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पुलिस स्टेशन में घंटों इंतजार करना ‘गिरफ्तारी’ नहीं, Bombay HC का बड़ा फैसला; जानिए कब से माना जाएगा Arrest
सुबह करीब 11 बजे एक आरोपी पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन पहुंचा और रात 8:15 बजे उसकी औपचारिक गिरफ्तारी हुई। करीब 9 घंटे तक थाने में रहने के बावजूद क्या उसकी गिरफ्तारी सुबह 11 बजे से ही मानी जाएगी? इसी सवाल पर Bombay High Court ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल पुलिस स्टेशन में इंतजार करना अपने-आप में ‘Arrest’ नहीं है। अदालत ने माना कि इस मामले में आरोपी की वास्तविक गिरफ्तारी रात 8:15 बजे हुई और इसलिए उसे अगले दिन कोर्ट में पेश करना 24 घंटे की संवैधानिक सीमा के भीतर था। लेकिन इस फैसले के साथ कोर्ट ने Arrest और Custody के बीच का वह महत्वपूर्ण फर्क भी सामने रखा, जो हर आरोपी के अधिकारों के लिए बेहद अहम है।

मुंबई:
क्या किसी आरोपी को पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन बुलाकर कई घंटे वहां बैठाए रखना अपने-आप में उसकी गिरफ्तारी माना जाएगा? Bombay High Court ने इस सवाल पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल पुलिस स्टेशन में इंतजार करने से किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं माना जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह निष्कर्ष मामले की विशेष परिस्थितियों में दिया है—जहां आरोपी खुद पूछताछ के लिए थाने पहुंचा था, उसके पास मोबाइल फोन था और वह शाम तक अन्य लोगों से संपर्क में था। Justice Sarang V. Kotwal और Justice Ranjitsinha Raja Bhonsale की Division Bench ने Manohar Sharad Pathare v. State of Maharashtra मामले में 21 अगस्त 2026 को आदेश पारित किया। कोर्ट ने माना कि आरोपी की वास्तविक गिरफ्तारी रात 8:15 बजे हुई थी, न कि सुबह 11 बजे जब वह Dongri Police Station पहुंचा था।
क्या था पूरा मामला?
मामला मुंबई के Dongri Police Station में 4 जून 2026 को दर्ज FIR से जुड़ा था। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार FIR में POCSO Act की Sections 10 और 12 तथा Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) की Section 74 लगाई गई थी। रिपोर्टिंग में पीड़ित की उम्र 11 वर्ष बताई गई है। पीड़ित की पहचान से जुड़ी कोई जानकारी प्रकाशित नहीं की जानी चाहिए। Manohar Sharad Pathare को 10 जून 2026 को पूछताछ के लिए Dongri Police Station बुलाया गया। वह लगभग सुबह 11 बजे से 12 बजे के बीच थाने पहुंचे।
याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया कि थाने पहुंचने के बाद उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई और उनकी movement पूरी तरह पुलिस के नियंत्रण में थी। इसलिए उनकी गिरफ्तारी उसी समय से मानी जानी चाहिए थी। लेकिन पुलिस का कहना था कि उस समय औपचारिक गिरफ्तारी नहीं हुई थी। Investigating Officer किसी दूसरे मामले में व्यस्त थे, जहां दूसरे आरोपी की तबीयत खराब होने के कारण उसे अस्पताल ले जाना पड़ा था। हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को reasonable माना।
रात 8:15 बजे हुई वास्तविक गिरफ्तारी
कोर्ट ने रिकॉर्ड के आधार पर माना कि Pathare की औपचारिक गिरफ्तारी 10 जून 2026 को रात 8:15 बजे हुई। इसके बाद उन्हें 11 जून 2026 को दोपहर 3:46 बजे Special Court के सामने पेश किया गया। Pathare की ओर से दलील थी कि यदि सुबह 11 बजे से ही उनकी गिरफ्तारी मान ली जाए तो Court में पेशी 24 घंटे की संवैधानिक सीमा के बाद हुई। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि Article 22(2) में 24 घंटे की गणना वास्तविक गिरफ्तारी से होगी और इस मामले में गिरफ्तारी रात 8:15 बजे हुई थी। इसलिए अगली दोपहर 3:46 बजे Court में पेशी 24 घंटे के भीतर थी।
