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HSRP विवाद: ‘OEM मॉडल’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा नंबर प्लेट निर्माता, राज्यों की टेंडर शर्तों को दी चुनौती
देशभर में वाहनों की सुरक्षा और पहचान से जुड़ी हाई सिक्योरिटी रजिस्ट्रेशन प्लेट (HSRP) को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में बड़ा विवाद पहुंच गया है। केंद्र से मंजूर HSRP निर्माता Zooom Engineering LLP ने राज्यों की उन टेंडर शर्तों को चुनौती दी है, जिनके तहत नंबर प्लेट की सप्लाई का अधिकार केवल वाहन निर्माताओं (OEMs) तक सीमित किया जा रहा है। निर्माता का आरोप है कि ऐसी शर्तें मंजूरशुदा HSRP निर्माताओं के लिए बाजार में प्रतिस्पर्धा के रास्ते बंद करती हैं और नियमों की मूल भावना पर सवाल खड़े करती हैं।

High Security Registration Plate यानी HSRP को लेकर देश में एक नया कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार से approved HSRP manufacturer Zooom Engineering LLP ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए राज्यों की उन tender conditions और ‘OEM model’ को चुनौती दी है, जिनके कारण 1 अप्रैल 2019 से पहले registered वाहनों के लिए HSRP की supply और affixation कुछ चुनिंदा manufacturers या vehicle manufacturers के authorised network तक सीमित होने का आरोप है। कंपनी का कहना है कि Central Motor Vehicles Rules, 1989 के Rule 50 के तहत approved licence-plate manufacturers की भी भूमिका है, लेकिन राज्यों की tender conditions और OEM-based व्यवस्था के कारण उन्हें practically बाजार से बाहर किया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि इससे competition कम हो रहा है, कुछ निजी manufacturers के हाथों market concentration बढ़ रहा है और vehicle owners को HSRP के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया?
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने Zooom Engineering LLP की याचिका पर नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को होगी। याचिका Zooom Engineering LLP की ओर से दाखिल की गई है और इसमें Union of India के साथ संबंधित राज्यों की HSRP policy, tender conditions और authorization व्यवस्था को चुनौती दी गई है। कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने अदालत के सामने Rule 50 और विभिन्न State notifications का हवाला दिया।
विवाद की जड़ क्या है?
मामले का मुख्य विवाद 1 अप्रैल 2019 से पहले registered पुराने वाहनों के लिए HSRP की supply और fitting को लेकर है। HSRP व्यवस्था में 1 अप्रैल 2019 की तारीख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस तारीख से निर्मित नए वाहनों के लिए केंद्र सरकार ने OEM-based व्यवस्था लागू की थी। 6 दिसंबर 2018 को Ministry of Road Transport and Highways (MoRTH) ने घोषणा की थी कि 1 अप्रैल 2019 से निर्मित नए वाहनों में HSRP vehicle manufacturer द्वारा उपलब्ध कराई जाएगी और उसके dealer के माध्यम से vehicle पर लगाई जाएगी। इसका उद्देश्य HSRP की uniformity, security और tamper-proof व्यवस्था सुनिश्चित करना था। लेकिन पुराने वाहनों के लिए Rule 50(1)(v) में licence-plate manufacturers और उनके dealers की भूमिका भी दिखाई देती है। यही अंतर मौजूदा मुकदमे का महत्वपूर्ण कानूनी आधार बन गया है।
Rule 50 में क्या है प्रावधान?
Rule 50(1)(v) के तहत HSRP की supply/affixation व्यवस्था में अलग-अलग categories का उल्लेख है। इनमें registering authority, vehicle manufacturers और उनके dealers तथा State Government या UT Administration द्वारा approved licence-plate manufacturers/dealers शामिल हैं। Zooom Engineering का तर्क है कि यदि किसी manufacturer को केंद्र से आवश्यक approval मिला हुआ है और वह HSRP manufacture करने के लिए eligible है, तो केवल State tender conditions या OEM arrangements के आधार पर उसे पुराने वाहनों के बाजार से बाहर नहीं किया जा सकता। वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने अदालत में इसी regulatory framework का हवाला देते हुए कहा कि vehicle manufacturers तक HSRP manufacturing और supply को सीमित करना equitable distribution और competition से जुड़े सवाल पैदा करता है।
MoRTH की 2023 advisory भी अहम
इस विवाद के बीच MoRTH की 2023 की advisory भी महत्वपूर्ण है। केंद्र ने States और Union Territories से authorised HSRP vendors की जानकारी मांगी थी और Rule 50(1)(v) के तहत पुराने वाहनों के लिए State-approved licence-plate manufacturers/dealers की भूमिका को रेखांकित किया था।
इससे यह स्पष्ट होता है कि पुराने वाहनों के मामले में approved licence-plate manufacturers की category regulatory framework में मौजूद रही है।
यही बात Zooom Engineering की याचिका के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कंपनी का कहना है कि State-level tender conditions के जरिए इस category को व्यवहार में खत्म नहीं किया जा सकता।
नया वाहन और पुराना वाहन: क्या है अंतर?
