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78 साल के पिता की मानसिक जांच कराने कोर्ट पहुंचा बेटा, Bombay HC ने लगाई ₹5 लाख की कॉस्ट; कहा- Mental Healthcare Act ‘Shield’ है, ‘Sword’ नहीं
संपत्ति विवाद में जब 78 साल के बुजुर्ग पिता की मानसिक सेहत को ही अदालत में सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया गया, तो बॉम्बे हाईकोर्ट ने बेटे को कड़ी फटकार लगा दी। पिता की मानसिक जांच कराने की मांग लेकर पहुंची अपील पर कोर्ट ने न सिर्फ राहत देने से इनकार किया, बल्कि बेटे पर ₹5 लाख की भारी लागत भी लगा दी। जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस कमल खाता की बेंच ने साफ संदेश दिया कि Mental Healthcare Act किसी विरोधी पक्ष को परेशान करने या मुकदमे में फायदा लेने का हथियार नहीं है। अदालत ने इसे न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग से जोड़ते हुए कहा कि बीमारियों से जूझ रहे बुजुर्ग पिता को इस तरह की कार्यवाही में घसीटना गंभीर बात है।

मुंबई:
संपत्ति का विवाद जब पारिवारिक रिश्तों की सीमा पार कर अदालत तक पहुंचा तो मामला 78 साल के बुजुर्ग पिता की मानसिक स्थिति की जांच कराने तक पहुंच गया। बेटे ने अदालत से मांग की कि उसके पिता की मानसिक स्थिति का स्वतंत्र मेडिकल आकलन कराया जाए और उन्हें Mental Health Review Board के सामने पेश किया जाए। लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मांग को स्वीकार करने के बजाय बेटे को ही कड़ी फटकार लगा दी। 25 अगस्त 2026 को जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस कमल खाता की डिवीजन बेंच ने बेटे की अपील खारिज करते हुए उस पर ₹5 लाख की exemplary costs लगा दी। अदालत ने मामले को न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग से जोड़ते हुए कहा कि बीमारियों से जूझ रहे बुजुर्ग पिता को इस तरह की कार्यवाही में घसीटना स्वीकार नहीं किया जा सकता। आधिकारिक हाईकोर्ट रिकॉर्ड में मामला OS Appeal No. 70 of 2026 के रूप में दर्ज है।
‘Mental Healthcare Act को हथियार नहीं बना सकते’
इस पूरे फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू Mental Healthcare Act, 2017 की धारा 105 है। 17 फरवरी 2026 को जस्टिस फरहान पी. दुबाश ने इसी विवाद में बेटे की Interim Application No. 7713 of 2025 खारिज करते हुए कहा था कि Section 105 का उद्देश्य मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना है, न कि किसी adversary को अपने विरोधी की मानसिक बीमारी के सबूत जुटाने के लिए एक litigation mechanism उपलब्ध कराना। सिंगल जज ने इसे स्पष्ट रूप से “shield” बताया था, “sword” नहीं। अब डिवीजन बेंच ने भी इसी दृष्टिकोण को बरकरार रखते हुए बेटे की अपील खारिज कर दी।
मामला शुरू कैसे हुआ?
मामला पिता-पुत्र के बीच चल रहे संपत्ति विवाद की पृष्ठभूमि में सामने आया। बेटे जितेंद्र गोरख मेघ ने अपने पिता गोरख गोविंद मेघ के खिलाफ संपत्ति/partition से जुड़ी कार्यवाही में हिस्सा मांगा था। इसी मुकदमे के दौरान बेटे ने अपने पिता की मानसिक क्षमता पर सवाल उठाते हुए Mental Healthcare Act की धारा 105 के तहत आवेदन दायर किया। उसकी मांग थी कि पिता की मानसिक स्थिति का स्वतंत्र मेडिकल परीक्षण कराया जाए और इस संबंध में Mental Health Review Board से राय ली जाए।
बेटे का दावा था कि उसके पिता मानसिक बीमारी से प्रभावित हैं और उनकी मानसिक क्षमता का आकलन किया जाना जरूरी है। लेकिन अदालत ने इस दावे को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया कि एक पक्ष ने दूसरे पक्ष की mental capacity पर सवाल उठा दिया था।
17 फरवरी 2026 को सिंगल जज ने क्यों खारिज की थी अर्जी?
जस्टिस फरहान पी. दुबाश ने 17 फरवरी 2026 के आदेश में Mental Healthcare Act के Chapter XIII की संरचना पर गौर किया। कोर्ट ने कहा कि Sections 100 से 104 अलग-अलग agencies पर मानसिक बीमारी से प्रभावित व्यक्तियों की सुरक्षा और उचित treatment की जिम्मेदारी डालते हैं। Section 105 इसी framework के तहत judicial process में mental illness के सवाल को देखता है। अदालत ने कहा कि इन प्रावधानों को साथ पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि कानून का underlying objective मानसिक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना है। इसे किसी adversarial party को ऐसा साधन देना नहीं माना जा सकता जिसके जरिए वह अपने विरोधी के खिलाफ मानसिक बीमारी का सबूत इकट्ठा कर मुकदमे में tactical advantage हासिल करे।
Section 105 आखिर कहती क्या है?
