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18 साल की उम्र पूरी होते ही Autism से पीड़ित बच्चे का Maintenance बंद नहीं होगा: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
18 साल की उम्र… क्या इसके बाद Autism से जूझ रहे बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी भी खत्म हो जाएगी? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस सवाल पर ऐसा फैसला सुनाया है, जो विशेष जरूरत वाले बच्चों और उनके माता-पिता के लिए बेहद अहम है। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ 18 साल की उम्र पूरी हो जाने से Maintenance अपने आप बंद नहीं हो सकता। असली सवाल यह होगा कि संबंधित व्यक्ति अपनी आजीविका खुद कमाकर अपना खर्च उठाने में सक्षम है या नहीं। Autism Spectrum Disorder और Speech Disorder से पीड़ित बच्चे के मामले में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने Family Court के उस आदेश में हस्तक्षेप किया, जिसमें ₹7,000 मासिक Maintenance को केवल 18 वर्ष की उम्र तक सीमित कर दिया गया था।

18 साल की उम्र पूरी होते ही क्या Autism से पीड़ित बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने इस अहम सवाल पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि केवल बालिग हो जाना Maintenance बंद करने का स्वतः आधार नहीं है। अगर कोई बच्चा Autism Spectrum Disorder या किसी अन्य शारीरिक अथवा मानसिक असामान्यता के कारण खुद अपना भरण-पोषण करने और आजीविका कमाने में सक्षम नहीं है, तो उसे 18 वर्ष के बाद भी Maintenance मिल सकता है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने कहा कि असली कसौटी उम्र नहीं, बल्कि यह है कि बालिग होने के बाद संबंधित व्यक्ति अपनी आजीविका कमाकर खुद को maintain करने में सक्षम है या नहीं।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक ऐसे बच्चे से जुड़ा है जो Autism Spectrum Disorder और Speech Disorder से पीड़ित है। उसे विशेष शिक्षा, लगातार देखभाल और मेडिकल सहायता की जरूरत थी। दुर्ग Family Court ने बच्चे के पिता को Section 125 CrPC के तहत 7,000 रुपये प्रतिमाह Maintenance देने का आदेश दिया था। हालांकि Family Court ने इस भुगतान को बच्चे के 18 वर्ष की उम्र पूरी होने तक सीमित कर दिया था। इसी हिस्से को चुनौती देते हुए High Court में Criminal Revision दाखिल की गई। मामला Family Courts Act, 1984 की Section 19(4) के तहत High Court के सामने आया।
High Court के सामने असली सवाल क्या था?
सवाल यह था कि क्या 18 वर्ष की उम्र पूरी होते ही Section 125 CrPC के तहत ऐसे बच्चे का Maintenance स्वतः बंद किया जा सकता है, जो अपनी मानसिक या शारीरिक स्थिति के कारण अभी भी खुद अपना खर्च उठाने में सक्षम नहीं है? High Court ने इसका जवाब स्पष्ट रूप से नकारात्मक दिया। अदालत ने माना कि सिर्फ majority हासिल कर लेना Maintenance के अधिकार को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि व्यक्ति की शारीरिक या मानसिक स्थिति ऐसी है या नहीं जिसके कारण वह अपनी आजीविका कमाने में असमर्थ है।
Section 125 CrPC में खुद मौजूद है विशेष प्रावधान
इस फैसले को समझने के लिए Section 125(1)(c) CrPC बेहद महत्वपूर्ण है। इस प्रावधान में ऐसे major child के लिए Maintenance की व्यवस्था है जो physical या mental abnormality अथवा injury के कारण स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है। यानी कानून सामान्य minor child और ऐसे major child के बीच अंतर करता है। सामान्य स्थिति में minor child के लिए Section 125 के तहत Maintenance का अधिकार majority तक रहता है। लेकिन अगर बच्चा 18 वर्ष के बाद भी physical या mental abnormality अथवा injury के कारण खुद को maintain नहीं कर सकता, तो Section 125(1)(c) उसके लिए अलग सुरक्षा देता है।
इसका मतलब यह नहीं कि Autism होते ही Lifetime Maintenance Automatic हो जाएगा
High Court के फैसले की एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि इसे “हर autistic व्यक्ति को जीवनभर Maintenance” के रूप में नहीं समझना चाहिए। कानूनी कसौटी यह है कि व्यक्ति की physical या mental condition के कारण वह वास्तव में खुद अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है या नहीं। एक अन्य High Court के 2024 के फैसले में भी Section 125(1)(c) की इसी सीमा को स्पष्ट किया गया था। अदालत ने कहा था कि सिर्फ physical या mental abnormality होना पर्याप्त नहीं है; यह भी दिखना चाहिए कि उसी abnormality या injury के कारण व्यक्ति खुद को maintain करने में असमर्थ है। इसलिए Chhattisgarh High Court के फैसले का वास्तविक संदेश है—18 साल की उम्र को automatic cut-off नहीं बनाया जा सकता; व्यक्ति की वास्तविक earning capacity और dependency देखनी होगी।
