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रसोई पर महंगाई की नई मार: खाद्य कीमतों में तेजी से RBI सतर्क, प्याज के दाम 59% बढ़े

देश में खाद्य कीमतों में एक बार फिर तेजी के संकेत मिलने लगे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अगस्त 2026 के अपने ‘State of the Economy’ आकलन में खाद्य कीमतों में व्यापक स्तर पर क्रमिक बढ़ोतरी को लेकर चिंता जताई है। जुलाई में खुदरा महंगाई 4.45 प्रतिशत और खाद्य महंगाई 5.52 प्रतिशत रही। वहीं 24 अगस्त तक प्याज की अखिल भारतीय औसत खुदरा कीमत सालाना आधार पर 59 प्रतिशत बढ़कर 43.53 रुपये प्रति किलोग्राम पहुंच गई। सरकार ने कीमतों पर नियंत्रण के लिए बफर स्टॉक से प्याज की आपूर्ति बढ़ाने और ‘कांदा एक्सप्रेस’ के जरिए प्रमुख शहरों तक प्याज पहुंचाने का फैसला किया है।

sd26 अग. 2026, 05:06 PM IST
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रसोई पर महंगाई की नई मार: खाद्य कीमतों में तेजी से RBI सतर्क, प्याज के दाम 59% बढ़े

खाद्य कीमतों में व्यापक बढ़ोतरी से RBI चिंतित

RBI की अगस्त 2026 की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगस्त के शुरुआती तीन हफ्तों में उपलब्ध हाई-फ्रीक्वेंसी आंकड़ों के अनुसार खाद्य कीमतों में व्यापक और क्रमिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। खास बात यह है कि यह तेजी ऐसे समय में देखी गई है जब दक्षिण-पश्चिम मानसून में जुलाई के दौरान कुछ सुधार हुआ है। मानसून में सुधार से कृषि क्षेत्र से जुड़े कुछ जोखिम कम हुए हैं, लेकिन इसके बावजूद खाद्य कीमतों में तेजी बनी हुई है। इससे संकेत मिलता है कि खाद्य महंगाई पर केवल मौसम का ही असर नहीं है, बल्कि आपूर्ति, बाजार और अन्य लागत से जुड़े कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। RBI की चिंता इसलिए भी अहम है क्योंकि यदि खाद्य कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर व्यापक खुदरा महंगाई पर पड़ सकता है।

जुलाई में 4.45% रही खुदरा महंगाई

महंगाई से जुड़े ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में भारत की खुदरा महंगाई दर 4.45 प्रतिशत रही। जून में यह 4.38 प्रतिशत थी।

वहीं खाद्य महंगाई और ज्यादा रही। जुलाई में खाद्य महंगाई 5.52 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि जून में यह 5.32 प्रतिशत थी। यानी एक महीने में खाद्य महंगाई में भी बढ़ोतरी हुई। इससे साफ है कि मौजूदा महंगाई दबाव में खाद्य वस्तुओं की कीमतों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है।

प्याज ने बढ़ाई सबसे ज्यादा चिंता

खाद्य महंगाई के बीच प्याज की कीमतों में तेज बढ़ोतरी आम उपभोक्ता के लिए सबसे बड़ी चिंता बनकर सामने आई है। केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 24 अगस्त 2026 को प्याज की अखिल भारतीय औसत खुदरा कीमत 43.53 रुपये प्रति किलोग्राम रही। एक साल पहले इसी अवधि में यह करीब 27.37 रुपये प्रति किलोग्राम थी। यानी सालाना आधार पर प्याज की कीमत में करीब 59 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।थोक बाजार में भी कीमत बढ़ी है। 24 अगस्त को प्याज का अखिल भारतीय औसत थोक भाव करीब 35.58 रुपये प्रति किलोग्राम था, जबकि एक साल पहले यह 21.23 रुपये प्रति किलोग्राम था। कुछ बड़े शहरों में खुदरा कीमतें राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा दर्ज की गईं। इससे शहरी परिवारों के रसोई बजट पर सीधा असर पड़ रहा है।

सरकार ने शुरू की ‘कांदा एक्सप्रेस’

प्याज की कीमतों पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने बफर स्टॉक से प्याज की आपूर्ति बढ़ाने का फैसला किया है। इसके तहत नासिक से देश के प्रमुख उपभोग केंद्रों तक प्याज पहुंचाने के लिए विशेष रेलवे रैक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसे ‘कांदा एक्सप्रेस’ नाम दिया गया है।सरकार का उद्देश्य बाजार में अतिरिक्त प्याज उपलब्ध कराकर आपूर्ति बढ़ाना और कीमतों पर दबाव कम करना है। दिल्ली में केंद्र ने बफर स्टॉक से प्याज को 35 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से उपलब्ध कराने की योजना भी बनाई है। यह बिक्री 27 अगस्त से शुरू होने की जानकारी सामने आई है।

क्या सिर्फ प्याज ही महंगा हो रहा है?

ऐसा कहना सही नहीं होगा कि देश में हर खाद्य वस्तु की कीमत एक साथ बढ़ रही है। खाद्य वस्तुओं के दाम अलग-अलग समय पर उत्पादन, उपलब्धता, मौसम, मंडी आवक और आपूर्ति व्यवस्था के आधार पर बदलते हैं। हालांकि RBI का ताजा आकलन इस ओर इशारा करता है कि अगस्त के शुरुआती हिस्से में खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी सिर्फ किसी एक वस्तु तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका असर व्यापक स्तर पर देखा गया है। यही कारण है कि केंद्रीय बैंक इस स्थिति को आगे की महंगाई के लिहाज से गंभीरता से देख रहा है।

मानसून में सुधार के बावजूद क्यों बढ़ी चिंता?

