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बदलापुर MIDC के उद्यमियों को बॉम्बे हाईकोर्ट से बड़ी राहत, नगर परिषद का संपत्ति कर का नोटिस रद्द

बदलापुर के MIDC क्षेत्र में कारोबार करने वाले उद्यमियों के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला बड़ी राहत लेकर आया है। नगर परिषद की ओर से लगाए गए संपत्ति कर को लेकर चल रहे विवाद में कोर्ट ने साफ कर दिया कि जब औद्योगिक क्षेत्र में सड़क, ड्रेनेज, स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी सुविधाएं MIDC उपलब्ध करा रहा है और इसके लिए सेवा शुल्क भी लिया जा रहा है, तो नगर परिषद की ओर से सीधे संपत्ति कर की मांग का आधार क्या है, यह स्पष्ट होना जरूरी है। हाईकोर्ट के इस रुख से फिलहाल कई औद्योगिक इकाइयों पर टैक्स का दबाव कम हुआ है।

Sonali29 अग. 2026, 04:02 PM IST
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बदलापुर MIDC के उद्यमियों को बॉम्बे हाईकोर्ट से बड़ी राहत, नगर परिषद का संपत्ति कर का नोटिस रद्द

बदलापुर के MIDC औद्योगिक क्षेत्र में काम कर रहे उद्यमियों को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ी राहत दी है। अदालत ने कुळगांव-बदलापुर नगर परिषद (KBMC) की ओर से औद्योगिक इकाइयों पर लगाए गए संपत्ति कर की मांग को टिकाऊ नहीं माना। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब MIDC खुद औद्योगिक क्षेत्र में सड़क, ड्रेनेज, स्ट्रीट लाइट और अन्य बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है तथा इनके लिए सेवा शुल्क वसूल रहा है, तो नगर परिषद केवल अपनी ओर से सीधे संपत्ति कर की मांग नहीं कर सकती। इसके लिए MIDC के साथ कानून के मुताबिक उचित व्यवस्था या समझौता जरूरी होगा।

5 अगस्त को जस्टिस जी. एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरती साठे की पीठ का फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में जस्टिस जी. एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरती साठे ने 5 अगस्त 2026 को यह फैसला सुनाया। मामला Badlapur Industrial Welfare Association और अन्य औद्योगिक प्लॉटधारकों की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था। साथ ही 2026 की अवमानना याचिका पर भी अदालत ने फैसला किया। उद्यमियों का मुख्य तर्क था कि वे अपने MIDC प्लॉट के लिए MIDC को पहले से सेवा शुल्क दे रहे हैं। इसके बावजूद KBMC ने उन पर अलग से संपत्ति कर लगाया और वसूली की कार्रवाई शुरू की।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

बदलापुर का औद्योगिक क्षेत्र MIDC के अधीन विकसित किया गया था। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड और रिपोर्टों के अनुसार, इस क्षेत्र की जमीन MIDC ने 1969 में अधिग्रहित की थी और बाद में औद्योगिक प्लॉट लंबी अवधि की लीज पर आवंटित किए गए। KBMC की ओर से औद्योगिक इकाइयों से संपत्ति कर की वसूली पहले से होती रही थी, लेकिन विवाद तब बढ़ा जब नगर परिषद ने औद्योगिक क्षेत्र का सर्वे कर पूंजी मूल्य के आधार पर नए सिरे से कर निर्धारण की प्रक्रिया शुरू की। अगस्त 2014 में पूरे Badlapur MIDC क्षेत्र का सर्वे किया गया। इसके बाद 28 नवंबर 2015 को महाराष्ट्र नगर परिषद, नगर पंचायत और औद्योगिक नगर अधिनियम, 1965 की धाराओं 119 और 124 के तहत विशेष नोटिस जारी किए गए। औद्योगिक इकाइयों ने प्रस्तावित आकलन पर आपत्तियां दर्ज कराईं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि आपत्तियों और सुनवाई के बावजूद मामला प्रभावी ढंग से तय किए बिना टैक्स बिल जारी किए गए और बकाया वसूली के लिए संपत्तियों की कुर्की जैसी कार्रवाई भी शुरू की गई।

उद्यमियों की सबसे बड़ी दलील क्या थी?

उद्योगपतियों का कहना था कि एक ही क्षेत्र में उन्हें दोहरी वित्तीय देनदारी का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ MIDC द्वारा उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं के लिए सेवा शुल्क लिया जा रहा है, दूसरी तरफ KBMC उन्हीं औद्योगिक इकाइयों से संपत्ति कर की मांग कर रहा है। इसी आधार पर Badlapur Industrial Welfare Association ने हाईकोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट के मई 2026 के फैसले ने बदली तस्वीर

बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 27 मई 2026 के महत्वपूर्ण फैसले का भी सहारा लिया गया। यह मामला Small Scale Entrepreneurs Association & Ors. v. State of Maharashtra & Ors. था, जिसका फैसला जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने सुनाया था। केस की रिपोर्टेड सिटेशन 2026 INSC 570 है। सुप्रीम कोर्ट के सामने Trans Thane Creek यानी TTC MIDC क्षेत्र में औद्योगिक इकाइयों से Navi Mumbai Municipal Corporation द्वारा संपत्ति कर वसूलने का सवाल था। सुप्रीम कोर्ट ने Maharashtra Regional and Town Planning Act, 1966 (MRTP Act) की First Schedule की Clause 7(1) की व्याख्या करते हुए कहा कि यह प्रावधान केवल MIDC संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि संबंधित शर्तें पूरी होने पर MIDC क्षेत्र के यूनिट और प्लॉटधारकों तक भी इसका लाभ पहुंचता है।

