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कानपुर में टेंडर सिंडिकेट पर बड़ा एक्शन, 125 करोड़ के 296 टेंडर रद्द; दो गिरफ्तार, सरगना फरार
कानपुर नगर निगम की टेंडर प्रक्रिया में कथित धांधली और ठेकेदारों के सिंडिकेट का खुलासा होने के बाद बड़ी कार्रवाई हुई है। नगर निगम ने करीब 125 करोड़ रुपये के 296 टेंडर निरस्त कर दिए हैं। पुलिस ने दो ठेकेदारों संदीप जैन और रज्जन बाजपेई को गिरफ्तार किया है, जबकि कथित मुख्य संचालक गोविंद शर्मा फरार है और उसकी लोकेशन राजस्थान में मिलने की बात कही गई है। अलग-अलग रिपोर्टों में पांच और सात फर्मों के ब्लैकलिस्ट होने की जानकारी है। मामले की जांच के लिए एडीसीपी सेंट्रल डॉ. अर्चना सिंह के नेतृत्व में चार सदस्यीय एसआईटी गठित की गई है।

कानपुर नगर निगम में टेंडर प्रक्रिया पर बड़ा सवाल
कानपुर नगर निगम में ठेके बांटने की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच के बाद प्रशासन और पुलिस ने बड़ी कार्रवाई की है। जांच में आरोप है कि कुछ ठेकेदारों ने मिलकर ऐसा नेटवर्क बनाया था, जिसके जरिए यह तय किया जाता था कि कौन-सा टेंडर किस फर्म को मिलेगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से नगर निगम की कार्यप्रणाली में कथित अनियमितताओं को लेकर सख्त रुख अपनाए जाने के बाद कार्रवाई तेज हुई। पुलिस और नगर निगम की प्रारंभिक जांच में टेंडर प्रक्रिया, फर्मों के दस्तावेज, काम की गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी ठेकेदारों को कथित तौर पर डराने-धमकाने से जुड़े आरोप सामने आए हैं।
125 करोड़ के 296 टेंडर निरस्त
नगर निगम ने कथित अनियमितताओं की जांच के बाद करीब 125 करोड़ रुपये के 296 टेंडर निरस्त किए हैं। इसके साथ ही संबंधित विकास कार्यों के भुगतान पर रोक लगाने और लंबित तथा आगामी कार्यों में ऑनलाइन ई-टेंडरिंग की व्यवस्था लागू करने की प्रक्रिया शुरू की गई है। हालांकि कुछ रिपोर्टों में निरस्त टेंडरों की राशि 100 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। इसलिए पोर्टल पर 125 करोड़ और 296 टेंडर का आंकड़ा प्रकाशित करते समय इसे नगर निगम की कार्रवाई से जुड़ा आंकड़ा बताते हुए लिखना उचित होगा।
दो ठेकेदार गिरफ्तार, गोविंद शर्मा की तलाश
पुलिस ने मामले में संदीप जैन और रज्जन बाजपेई को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक दोनों कथित सिंडिकेट का हिस्सा थे। इस मामले में गोविंद शर्मा को कथित मुख्य संचालक बताया गया है। वह मूल रूप से आगरा का रहने वाला है और पहले मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में ठेकेदारी कर चुका है। पुलिस के अनुसार कानपुर आने के बाद उसने कई ठेकेदारों को जोड़कर अपना नेटवर्क तैयार किया। पुलिस का कहना है कि दोनों ठेकेदारों की गिरफ्तारी की जानकारी मिलने के बाद गोविंद शर्मा फरार हो गया। उसकी आखिरी लोकेशन राजस्थान में मिलने की बात सामने आई है और उसे पकड़ने के लिए पुलिस की टीमें लगाई गई हैं।
कैसे चलता था कथित टेंडर सिंडिकेट?
