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Lucknow Fire Tragedy: 15 मौतों वाली बिल्डिंग पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मालिक की याचिका खारिज; LDA के ध्वस्तीकरण पर नहीं लगी रोक
लखनऊ के अलीगंज में 15 लोगों की जान लेने वाली भीषण आग के बाद अवैध निर्माण पर हुई कार्रवाई को चुनौती देने वाले भवन मालिक को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने LDA के ध्वस्तीकरण आदेश और उसके बाद की गई कार्रवाई के खिलाफ दाखिल याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता बीरेंद्र प्रसाद शुक्ला को कुछ सीमित राहत के लिए अदालत का दरवाजा खुला रखा है।

लखनऊ के अलिगंज में 15 लोगों की जान लेने वाली भीषण आग के बाद विवादों में आई बिल्डिंग को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम आदेश दिया है। बिल्डिंग के सह-मालिक की ओर से लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के demolition order और बाद में हुई ध्वस्तीकरण कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका हाईकोर्ट ने entertain करने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने हालांकि याचिकाकर्ता के लिए कानूनी रास्ता बंद नहीं किया और उसे कानून में उपलब्ध statutory appeal दाखिल करने की छूट दी है।
इस मामले की खास बात यह है कि जिस बिल्डिंग में जून 2026 में भीषण आग लगी और 15 लोगों की मौत हुई, वह कथित unauthorized construction को लेकर वर्ष 2016 में भी LDA की demolition proceedings का सामना कर चुकी थी। करीब एक दशक बाद वही संपत्ति दोबारा demolition action के केंद्र में आ गई।
हाईकोर्ट में किसने और क्या चुनौती दी?
62 वर्षीय बिरेंद्र प्रसाद शुक्ला, जो इस संपत्ति के co-owner हैं, ने हाईकोर्ट में LDA के 10 जुलाई 2026 के demolition order को चुनौती दी थी। उन्होंने इसके अलावा 25 जुलाई 2026 को LDA द्वारा की गई demolition कार्रवाई तथा ध्वस्तीकरण की लागत के रूप में मांगे गए ₹26,14,210 को भी चुनौती दी। मामले की सुनवाई Justice Rajan Roy और Justice Manjive Shukla की Division Bench ने की। कोर्ट ने Uttar Pradesh Urban Planning and Development Act, 1973 की Section 27(2) के तहत उपलब्ध statutory remedy को देखते हुए writ petition पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने याचिका क्यों नहीं सुनी?
हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण कानूनी आधार यह रहा कि petitioner के पास कानून के तहत appeal का वैकल्पिक उपाय मौजूद है। ऐसे मामलों में यदि statute किसी आदेश के खिलाफ विशेष appellate remedy उपलब्ध कराता है, तो हाईकोर्ट सामान्यतः Article 226 के तहत writ jurisdiction का इस्तेमाल करने से पहले पक्षकार को उसी वैधानिक remedy का उपयोग करने के लिए कह सकता है। इसलिए कोर्ट ने LDA के demolition order को merits पर अंतिम रूप से सही ठहराने का फैसला नहीं दिया। कोर्ट ने केवल writ petition entertain करने से इनकार किया और petitioner को statutory appeal का रास्ता अपनाने की अनुमति दी।
22 जून को हुआ था खौफनाक हादसा
पूरा मामला 22 जून 2026 को सामने आया, जब लखनऊ के अलिगंज इलाके में स्थित तीन मंजिला इमारत में अचानक भीषण आग लग गई। आग इतनी भयावह थी कि बचाव अभियान में दमकलकर्मियों और SDRF को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। हादसे में 15 लोगों की मौत हुई। रिपोर्टों के अनुसार, इमारत में दूसरी मंजिल पर Head Hopper Studios नाम का 3D art और game development studio संचालित हो रहा था। मृतकों में बड़ी संख्या में इसी संस्थान से जुड़े लोग बताए गए। बचाव अभियान के दौरान धुएं और इमारत तक सीमित पहुंच के कारण rescue teams को adjoining building की छत तक पहुंचना पड़ा। रिपोर्टों के मुताबिक, बचाव के लिए commercial building की दीवार में भी बड़े छेद किए गए।
Residential नक्शा, लेकिन चल रहा था Commercial इस्तेमाल?