मानसून का प्रदर्शन खाद्य महंगाई के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अच्छी बारिश से फसल उत्पादन और कृषि आपूर्ति को समर्थन मिलता है, जबकि कमजोर या असमान बारिश से उत्पादन प्रभावित होने का खतरा रहता है।RBI के मुताबिक जुलाई में दक्षिण-पश्चिम मानसून में सुधार हुआ और इससे कृषि क्षेत्र से जुड़े कुछ जोखिम कम हुए। खरीफ की बुवाई भी सामान्य स्तर के करीब पहुंची। इसके बावजूद अगस्त में खाद्य कीमतों में व्यापक बढ़ोतरी दर्ज हुई। इसका अर्थ है कि आने वाले महीनों में सिर्फ बारिश ही नहीं, बल्कि मंडियों में आवक, भंडारण, परिवहन और वैश्विक कीमतों जैसे कारकों पर भी नजर रखनी होगी।

कच्चे तेल की कीमत और वैश्विक तनाव भी बड़ा जोखिम

RBI ने महंगाई के जोखिम को केवल खाद्य कीमतों तक सीमित नहीं माना है। कच्चे तेल की कीमतों में संभावित तेजी, भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता भी भारत के लिए चुनौती बन सकती है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर आयात लागत बढ़ सकती है। इसके बाद परिवहन और उत्पादन लागत पर दबाव पड़ सकता है। अगर यह दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो खाद्य वस्तुओं के अलावा दूसरी उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है।

RBI के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती क्या?

RBI की मौद्रिक नीति के सामने इस समय सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी कितने समय तक रहती है और क्या इसका असर अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों तक पहुंचता है।अगस्त की मौद्रिक नीति बैठक में RBI ने रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा था। हालांकि नीति निर्माताओं ने यह संकेत दिया है कि अगर खाद्य, ईंधन और उत्पादन लागत का दबाव व्यापक महंगाई में बदलता है तो आगे की नीति में सख्ती की गुंजाइश रखी जा सकती है।इसका मतलब यह है कि फिलहाल केंद्रीय बैंक कीमतों के रुख पर करीब से नजर रख रहा है।

आम आदमी की जेब पर क्या पड़ेगा असर?

खाद्य महंगाई का सबसे सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ता है। प्याज, दाल, तेल, सब्जियां और अन्य रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ने पर परिवारों का मासिक किराना खर्च बढ़ सकता है।अगर खाद्य और ईंधन की कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है, तो परिवहन, होटल-रेस्तरां और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों की लागत भी बढ़ सकती है। आगे चलकर इसका असर अन्य वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ने की आशंका रहती है। यही वह स्थिति है जिसे RBI व्यापक महंगाई के जोखिम के रूप में देख रहा है।

सरकार के सामने भी बड़ी चुनौती

सरकार के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है—एक तरफ उपभोक्ताओं को महंगी खाद्य वस्तुओं से राहत देना और दूसरी तरफ किसानों को उचित कीमत दिलाना। प्याज के मामले में बफर स्टॉक का इस्तेमाल और ‘कांदा एक्सप्रेस’ के जरिए आपूर्ति बढ़ाना सरकार की तत्काल बाजार हस्तक्षेप रणनीति का हिस्सा है।

आने वाले दिनों में सरकार की नजर प्याज के अलावा अन्य जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों, मंडी आवक और उपलब्ध स्टॉक पर भी रहेगी।

आगे क्या देखना होगा?

आने वाले हफ्तों में तीन चीजें महंगाई की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण रहेंगी—खाद्य वस्तुओं की कीमतें, मानसून और कच्चे तेल का अंतरराष्ट्रीय भाव।

अगर खाद्य कीमतों में तेजी सीमित रहती है और मानसून कृषि उत्पादन को पर्याप्त समर्थन देता है, तो महंगाई पर दबाव कम हो सकता है। लेकिन यदि खाद्य, ईंधन और उत्पादन लागत एक साथ बढ़ती हैं, तो RBI के लिए स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

निष्कर्ष

देश में इस समय महंगाई को लेकर तस्वीर मिश्रित है। जुलाई में खुदरा महंगाई 4.45 प्रतिशत रही, लेकिन खाद्य महंगाई 5.52 प्रतिशत तक पहुंच गई। अगस्त के शुरुआती हफ्तों में खाद्य कीमतों में व्यापक बढ़ोतरी के संकेतों ने RBI की चिंता बढ़ाई है। इसी बीच प्याज की कीमत में एक साल में 59 प्रतिशत की तेजी और सरकार का ‘कांदा एक्सप्रेस’ शुरू करना बताता है कि कुछ जरूरी खाद्य वस्तुओं पर कीमतों का दबाव वास्तविक है। फिलहाल इसे देश में बेकाबू महंगाई कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन खाद्य कीमतों, कच्चे तेल और वैश्विक जोखिमों के कारण आगे महंगाई बढ़ने की आशंका को RBI गंभीरता से देख रहा है। आने वाले महीनों में यही तय करेगा कि मौजूदा खाद्य महंगाई अस्थायी रहती है या व्यापक महंगाई का रूप लेती है।