लेकिन छूट बिना शर्त नहीं है

यहां सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा समझना जरूरी है। अदालत ने यह नहीं कहा कि MIDC क्षेत्र की औद्योगिक इकाइयां हमेशा के लिए संपत्ति कर से मुक्त रहेंगी। छूट उस अवधि तक लागू रहती है जब तक MIDC खुद वे बुनियादी सुविधाएं और amenities उपलब्ध कराता है, जिन्हें सामान्य तौर पर स्थानीय निकाय उपलब्ध कराता है। यदि MIDC और स्थानीय निकाय के बीच किसी समझौते के तहत सड़क, ड्रेनेज, स्ट्रीट लाइट जैसी सुविधाओं की जिम्मेदारी स्थानीय निकाय को सौंप दी जाती है, तो उस स्थिति में संपत्ति कर वसूलने का अधिकार स्थानीय निकाय को मिल सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने TTC MIDC मामले में दिसंबर 2005 में सुविधाएं NMMC को सौंपे जाने के बाद कर छूट समाप्त मानी थी। यानी कानून का मूल सिद्धांत यह है कि MIDC द्वारा सुविधाएं उपलब्ध कराने और उसके लिए सेवा शुल्क लेने की स्थिति में अलग से नगर निकाय का संपत्ति कर लगाने का सवाल अलग तरह से देखा जाएगा; सुविधाओं की जिम्मेदारी नगर निकाय को मिलने पर स्थिति बदल सकती है।

बदलापुर मामले में हाईकोर्ट ने क्या कहा?

इसी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आधार बनाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि KBMC को यह दिखाना होगा कि वह Badlapur MIDC क्षेत्र में ऐसी सुविधाएं और amenities उपलब्ध करा रही है, जिनके आधार पर वह कानून के तहत भुगतान या कर की मांग कर सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि KBMC के लिए MIDC के साथ उचित व्यवस्था/समझौता करना जरूरी होगा। ऐसा कोई वैधानिक arrangement या agreement नहीं होने की स्थिति में औद्योगिक इकाइयों पर सीधे संपत्ति कर की मांग को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

इस आधार पर हाईकोर्ट ने संबंधित संपत्ति कर की मांग को रद्द कर दिया।

क्या नगर परिषद भविष्य में भी टैक्स नहीं ले सकती?

नहीं। यह फैसला नगर परिषद के लिए हमेशा के लिए संपत्ति कर लगाने का रास्ता बंद नहीं करता। हाईकोर्ट ने KBMC को यह संभावना खुली रखी है कि वह MIDC क्षेत्र में उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं का आकलन करे और MIDC के साथ कानून के मुताबिक उचित व्यवस्था या समझौता करे। इसके बाद यदि कानूनन कर लगाने की स्थिति बनती है तो नगर परिषद आगे कार्रवाई कर सकती है। यदि MIDC और KBMC के बीच किसी मुद्दे पर सहमति नहीं बनती है, तो दोनों पक्ष राज्य सरकार से उचित निर्देश मांग सकते हैं।

2019 के आदेश से भी जुड़ा था मामला

यह विवाद केवल संपत्ति कर की मांग तक सीमित नहीं था। Badlapur Industrial Welfare Association ने पहले हाईकोर्ट के 10 अक्टूबर 2019 के आदेश के कथित अनुपालन को लेकर 2026 में अवमानना याचिका भी दायर की थी।  2019 के आदेश में शहरी विकास विभाग के सचिव को पक्षकारों को सुनकर कराधान से जुड़ी एसोसिएशन की शिकायत/प्रतिनिधित्व पर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया था। इसके अनुपालन को लेकर विवाद पैदा हुआ और जनवरी 2026 में अवमानना याचिका दाखिल हुई।

मुख्य याचिका पर हाईकोर्ट के फैसले के बाद अदालत ने अवमानना याचिका का भी निपटारा कर दिया।

उद्योग जगत के लिए फैसला क्यों महत्वपूर्ण?

बदलापुर MIDC में बड़ी संख्या में औद्योगिक इकाइयां लंबे समय से कर और सेवा शुल्क के दोहरे बोझ का मुद्दा उठा रही थीं। रिपोर्टों के मुताबिक कुछ इकाइयों पर भारी बकाया बिल भी आए और भुगतान नहीं होने की स्थिति में वसूली की कार्रवाई का सामना करना पड़ा। इस फैसले से फिलहाल उन औद्योगिक इकाइयों को राहत मिली है जो MIDC को सेवा शुल्क देते हुए KBMC के संपत्ति कर का भी सामना कर रही थीं। हालांकि, इसका असर समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि फैसला स्थानीय निकायों को हर परिस्थिति में संपत्ति कर लगाने से नहीं रोकता। असली सवाल यह रहेगा कि संबंधित MIDC क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं कौन उपलब्ध करा रहा है, उसके लिए कौन शुल्क ले रहा है और MIDC तथा स्थानीय निकाय के बीच कानून के मुताबिक कोई वैध व्यवस्था या हस्तांतरण हुआ है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सीधा असर

सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 को स्पष्ट किया था कि MIDC क्षेत्र में property tax और service charges को एक ही चीज नहीं माना जा सकता। MIDC अपने द्वारा उपलब्ध कराई गई सुविधाओं के लिए service charges ले सकता है, जबकि property tax लगाने की वैधानिक शक्ति स्थानीय निकाय के पास हो सकती है। लेकिन MRTP Act की First Schedule की Clause 7(1) के तहत तब तक कर छूट लागू हो सकती है, जब तक MIDC स्वयं संबंधित municipal amenities उपलब्ध करा रहा हो।

बदलापुर मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत को लागू करते हुए KBMC की मौजूदा कर मांगों को राहत दी है।