Family Court ने ₹7,000 Maintenance दिया था
दुर्ग Family Court ने बच्चे के पिता को 7,000 रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया था। High Court ने Maintenance की राशि को बढ़ाने के लिए हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन उस हिस्से पर आपत्ति स्वीकार की जिसमें भुगतान को केवल 18 वर्ष की उम्र तक सीमित कर दिया गया था। इस तरह बच्चे की जरूरत और उसकी condition को देखते हुए 18 वर्ष की उम्र के बाद भी Maintenance जारी रखने का रास्ता खुला रहा, जब तक यह स्थापित न हो जाए कि वह स्वयं अपनी आजीविका कमाने और जीवनयापन करने में सक्षम हो गया है।
Supreme Court का 2026 का फैसला भी इस मुद्दे को मजबूती देता है
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस फैसले को हालिया Supreme Court के एक महत्वपूर्ण मामले के संदर्भ में भी समझा जा सकता है। 15 मई 2026 को Supreme Court ने Anu Sharma & Ors. v. Rajvinder Singh Bedi मामले में Autism से पीड़ित बच्चे के Maintenance पर महत्वपूर्ण आदेश दिया था। मामले में बच्चे की special classes की फीस ही 48,000 रुपये प्रतिमाह थी। Supreme Court ने autistic बच्चे के लिए कम-से-कम 24,000 रुपये प्रतिमाह Maintenance निर्धारित किया। Supreme Court की Bench में Justice Pankaj Mithal और Justice S.V. Bhatti शामिल थे। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि Maintenance की राशि application की तारीख यानी 16 अप्रैल 2018 से देय होगी और मई 2026 से तय राशि हर महीने नियमित रूप से भुगतान करनी होगी। यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Supreme Court ने autistic बच्चे की वास्तविक educational needs और special classes के खर्च को Maintenance तय करने में महत्वपूर्ण माना।
Supreme Court ने कहा- Special Education का खर्च भी महत्वपूर्ण
Anu Sharma मामले में रिकॉर्ड पर था कि autistic बच्चे की special classes पर ही 48,000 रुपये प्रतिमाह खर्च हो रहा था। Supreme Court ने माना कि इस liability को माता-पिता दोनों को साझा करना होगा, क्योंकि मां earning member थीं। इसी आधार पर बच्चे का Maintenance कम-से-कम 24,000 रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया गया।
इससे यह न्यायिक दृष्टिकोण सामने आता है कि special needs वाले बच्चे के Maintenance को तय करते समय केवल सामान्य खाने-पीने के खर्च को नहीं देखा जा सकता, बल्कि education, special classes और अन्य वास्तविक जरूरतों को भी ध्यान में रखा जा सकता है।
Section 125 का उद्देश्य सिर्फ कागजी अधिकार देना नहीं
Section 125 CrPC को लंबे समय से social justice और destitution रोकने वाले प्रावधान के रूप में देखा जाता रहा है। इसका उद्देश्य उन dependents को त्वरित राहत देना है जिन्हें पर्याप्त साधन होने के बावजूद जिम्मेदार व्यक्ति Maintenance देने से मना करता है। Supreme Court के एक पुराने निर्णय में भी Section 125(1)(c) का यही statutory framework दर्ज है और यह स्पष्ट किया गया है कि major child के लिए physical या mental abnormality/injury के कारण self-maintenance में असमर्थता महत्वपूर्ण शर्त है।
दूसरे High Court के फैसले भी यही कानूनी अंतर बताते हैं
इस विषय पर उपलब्ध न्यायिक फैसलों में एक consistent distinction दिखाई देता है। 2024 के Maheshbhai Vamanbhai Baviskar v. Ashaben Maheshbhai Baviskar मामले में अदालत ने Section 125(1)(c) की व्याख्या करते हुए कहा कि majority के बाद Maintenance का दावा तभी बनता है जब self-maintenance में असमर्थता physical या mental abnormality अथवा injury के कारण हो। वहीं Allahabad High Court के एक फैसले में भी Section 125(1)(c) के तहत major child की Maintenance eligibility इसी आधार पर समझाई गई कि physical या mental abnormality/injury के कारण व्यक्ति स्वयं को maintain करने में असमर्थ हो। इसलिए Chhattisgarh High Court का फैसला existing statutory framework को विशेष जरूरत वाले बच्चे के मामले में लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
18 साल की उम्र क्यों बनी थी विवाद की वजह?
