सरकारी प्रक्रिया के दौरान किया गया हर विरोध आपराधिक “obstruction” नहीं बन जाता। अपराध तभी बनता है जब संबंधित दंड प्रावधान में निर्धारित आवश्यक तत्व आरोपों और उपलब्ध सामग्री से पूरे हों। इस मामले में महिला ने मेडिकल जांच का शुरुआत में विरोध किया था, लेकिन अंततः मेडिकल परीक्षण पूरा हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने इसी तथ्य और अभियोजन की सामग्री को देखते हुए माना कि IPC की धारा 186, धारा 189 और महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का पर्याप्त आधार नहीं था।