HSRP विवाद को समझने के लिए दोनों व्यवस्थाओं में अंतर समझना जरूरी है।
1 अप्रैल 2019 के बाद निर्मित वाहन
इन वाहनों के लिए OEM-based व्यवस्था लागू की गई। Vehicle manufacturer HSRP उपलब्ध कराता है और उसका authorised dealer इसे vehicle पर affix करता है।
1 अप्रैल 2019 से पहले registered वाहन
इन पुराने वाहनों के लिए Rule 50 के framework में approved licence-plate manufacturers/dealers की भूमिका भी मौजूद है। State Government/UT Administration द्वारा authorization की प्रक्रिया यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। Zooom का कहना है कि इसी category के वाहनों के लिए कई राज्यों ने ऐसी tender conditions बनाई हैं, जिनसे independent approved manufacturers practically बाहर हो रहे हैं।
केरल हाईकोर्ट में भी उठा था ऐसा विवाद
HSRP manufacturers और States के बीच यह विवाद नया नहीं है। केरल हाईकोर्ट में भी पुराने वाहनों के लिए HSRP manufacturers की भूमिका और State Government की authorization power को लेकर litigation हो चुका है। जनवरी 2025 के एक आदेश में केरल हाईकोर्ट ने Rule 50(1)(v) के तहत registering authority, vehicle manufacturers/dealers और State-approved licence-plate manufacturers/dealers की अलग-अलग categories पर विचार किया था।
मामले में यह सवाल भी उठा था कि Type Approval Certificate रखने वाले HSRP manufacturer को State के authorization mechanism में किस तरह शामिल किया जाना चाहिए। बाद की कार्यवाही में अदालत ने पुराने वाहनों के लिए HSRP manufacturers/dealers को authorize करने की प्रक्रिया और State द्वारा transparent criteria निर्धारित करने के पहलुओं पर भी विचार किया। यह पृष्ठभूमि मौजूदा Supreme Court challenge को महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि यहां भी विवाद का केंद्र यही है कि पुराने वाहनों के लिए independent approved HSRP manufacturers को किस हद तक market access मिलना चाहिए।
राज्यों की tender policy पर सवाल
Zooom Engineering ने विशेष रूप से राज्यों की tender conditions पर सवाल उठाए हैं।
याचिका के अनुसार कुछ tenders में बहुत ऊंचे financial और experience criteria निर्धारित किए गए हैं। इनमें कथित तौर पर:
₹100 करोड़ तक का minimum turnover
किसी State में पांच साल का अनुभव
कम से कम पांच States में काम करने का अनुभव
छह Certificate of Production (COP) cycles
₹1 करोड़ तक की Earnest Money Deposit
₹5 करोड़ तक की Performance Bank Guarantee
जैसी शर्तें शामिल हैं।
याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसी शर्तें Type Approval Certificate रखने वाले छोटे या अन्य approved HSRP manufacturers के लिए market में प्रवेश को मुश्किल बना सकती हैं। हालांकि, इन tender conditions की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।
कंपनी ने लगाया cartelisation का आरोप
Zooom Engineering ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि approved manufacturers को बाहर रखने से HSRP market कुछ चुनिंदा कंपनियों तक सीमित हो रहा है।
कंपनी ने इसे monopoly और cartelisation की स्थिति पैदा करने वाला बताया है। याचिका में दावा किया गया है कि इसके कारण vehicle owners को HSRP के लिए अधिक भुगतान करना पड़ रहा है और public को आर्थिक नुकसान हो रहा है। कंपनी के अनुसार OEM व्यवस्था में HSRP की कीमत लगभग ₹210 के आसपास हो सकती है, जबकि vehicle owners से लगभग ₹800 तक charge किया जा रहा है। कंपनी का दावा है कि independent approved manufacturers लगभग ₹400 में HSRP उपलब्ध करा सकते हैं। याचिका में लगभग 10 करोड़ pre-April 2019 vehicles का अनुमान लगाते हुए public पर संभावित वित्तीय बोझ लगभग ₹4,000 करोड़ बताया गया है।
हालांकि, ये सभी आंकड़े और cartelisation/monopoly के आरोप फिलहाल याचिकाकर्ता के दावे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इन पर कोई अंतिम finding नहीं दी है।
Odisha का OEM model भी चर्चा में रहा
