law-order

बार काउंसिल अपने ही सदस्यों का भरोसा नहीं जीत पा रही तो यह कानूनी पेशे के लिए अच्छा संकेत नहीं: जस्टिस बीवी नागरत्ना

बार की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की ढाल बताते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने वकीलों और बार काउंसिलों को आईना दिखाया है। उन्होंने दो टूक कहा कि अगर कोई बार काउंसिल अपने ही सदस्यों का सम्मान और भरोसा हासिल नहीं कर पा रही है, तो यह पूरे कानूनी पेशे के लिए अच्छा संकेत नहीं है। NLU दिल्ली के दीक्षांत समारोह में उन्होंने वकीलों से सिर्फ सफल करियर नहीं, बल्कि संविधान, न्याय और अदालतों की गरिमा की रक्षा को भी अपनी जिम्मेदारी मानने की अपील की।

Sonali29 अग. 2026, 04:03 PM IST
खबर शेयर करें:
बार काउंसिल अपने ही सदस्यों का भरोसा नहीं जीत पा रही तो यह कानूनी पेशे के लिए अच्छा संकेत नहीं: जस्टिस बीवी नागरत्ना

नई दिल्ली:

 सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने शनिवार को वकीलों और बार काउंसिल की भूमिका को लेकर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यदि कोई बार काउंसिल अपने ही सदस्यों का सम्मान और भरोसा हासिल नहीं कर पाती है, तो यह पूरे कानूनी पेशे के लिए अच्छा संकेत नहीं है। उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया और राज्य बार काउंसिलों से अपनी भूमिका, जिम्मेदारियों और पेशेवर आचरण को लेकर आत्ममंथन करने की अपील की। जस्टिस नागरत्ना ने यह बात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के 13वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि भारत में ‘बार’ की स्वतंत्रता संवैधानिक लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है और वकीलों को इसकी रक्षा करनी चाहिए।

‘बार काउंसिल को अपने सदस्यों का सम्मान हासिल करना होगा’

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि बार को यह दोबारा सोचने की जरूरत है कि वह मुकदमों का सामना कर रहे लोगों के लिए कितनी उपयोगी है, लोकतंत्र की रक्षा में उसकी क्या भूमिका है और न्याय, कानून के शासन तथा अदालतों की गरिमा बनाए रखने में उसका योगदान कितना महत्वपूर्ण है। उन्होंने बार काउंसिलों से पेशेवर नैतिकता, सदाचार और पेशेवर दक्षता को मजबूत करने के लिए आत्ममंथन करने को कहा। उनका संदेश स्पष्ट था—जब किसी बार काउंसिल को उसके अपने सदस्य सम्मान की नजर से नहीं देखते, तो यह कानूनी पेशे के लिए चिंता का विषय है।

वकीलों की स्वतंत्रता सिर्फ उनका अधिकार नहीं

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि बार की स्वतंत्रता वकीलों को निजी लाभ के लिए दिया गया कोई विशेष अधिकार नहीं है। इसकी जरूरत इसलिए है क्योंकि संवैधानिक लोकतंत्र में ऐसे स्वतंत्र पेशेवरों की आवश्यकता होती है जो बिना राज्य, बाजार या यहां तक कि अपने क्लाइंट के दबाव के डर के कानून की व्याख्या कर सकें, सवाल उठा सकें, अदालत में बहस कर सकें और लोगों का प्रतिनिधित्व कर सकें। उन्होंने वकीलों को लोकतंत्र का ‘सेफ्टी वाल्व’ बताते हुए कहा कि सफल करियर बनाने की कोशिश में उन्हें उस मूल उद्देश्य को नहीं भूलना चाहिए जिसके कारण इस पेशे की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है।

‘वकील सिर्फ क्लाइंट के लिए काम नहीं करता’