हादसे के बाद LDA की जांच में भवन के नक्शे और उसके वास्तविक इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल उठे। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, करीब 1,992 वर्गफुट के प्लॉट पर 20 अगस्त 2014 को residential building का नक्शा स्वीकृत हुआ था। लेकिन बाद में भवन में commercial activities संचालित होने लगीं। रिपोर्टों में gaming और animation studio के अलावा pet shop तथा veterinary clinic जैसी गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया। यानी जांच का एक प्रमुख पहलू यह था कि जिस भवन को residential use के लिए मंजूरी मिली थी, उसका इस्तेमाल commercial purposes के लिए किस तरह किया जा रहा था।
2016 में भी जारी हुआ था Demolition Order
इस मामले का सबसे अहम और चौंकाने वाला पहलू भवन का पुराना रिकॉर्ड है। अन्य मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2016 में भी इसी संपत्ति पर कथित unauthorized construction को लेकर LDA ने demolition proceedings शुरू की थीं। उस समय demolition order भी जारी किया गया था। हालांकि, बाद में मालिक की ओर से किए गए आवेदन के बाद वह आदेश वापस ले लिया गया था। यानी जून 2026 की दर्दनाक घटना से करीब 10 साल पहले भी इसी भवन को लेकर LDA के रिकॉर्ड में अनधिकृत निर्माण का विवाद सामने आ चुका था।
आग के अगले दिन LDA ने शुरू की कार्रवाई
15 लोगों की मौत के बाद LDA ने भवन के खिलाफ दोबारा कार्रवाई शुरू की। 23 जून 2026 को LDA ने Uttar Pradesh Urban Planning and Development Act, 1973 की Section 27(1) के तहत notice जारी किया। मालिकों को संबंधित दस्तावेज और अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। इसके बाद मामले की सुनवाई LDA की designated authority के समक्ष हुई। 7 जुलाई को सुनवाई के बाद मालिकों की ओर से 8 जुलाई को objections दाखिल किए गए। LDA की enforcement wing की रिपोर्ट समेत संबंधित रिकॉर्ड पर विचार किया गया।
10 जुलाई को LDA का Demolition Order
सुनवाई और रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद 10 जुलाई 2026 को LDA की designated authority ने भवन में मौजूद कथित unauthorized construction को हटाने का आदेश दिया। मालिकों को अनधिकृत हिस्से को हटाने के लिए 15 दिन का समय दिया गया था। यही 10 जुलाई का आदेश बाद में हाईकोर्ट में चुनौती का मुख्य आधार बना।
मालिकों ने खुद शुरू किया Demolition
LDA के आदेश के बाद मालिकों की ओर से खुद भी भवन के कुछ हिस्सों को हटाने की कार्रवाई शुरू की गई। रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 20 जुलाई से demolition work शुरू हुआ था। हालांकि निर्धारित समय के भीतर पूरा unauthorized structure नहीं हटाया जा सका। इसके बाद LDA ने खुद शेष हिस्से को हटाने का फैसला किया।
25 जुलाई को LDA ने की Demolition कार्रवाई
25 जुलाई 2026 को LDA ने भारी मशीनरी और पुलिस बल की मौजूदगी में भवन के शेष हिस्से को ध्वस्त करने की कार्रवाई की। यही demolition action भी बिरेंद्र प्रसाद शुक्ला की हाईकोर्ट याचिका में चुनौती का हिस्सा था। इसके साथ ही LDA ने ध्वस्तीकरण पर हुए खर्च की वसूली के लिए ₹26,14,210 की demand भी उठाई।
अब आगे क्या होगा?
हाईकोर्ट के आदेश के बाद petitioner के पास अब statutory appeal का रास्ता खुला है। वह Uttar Pradesh Urban Planning and Development Act, 1973 की Section 27(2) के तहत उपलब्ध appellate remedy का इस्तेमाल करते हुए LDA के demolition order और उससे जुड़े मुद्दों को चुनौती दे सकता है। इसलिए हाईकोर्ट के मौजूदा आदेश को यह नहीं माना जा सकता कि Court ने LDA के demolition order की merits पर अंतिम फैसला दे दिया है। Court ने फिलहाल writ petition entertain करने से इनकार किया है क्योंकि petitioner के लिए कानून में वैकल्पिक statutory remedy मौजूद है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह मामला सिर्फ एक demolition dispute नहीं है। इसमें तीन महत्वपूर्ण सवाल एक साथ जुड़े हैं—पहला, किसी भवन के approved land use और वास्तविक commercial use के बीच अंतर; दूसरा, कथित unauthorized construction के खिलाफ विकास प्राधिकरण की कार्रवाई; और तीसरा, ऐसे मामलों में High Court की writ jurisdiction और statutory appellate remedy का संबंध। सबसे अहम बात यह है कि जिस संपत्ति पर 2016 में भी demolition proceedings हुई थीं, वही 2026 में 15 लोगों की मौत वाली भयावह आग के बाद फिर प्रशासनिक और न्यायिक कार्रवाई के केंद्र में आ गई। 5 मौतों के बाद शुरू हुई कार्रवाई अब हाईकोर्ट तक पहुंची, लेकिन कोर्ट ने LDA की कार्रवाई पर merits में फैसला देने के बजाय वैधानिक अपील का रास्ता अपनाने को कहा है। अब असली कानूनी लड़ाई statutory appellate forum में होगी, जहां demolition order और उससे जुड़े ₹26.14 लाख के खर्च की मांग को चुनौती दी जा सकती है।