Mental Healthcare Act, 2017 की धारा 105 का शीर्षक है- “Question of mental illness in judicial process.” कानून के मुताबिक यदि किसी competent court के सामने judicial proceeding के दौरान किसी व्यक्ति की mental illness का proof पेश किया जाता है और दूसरा पक्ष उसे challenge करता है, तो कोर्ट उस मामले को संबंधित Board के पास further scrutiny के लिए भेजेगा। Board व्यक्ति की जांच स्वयं या experts की committee के जरिए कराकर अपनी opinion अदालत को देता है। यानी Section 105 में judicial process के दौरान mental illness की जांच की वैधानिक व्यवस्था मौजूद है। लेकिन Bombay High Court का फैसला यह नहीं कहता कि Section 105 के तहत कभी जांच नहीं हो सकती। फैसले का महत्वपूर्ण point यह है कि इस provision को उसके protective purpose से अलग करके केवल litigation strategy के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
‘Shield, Not Sword’ का क्या मतलब है?
कोर्ट के अनुसार Mental Healthcare Act एक rights-based और protective legislation है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति की वास्तविक मानसिक बीमारी का प्रश्न न्यायिक कार्यवाही में उठता है, तो कानून उसकी सुरक्षा और उचित assessment के लिए mechanism उपलब्ध कराता है। लेकिन यदि कोई मुकदमेबाज केवल इसलिए अपने विरोधी की mental health जांच कराना चाहता है ताकि उसके खिलाफ चल रहे मुकदमे में रणनीतिक लाभ मिल सके, तो यही provision एक “litigation weapon” में बदल सकता है। सिंगल जज ने इसी खतरे को देखते हुए कहा था कि Section 105 को इस तरह इस्तेमाल करने की अनुमति देने से adversarial parties इसका weaponisation कर सकती हैं।
मेडिकल सर्टिफिकेट में क्या था?
बेटे ने अपने पिता की मानसिक स्थिति को लेकर एक मेडिकल सर्टिफिकेट पर भी भरोसा किया था। उपलब्ध रिपोर्टिंग और न्यायिक सामग्री के अनुसार, सर्टिफिकेट में पिता के diabetes से पीड़ित होने और insulin administration के बाद hypoglycaemic episodes का उल्लेख था। इन episodes के दौरान confusion, forgetfulness और delusions जैसे कुछ transient symptoms बताए गए थे। लेकिन अदालत के सामने सवाल केवल यह नहीं था कि कभी-कभार ऐसे symptoms दिखाई दिए या नहीं। असली सवाल यह था कि क्या उपलब्ध material prima facie ऐसी mental illness साबित करता है जिसके आधार पर Section 105 के तहत Mental Health Review Board को reference करना जरूरी हो। कोर्ट ने उपलब्ध सामग्री को उस स्तर का पर्याप्त proof नहीं माना।
बेटे ने खुद माना कि वह मेडिकल एक्सपर्ट नहीं है
मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह भी सामने आई कि बेटे ने स्वयं स्वीकार किया कि वह medical expert नहीं है। ऐसे में केवल अपने interpretation के आधार पर पिता की मानसिक क्षमता पर सवाल उठाना और medical board examination की मांग करना अदालत को पर्याप्त आधार नहीं लगा। यही वजह है कि कोर्ट ने medical material और पूरे litigation background को साथ देखकर आवेदन को स्वीकार करने से इनकार किया।
₹5 लाख की लागत क्यों लगाई गई?
डिवीजन बेंच के सामने मामला आने के बाद अदालत ने केवल अपील खारिज करके मामला खत्म नहीं किया। कोर्ट ने बेटे के आचरण को गंभीरता से लिया और ₹5 लाख की exemplary costs लगाई। इसका संदेश साफ है—यदि अदालत की प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से litigation में घसीटने, दबाव बनाने या मुकदमे में tactical advantage हासिल करने के लिए किया जाता है, तो केवल याचिका खारिज करना हमेशा पर्याप्त नहीं होगा। यहां लागत का उद्देश्य ऐसी litigation को हतोत्साहित करना भी है।
बुजुर्ग पिता की उम्र और स्वास्थ्य को कोर्ट ने गंभीरता से लिया
मामले में पिता की उम्र और स्वास्थ्य भी महत्वपूर्ण परिस्थितियां थीं। उपलब्ध रिकॉर्ड में उन्हें वरिष्ठ नागरिक और retired IAS officer के रूप में भी संदर्भित किया गया है। दिसंबर 2025 की एक अलग Bombay High Court proceeding में भी उन्हें 75 वर्षीय पिता और senior citizen के रूप में दर्ज किया गया था। ऐसे में हाईकोर्ट ने यह देखा कि क्या एक वृद्ध और विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे व्यक्ति को लगातार litigation में घसीटना न्यायिक प्रक्रिया का उचित इस्तेमाल है।
डिवीजन बेंच का जवाब स्पष्ट रूप से बेटे के खिलाफ गया।
यह सिर्फ पिता-पुत्र का विवाद नहीं, Mental Health Law के लिए भी अहम फैसला
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह Mental Healthcare Act के welfare-oriented character को रेखांकित करता है। Mental Healthcare Act, 2017 में मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए कई rights-based protections हैं। उदाहरण के लिए, Act व्यक्ति को mental healthcare तक पहुंच का अधिकार देता है और mental health से संबंधित जानकारी की confidentiality को भी मान्यता देता है। ऐसे कानून को केवल किसी civil dispute में दूसरे पक्ष की legal capacity पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल करना उसके मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकता है।
क्या कोर्ट ने Mental Health जांच का रास्ता बंद कर दिया?