पुलिस के अनुसार कथित सिंडिकेट टेंडर प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने के लिए अलग-अलग फर्मों का इस्तेमाल करता था। जांच में आरोप है कि दूसरे ठेकेदारों पर दबाव बनाकर उन्हें टेंडर प्रक्रिया से पीछे हटने के लिए कहा जाता था। इसके बाद सिंडिकेट से जुड़ी फर्में टेंडर में हिस्सा लेती थीं। पुलिस ने यह भी आरोप लगाया है कि कई मामलों में टेंडर लगभग 15 प्रतिशत कम दर पर डलवाए जाते थे। जब कई फर्में समान दर पर पहुंचती थीं, तब कथित तौर पर लॉटरी या ड्रॉ के माध्यम से सिंडिकेट से जुड़ी फर्म को काम दिलाने की व्यवस्था की जाती थी। कुछ रिपोर्टों में बेहद मामूली अंतर से बोली लगाए जाने का भी उल्लेख है। इन दावों की पुष्टि अब एसआईटी द्वारा दस्तावेज और टेंडर रिकॉर्ड की जांच से की जाएगी।
फर्जी दस्तावेज और काम की गुणवत्ता की भी जांच
नगर निगम की प्रारंभिक जांच में कुछ फर्मों के दस्तावेजों में कथित गड़बड़ियां मिली हैं। रिपोर्टों के अनुसार कुछ टेंडरों में समाप्त हो चुके दस्तावेज, मशीनरी से संबंधित गलत या अपूर्ण जानकारी और अन्य भ्रामक सूचनाएं दिए जाने के आरोप सामने आए। इसके अलावा पहले से कराए गए कुछ निर्माण कार्यों की गुणवत्ता भी जांच के दायरे में है। पुलिस और नगर निगम यह पता लगा रहे हैं कि जिन कंपनियों को ठेके मिले, उन्होंने वास्तव में निर्धारित मानकों के अनुसार काम किया था या नहीं।
सात फर्मों पर कार्रवाई की जानकारी
यहां रिपोर्टों में एक महत्वपूर्ण अंतर है। अमर उजाला की 26 अगस्त की रिपोर्ट में पांच कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किए जाने की जानकारी दी गई है। वहीं हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और अन्य रिपोर्टों में सात फर्मों के ब्लैकलिस्ट होने की बात सामने आई है।
जांच और पुलिस कार्रवाई से जुड़ी रिपोर्टों में जिन फर्मों के नाम सामने आए हैं, उनमें शामिल हैं:
- मेसर्स दिलीप बाजपेई
- मेसर्स अजय इंटरप्राइजेज
- पारसनाथ बिल्डर्स
- कैला इंटरप्राइजेज
- तिरुपति ट्रेडर्स
- जगदंबा इंटरप्राइजेज
जगदंबा इंटरप्राइजेज से संबंधित दो अलग प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी भी सामने आई है।
नोट: ब्लैकलिस्ट फर्मों की अंतिम संख्या और सूची को नगर निगम के औपचारिक आदेश से मिलाना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि प्रकाशित रिपोर्टों में पांच और सात का अंतर है।
करोड़ों के काम पहले ही दिए जा चुके थे
जांच में यह भी सामने आया कि जांच के दायरे में आई कुछ फर्मों को पहले नगर निगम से करोड़ों रुपये के काम मिल चुके थे।
अमर उजाला के अनुसार:
- कैला इंटरप्राइजेज — करीब 13 करोड़ रुपये
- पारसनाथ बिल्डर्स — करीब 24 करोड़ रुपये
- तिरुपति ट्रेडर्स — करीब 30 करोड़ रुपये
- जगदंबा इंटरप्राइजेज — करीब 20 करोड़ रुपये
इन चार फर्मों से जुड़े कामों का कुल मूल्य लगभग 87 करोड़ रुपये बताया गया है। हालांकि किसी फर्म को ठेका मिलना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है; पुलिस और नगर निगम अब यह जांच रहे हैं कि टेंडर पात्रता, प्रक्रिया और काम की गुणवत्ता निर्धारित नियमों के अनुसार थी या नहीं।
करीब 400 ठेकेदारों का नेटवर्क जांच के घेरे में
कानपुर नगर निगम में छोटे और बड़े कार्यों के लिए बड़ी संख्या में ठेकेदार पंजीकृत हैं। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार प्रारंभिक जांच में करीब 427 पंजीकृत फर्मों की जानकारी सामने आई, जिनमें से कुछ फर्मों को बड़े ठेकेदारों से जुड़े होने के आधार पर जांच के लिए चुना गया। पुलिस अब यह भी पता लगा रही है कि जांच के दायरे में आए ठेकेदारों की और कितनी फर्में हैं और क्या अलग-अलग नामों से एक ही नेटवर्क संचालित हो रहा था।