फोन रिकॉर्ड बना महत्वपूर्ण सबूत
अदालत ने एक अहम तथ्य पर भी गौर किया—Pathare के पास मोबाइल फोन था और फोन रिकॉर्ड से पता चला कि वह शाम करीब 7 बजे तक अन्य लोगों के संपर्क में थे।
कोर्ट ने माना कि यह परिस्थिति इस दलील के खिलाफ जाती है कि वह सुबह से ही ऐसी पूर्ण हिरासत में थे जिसे कानूनन गिरफ्तारी माना जाए। Bench ने यह भी कहा कि ऐसा कोई ठोस रिकॉर्ड सामने नहीं आया जिससे साबित हो कि उन्हें अपने रिश्तेदारों से संपर्क करने से पूरी तरह रोका गया था।
कोर्ट ने कहा- गिरफ्तारी से पहले आरोपी की भूमिका जांच सकती है पुलिस
Bombay HC ने कहा कि किसी आरोपी के पुलिस स्टेशन पहुंचते ही उसे गिरफ्तार करना जरूरी नहीं है। पुलिस पहले पूछताछ कर सकती है और आरोपी की भूमिका के संबंध में संतुष्ट हो सकती है। यदि पूछताछ के बाद गिरफ्तारी आवश्यक लगे, तभी actual arrest की जा सकती है। कोर्ट ने माना कि इस मामले में Investigating Officer दूसरे मामले में व्यस्त था और उस कारण आरोपी को इंतजार करना पड़ा। इस परिस्थिति में कुछ घंटे थाने में इंतजार करना अपने-आप में गिरफ्तारी नहीं बन गया।
‘Custody’ और ‘Arrest’ में क्या अंतर है?
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू यही है। Bombay HC ने हाल के एक अन्य फैसले, Mohd. Avesh Mohd. Hanif Potiyawala v. State of Maharashtra में चर्चा किए गए सिद्धांत का सहारा लिया। 11 अगस्त 2026 के उस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि हर arrest में custody होती है, लेकिन हर custody arrest नहीं होती। हालांकि, कुछ परिस्थितियों में custody की प्रकृति इतनी restrictive हो सकती है कि उसे arrest माना जा सकता है। इसलिए किसी मामले में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि व्यक्ति पुलिस स्टेशन में मौजूद था। अदालत यह भी देख सकती है कि:
उसे पुलिस स्टेशन कैसे और क्यों लाया गया;
क्या वह अपनी इच्छा से वहां आया था;
क्या उसकी movement वास्तव में पूरी तरह प्रतिबंधित थी;
क्या उसे फोन या अन्य लोगों से संपर्क करने की अनुमति थी;
पुलिस की ओर से formal arrest कब दिखाई गई;
Station Diary, CCTV और अन्य records क्या बताते हैं।
Nazirkar केस से कैसे अलग है Pathare का मामला?
यहां Bombay HC के 2025 के Hanumant Jagganath Nazirkar v. State of Maharashtra फैसले का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। Nazirkar मामले में Bombay HC ने आरोपी की गिरफ्तारी को अवैध माना था क्योंकि उसे Magistrate के सामने निर्धारित समय के भीतर पेश नहीं किया गया था। अदालत ने Article 22(2) के तहत personal liberty की सुरक्षा को गंभीरता से लिया था। लेकिन Pathare मामले के तथ्य अलग थे। Nazirkar मामले में पुलिस द्वारा व्यक्ति को अपने नियंत्रण में लेने और लंबे समय तक उसकी custody में रखने से जुड़े गंभीर सवाल थे। वहीं Pathare मामले में आरोपी को पुलिस ने उसके घर से पकड़कर नहीं लाया था, बल्कि उसे पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन बुलाया गया था। साथ ही, अदालत ने फोन रिकॉर्ड और Investigating Officer की explanation को भी ध्यान में रखा। यानी Pathare फैसला यह नहीं कहता कि पुलिस किसी व्यक्ति को घंटों अपनी custody में रखकर बाद में मनमाने समय से arrest दिखा सकती है। अदालत ने केवल इस मामले के उपलब्ध facts के आधार पर माना कि सुबह 11 बजे से रात 8:15 बजे तक की अवधि कानूनी गिरफ्तारी नहीं थी।
Article 22(2) और BNSS Section 58 क्यों महत्वपूर्ण?