नहीं।
यह distinction खबर में साफ रखना जरूरी है। Bombay High Court ने Section 105 को unconstitutional या invalid नहीं कहा है। न ही अदालत ने यह कहा है कि किसी व्यक्ति की mental illness की judicial scrutiny नहीं हो सकती। Section 105 आज भी लागू है और कानून में स्पष्ट रूप से judicial proceedings में mental illness के सवाल को Board के पास भेजने की व्यवस्था मौजूद है। हाईकोर्ट ने सिर्फ यह स्पष्ट किया कि इस provision का इस्तेमाल genuine legal necessity और available proof के आधार पर होना चाहिए, न कि विरोधी पक्ष को litigation में कमजोर करने के लिए।
2019 से चला आ रहा था संपत्ति विवाद
उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, यह मानसिक स्वास्थ्य संबंधी आवेदन पहले से चल रहे ancestral property/partition dispute की पृष्ठभूमि में दाखिल हुआ था।
यानी mental-health issue इस विवाद का मूल मुद्दा नहीं था; यह बाद की कार्यवाही में सामने आया। यही बात सिंगल जज के 17 फरवरी 2026 के आदेश में भी महत्वपूर्ण थी। अदालत ने नोट किया कि बेटे ने पहले से पिता के खिलाफ partition-related litigation शुरू कर रखी थी और उसी litigation के दौरान पिता की mental competency पर सवाल उठाया गया।
पिता-पुत्र के बीच पहले भी पहुंच चुका है विवाद हाईकोर्ट
यह भी उल्लेखनीय है कि Jitendra Gorakh Megh और Gorakh Govind Megh के बीच विवाद इससे पहले भी Bombay High Court तक पहुंच चुका है। दिसंबर 2025 में एक अलग proceeding में Senior Citizens Act से जुड़ा विवाद सामने आया था, जिसमें अदालत ने senior citizen के नाम पर summary eviction के इस्तेमाल से जुड़े statutory requirements पर विचार किया था। वह मामला वर्तमान Mental Healthcare Act proceeding से अलग था, लेकिन इससे दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से चल रहे litigation background का पता चलता है। इसे वर्तमान मामले का direct precedent नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि दोनों मामलों के कानूनी प्रश्न अलग हैं।
हाईकोर्ट के फैसले का बड़ा संदेश
Bombay High Court का यह फैसला दो महत्वपूर्ण सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाता है। पहला—यदि किसी व्यक्ति की वास्तविक mental illness का सवाल judicial proceeding में सामने आता है और कानून की शर्तें पूरी होती हैं, तो Section 105 के तहत जांच का mechanism उपलब्ध है। दूसरा—इसी mechanism को केवल इसलिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि किसी civil या property dispute में विरोधी पक्ष की legal capacity पर सवाल उठाकर उसे litigation में कमजोर किया जा सके। यानी Mental Healthcare Act का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अदालत में परेशान करना नहीं, बल्कि मानसिक बीमारी से प्रभावित व्यक्ति के अधिकारों और गरिमा की रक्षा करना है।
मानसिक स्वास्थ्य कानून को मुकदमे की रणनीति बनाना महंगा पड़ सकता है
78 साल के पिता की mental health जांच कराने की मांग से शुरू हुआ यह मामला अब एक व्यापक कानूनी संदेश दे रहा है। Bombay High Court ने स्पष्ट कर दिया है कि Mental Healthcare Act की protective provisions को adversarial litigation का हथियार नहीं बनाया जा सकता। genuine mental illness और tactical litigation के बीच फर्क करना अदालत का महत्वपूर्ण दायित्व है। और इस मामले में कोर्ट ने केवल बेटे की अपील खारिज नहीं की, बल्कि ₹5 लाख की exemplary costs लगाकर यह संदेश भी दिया कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की कोशिश की गई तो उसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। इस फैसले की सबसे अहम पंक्ति यही है—Mental Healthcare Act किसी व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए “shield” है, विरोधी पक्ष के खिलाफ इस्तेमाल होने वाली “sword” नहीं।