हॉट मिक्स प्लांट और सड़क निर्माण भी जांच में
मामला सिर्फ टेंडर आवंटन तक सीमित नहीं है। नगर निगम के हॉट मिक्स प्लांट, सीसी रोड और इंटरलॉकिंग टाइल्स से जुड़े पुराने कार्य भी जांच के दायरे में लाए गए हैं। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार पिछले करीब तीन वर्षों में हॉट मिक्स प्लांट, सीसी रोड और इंटरलॉकिंग टाइल्स से जुड़े करीब 200 करोड़ रुपये के कार्यों की फाइलों को दोबारा जांचने की तैयारी है। कुछ हॉट मिक्स प्लांटों का निरीक्षण भी किया गया, जहां बंद मिलने या मशीनरी से जुड़ी विसंगतियों की बात सामने आई।
छह एफआईआर दर्ज, सातवीं की प्रक्रिया
पुलिस के अनुसार अभी तक छह एफआईआर दर्ज की गई हैं। इनमें पांच मामले नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय की शिकायत पर स्वरूपनगर थाने में और एक मामला ठेकेदार सनी सिंह की शिकायत पर फजलगंज थाने में दर्ज किया गया है। सनी सिंह ने कथित तौर पर आरोप लगाया कि उन्हें टेंडर प्रक्रिया से हटने के लिए दबाव और धमकी दी गई। पुलिस इन आरोपों की जांच कर रही है। मामलों में धोखाधड़ी, आपराधिक धमकी और कथित रंगदारी से संबंधित धाराओं में कार्रवाई की जानकारी सामने आई है।
एसआईटी करेगी पूरे नेटवर्क की जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने एडीसीपी सेंट्रल डॉ. अर्चना सिंह के नेतृत्व में चार सदस्यीय विशेष जांच दल यानी एसआईटी गठित की है। टीम में संबंधित एसीपी और स्वरूपनगर तथा फजलगंज थानों के अधिकारी शामिल हैं। एसआईटी की जांच में मुख्य रूप से ये बिंदु शामिल हैं:
- टेंडर प्रक्रिया में कथित हेरफेर
- फर्मों के बीच आपसी संबंध
- बैंक खातों और वित्तीय लेनदेन
- जीएसटी टिन नंबर और कंपनी रिकॉर्ड
- टेंडर में प्रतिस्पर्धी ठेकेदारों को कथित धमकी
- नगर निगम के अधिकारियों या कर्मचारियों की संभावित भूमिका
- पहले दिए गए ठेकों की प्रक्रिया और गुणवत्ता
- गोविंद शर्मा की कथित भूमिका और नेटवर्क
पुलिस ने कहा है कि जांच के आधार पर आगे और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।
भुगतान पर रोक और ई-टेंडरिंग की तैयारी
नगर निगम ने जांच पूरी होने तक संबंधित विकास कार्यों के भुगतान पर रोक लगाने की कार्रवाई की है। साथ ही ठेकेदारों के नए पंजीकरण की प्रक्रिया को भी रोकने और पुराने सिस्टम की समीक्षा करने की जानकारी सामने आई है। आगामी और लंबित कार्यों के लिए ई-टेंडरिंग व्यवस्था को बढ़ावा देने की तैयारी है। इसका उद्देश्य टेंडर प्रक्रिया में मानवीय हस्तक्षेप कम करना और प्रतिस्पर्धा को अधिक पारदर्शी बनाना बताया गया है।
आगे क्या होगा?
फिलहाल पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती कथित मुख्य संचालक गोविंद शर्मा को पकड़ना और उसके नेटवर्क की पूरी वित्तीय तथा प्रशासनिक कड़ी का पता लगाना है। एसआईटी अब बैंक खातों, फर्मों के दस्तावेज, जीएसटी रिकॉर्ड, टेंडर फाइलों और पुराने विकास कार्यों की जांच करेगी। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि क्या नगर निगम के किसी अधिकारी या कर्मचारी ने कथित सिंडिकेट को फायदा पहुंचाया।
बड़ी बात
कानपुर नगर निगम के इस मामले में 125 करोड़ रुपये के 296 टेंडर निरस्त, दो ठेकेदार गिरफ्तार और कथित सरगना फरार है। साथ ही कई फर्मों को ब्लैकलिस्ट किए जाने और छह एफआईआर दर्ज होने से मामला अब सिर्फ ठेकेदारों के बीच विवाद नहीं रह गया है। एसआईटी की जांच से यह स्पष्ट होगा कि कथित सिंडिकेट कितना बड़ा था और क्या इसमें नगर निगम के भीतर भी किसी स्तर पर मिलीभगत थी।