संविधान का Article 22(2) गिरफ्तार व्यक्ति को महत्वपूर्ण सुरक्षा देता है। गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम Magistrate के सामने पेश करना होता है, निर्धारित अपवादों को छोड़कर। BNSS की Section 58 भी गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक custody में रखने पर प्रतिबंध से जुड़ी है, जब तक Magistrate की अनुमति न हो। इसीलिए किसी भी arrest case में यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि गिरफ्तारी वास्तव में कब हुई। Pathare मामले में कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि 24 घंटे की गणना सुबह 11 बजे थाने पहुंचने से नहीं, बल्कि रात 8:15 बजे हुई actual arrest से होगी।
क्या इसका मतलब है कि पुलिस किसी को घंटों थाने में बैठा सकती है?
नहीं। यह इस फैसले का व्यापक अर्थ नहीं है। High Court का निर्णय मामले के specific facts पर आधारित है। यदि किसी अन्य मामले में रिकॉर्ड से साबित हो कि पुलिस ने व्यक्ति की movement पूरी तरह रोक दी, उसे जबरन अपने नियंत्रण में रखा, संपर्क करने से रोका या केवल 24 घंटे की सीमा से बचने के लिए formal arrest बाद में दिखाई, तो अदालत उस custody की वास्तविक शुरुआत की जांच कर सकती है। इसलिए ‘थाने में इंतजार’ और ‘illegal detention’ के बीच अंतर हमेशा facts और evidence से तय होगा।
Bail का रास्ता खुला
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि इससे आरोपी के regular bail मांगने का अधिकार खत्म नहीं होता। वह Trial Court के सामने bail application दाखिल कर सकता है और उस आवेदन पर कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से फैसला होगा।
अन्य कानूनी रिपोर्टिंग से भी मुख्य तथ्य पुष्ट
इस मामले की स्वतंत्र कानूनी रिपोर्टिंग में भी मुख्य तथ्य समान हैं—Pathare को 10 जून को लगभग सुबह 11 बजे Dongri Police Station बुलाया गया, Investigating Officer दूसरे मामले में व्यस्त था, Pathare शाम तक फोन पर संपर्क में था और रात 8:15 बजे formal arrest हुई। अगले दिन दोपहर 3:46 बजे उन्हें Special Court में पेश किया गया। Bombay High Court का यह फैसला गिरफ्तारी और पूछताछ के बीच महत्वपूर्ण कानूनी अंतर को रेखांकित करता है। कोर्ट ने माना कि केवल पुलिस स्टेशन में मौजूद रहने या कुछ घंटों तक पूछताछ का इंतजार करने से व्यक्ति उसी क्षण कानूनी रूप से गिरफ्तार नहीं हो जाता। लेकिन फैसला पुलिस को मनमानी custody की छूट भी नहीं देता। यदि किसी व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता छीन ली गई है, तो अदालत परिस्थितियों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह जांच सकती है कि उसकी गिरफ्तारी वास्तव में कब शुरू हुई। Pathare मामले में फोन रिकॉर्ड, पुलिस की explanation और formal arrest के समय जैसे तथ्यों के आधार पर Bombay HC ने माना कि वास्तविक गिरफ्तारी रात 8:15 बजे हुई थी और इसलिए 24 घंटे के भीतर Court में पेशी की संवैधानिक शर्त पूरी हुई।