पुराने वाहनों के लिए OEM-authorised model अपनाने वाले राज्यों का उदाहरण भी इस विवाद को समझने में महत्वपूर्ण है। Odisha Transport Authority ने मई 2022 में पुराने वाहनों पर HSRP लगाने के लिए OEMs/authorised dealers को लेकर व्यवस्था जारी की थी। राज्य की ओर से इसका उद्देश्य substandard material और गैर-अधिकृत plates को रोकना बताया गया था। यानी अलग-अलग राज्यों ने पुराने वाहनों के लिए HSRP implementation को लेकर अलग-अलग administrative models अपनाए हैं। यही स्थिति अब Supreme Court के सामने uniformity और State powers से जुड़े सवाल को महत्वपूर्ण बनाती है।
महाराष्ट्र में भी सामने आ चुकी है implementation की चुनौती
HSRP व्यवस्था लागू करने में राज्यों को केवल कानूनी ही नहीं बल्कि practical चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा है। महाराष्ट्र में पुराने वाहनों के लिए HSRP लगाने की tender प्रक्रिया को लेकर पहले भी विवाद और देरी सामने आ चुकी है। राज्य में tender process के दौरान पर्याप्त bidders नहीं मिलने और बाद में नई प्रक्रिया अपनाने की स्थिति बनी थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पुराने वाहनों के लिए देशभर में बड़े स्तर पर HSRP लगाने का काम vendor selection, price, installation network और authorization जैसे कई मुद्दों से जुड़ा है।
HSRP का मामला पहले भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है
HSRP implementation का विवाद पहली बार अदालत में नहीं आया है। लगभग डेढ़ दशक पहले भी Supreme Court में HSRP scheme के implementation को लेकर proceedings हुई थीं। उस समय केंद्र सरकार ने सभी categories के vehicles, including old vehicles, पर HSRP व्यवस्था लागू करने और States द्वारा उसके implementation की जानकारी दी थी। इससे HSRP व्यवस्था का judicial history काफी पुराना है।
Zooom Engineering की सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग?
याचिका में कंपनी ने मुख्य रूप से मांग की है कि:
approved HSRP manufacturers को पुराने वाहनों के लिए HSRP supply और affixation में समान अवसर मिले।
States/UTs के लिए HSRP manufacturers की authorization को लेकर uniform guidelines बनाई जाएं।
ऐसी State notifications और tender conditions पर रोक लगाई जाए जो independent approved manufacturers को बाहर करती हैं।
eligible HSRP manufacturers को पुराने वाहनों के लिए supply और affixation की अनुमति दी जाए।
OEM-based arrangements के कारण competition को खत्म करने वाली स्थितियों को रोका जाए।
क्या OEM मॉडल को अवैध बताया गया है?
नहीं। इस मामले को समझते समय यह distinction बेहद महत्वपूर्ण है। 2018 के केंद्रीय framework के तहत 1 अप्रैल 2019 से निर्मित नए वाहनों के लिए OEM-based HSRP व्यवस्था को स्पष्ट रूप से लागू किया गया था। इसलिए मौजूदा याचिका का मुख्य सवाल यह नहीं है कि OEM model अपने आप में illegal है या नहीं। असल सवाल यह है कि 1 अप्रैल 2019 से पहले registered पुराने वाहनों के लिए, जहां Rule 50 में approved licence-plate manufacturers की category मौजूद है, क्या States अपनी tender conditions और OEM authorisation arrangements के जरिए independent approved manufacturers को practically market से बाहर कर सकती हैं?
अब 5 अक्टूबर को क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केवल notice जारी किया है। कोर्ट ने अभी न तो OEM model को अवैध घोषित किया है और न ही cartelisation या monopoly के आरोपों पर कोई निष्कर्ष दिया है। 5 अक्टूबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों का पक्ष सामने आने के बाद मामला ज्यादा स्पष्ट हो सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देता है, तो इसका प्रभाव केवल Zooom Engineering तक सीमित नहीं रहेगा। इससे देशभर में पुराने वाहनों के लिए HSRP की supply, installation, State tender policy और OEM-authorisation model पर व्यापक असर पड़ सकता है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल कानूनी सवाल यही है—क्या 1 अप्रैल 2019 से पहले registered वाहनों के लिए States, Rule 50 में approved independent HSRP manufacturers की category मौजूद होने के बावजूद, tender conditions या OEM-based arrangements के जरिए HSRP supply और affixation को सीमित कर सकती हैं?