Family Court ने बच्चे के लिए Maintenance तो मंजूर किया, लेकिन उसे majority तक सीमित कर दिया। समस्या यह थी कि बच्चे की medical और developmental condition को देखते हुए 18 वर्ष की उम्र के बाद भी उसकी dependency समाप्त होने की कोई गारंटी नहीं थी। Autism Spectrum Disorder और Speech Disorder के कारण उसे specialised education, care और medical assistance की जरूरत थी। ऐसे में High Court ने यह देखने पर जोर दिया कि 18 साल पूरे होने के बाद क्या बच्चा वास्तव में आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो गया है।
कोर्ट का महत्वपूर्ण संदेश
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि “18 साल” को एक mechanical cut-off की तरह नहीं देखा जा सकता। अगर व्यक्ति बालिग होने के बाद भी अपनी condition के कारण काम करने, कमाने और खुद का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है, तो Maintenance जारी रह सकता है। दूसरी तरफ, यदि भविष्य में यह साबित हो जाता है कि व्यक्ति अपनी livelihood कमाने और स्वयं को maintain करने में सक्षम हो गया है, तो परिस्थितियों के अनुसार Maintenance का सवाल अलग तरीके से तय किया जा सकता है।
एक और जरूरी कानूनी अपडेट: CrPC की जगह BNSS
यहां एक कानूनी सावधानी भी जरूरी है। 1 जुलाई 2024 से Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS), 2023 लागू हो चुकी है और Maintenance से संबंधित Section 125 CrPC का corresponding provision Section 144 BNSS में है। इसलिए 2026 की खबर में पुराने proceedings और नए statutory framework के बीच अंतर स्पष्ट रखना जरूरी है। हालांकि आपके द्वारा साझा किए गए Chhattisgarh मामले में Family Court के impugned order को Section 125 CrPC के तहत चुनौती दी गई थी, इसलिए केस की procedural history बताते समय Section 125 CrPC का उल्लेख करना उचित है।
यह फैसला किन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है?
यह फैसला विशेष रूप से उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके बच्चे Autism, गंभीर developmental conditions या अन्य physical/mental disabilities के कारण लंबे समय तक आर्थिक और देखभाल संबंधी सहायता पर निर्भर रहते हैं।
ऐसे मामलों में केवल जन्मतिथि या 18 वर्ष की उम्र पूरी होने के आधार पर यह मान लेना कि व्यक्ति अब अपने खर्च का भार उठा सकता है, पर्याप्त नहीं होगा। उसकी वास्तविक functional capacity, earning ability और जरूरतों को देखा जाना जरूरी होगा।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक बच्चे के Maintenance विवाद तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक संदेश यह है कि कानून में मौजूद 18 वर्ष की उम्र की सीमा को विशेष जरूरत वाले बच्चे की वास्तविक परिस्थितियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। Autism या किसी अन्य physical/mental condition से प्रभावित व्यक्ति के लिए adulthood का मतलब हमेशा financial independence नहीं होता। इसलिए अदालत को यह देखना होगा कि व्यक्ति वास्तव में अपनी livelihood कमाने और खुद को maintain करने में सक्षम है या नहीं। हालिया Supreme Court के Anu Sharma मामले में autistic बच्चे की special education की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ₹24,000 प्रतिमाह Maintenance तय किया जाना और अब Chhattisgarh High Court का 18 वर्ष की उम्र को automatic cut-off न मानना, दोनों फैसले इस विषय में न्यायिक दृष्टिकोण की महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करते