जस्टिस नागरत्ना ने युवा वकीलों को संबोधित करते हुए कहा कि वकील की जिम्मेदारी केवल अपने क्लाइंट के निर्देशों तक सीमित नहीं होती। कई बार ऐसी स्थिति आ सकती है जब वकील को अपने क्लाइंट से कहना पड़े कि उसका प्रस्तावित कदम कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है या वह स्वयं क्लाइंट के हित और कानून के शासन के खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि वकील अपने क्लाइंट के लिए काम जरूर करता है, लेकिन वह ऐसी न्यायिक संस्थाओं के भीतर काम करता है जो व्यापक रूप से जनता की संस्थाएं हैं। इसलिए उसकी जिम्मेदारी दो दिशाओं में होती है—एक अपने क्लाइंट के प्रति और दूसरी उस संस्था के प्रति जिसमें वह न्याय के लिए काम कर रहा है।

लंबित मुकदमे, देरी और बढ़ती लागत पर भी चिंता

जस्टिस नागरत्ना ने भारत की न्याय व्यवस्था के सामने मौजूद लंबित मामलों, मुकदमों में देरी, बढ़ती लागत और अनिश्चितता की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि बार को एकजुट होकर यह विचार करना चाहिए कि न्याय वितरण की व्यवस्था को कैसे मजबूत और टिकाऊ बनाया जा सकता है। उन्होंने कानूनी पेशे के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन और संविधान निर्माण में वकीलों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए आज के वकीलों पर भी लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत रखने की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि देश के वकील संविधान के मूल्यों के ‘टॉर्च बियरर’ हैं और बार की किसी भी चूक का प्रभाव देश के राजनीतिक और नागरिक जीवन पर पड़ सकता है।

NALSAR विवाद के बीच टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण?

जस्टिस नागरत्ना की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को लेकर हाल ही में कानूनी समुदाय में विवाद सामने आया है। 13 अगस्त को NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के 2026 बैच के छात्रों को लेकर BCI की ओर से ऐसा निर्देश जारी हुआ था, जिसमें उनके स्टेट बार काउंसिलों में नामांकन पर रोक लगाने और विश्वविद्यालय से रिपोर्ट मांगने की बात सामने आई। कुछ ही घंटों के भीतर इस फैसले को वापस ले लिया गया। बाद में BCI ने 13 अगस्त को ही कहा कि छात्रों के खिलाफ कार्यवाही बंद कर दी गई है। इस घटनाक्रम के बाद NALSAR के छात्रों ने BCI चेयरमैन से माफी की मांग की।  रिपोर्ट के अनुसार, छात्र संगठन ने BCI चेयरमैन की कार्रवाई को उनके पद और संवैधानिक जिम्मेदारियों के अनुरूप नहीं बताया था। 15 अगस्त को मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों को एक पत्र में माफी मांगते हुए कहा कि यदि विवाद से जुड़े उनके किसी शब्द या पत्र से छात्रों की भावनाएं आहत हुई हैं तो उन्हें इसका खेद है।

BCI के भीतर भी उठे सवाल

Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, NALSAR मामले में BCI के 19 पदाधिकारियों में से कम से कम चार ने आदेश जारी होने के बाद आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट में कुछ पदाधिकारियों के हवाले से कहा गया कि फैसला सभी पदाधिकारियों से परामर्श किए बिना लिया गया था। वहीं Bombay Bar Association ने भी बाद में इस कार्रवाई की आलोचना की और इसे BCI चेयरपर्सन के पद का ‘दुरुपयोग’ बताया। संगठन ने कहा कि बड़ी संख्या में छात्रों की बात सुने बिना उनके खिलाफ कार्रवाई की गई। हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि जस्टिस नागरत्ना ने अपने NLU दिल्ली भाषण में NALSAR विवाद या BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा का नाम लेकर कोई टिप्पणी नहीं की। उनकी बात बार काउंसिल की व्यापक संस्थागत जिम्मेदारी और कानूनी पेशे की स्वतंत्रता के संदर्भ में थी।

AI के दौर में वकीलों के लिए नई चुनौती

जस्टिस नागरत्ना ने युवा वकीलों को तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बदलते प्रभाव को लेकर भी आगाह किया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में सामान्य कानूनी रिसर्च और ड्राफ्टिंग कहीं तेज हो जाएगी और केवल कानून की जानकारी रखने की अहमियत कम हो सकती है। लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘जजमेंट’ यानी सही कानूनी और व्यावहारिक निर्णय लेने की क्षमता की अहमियत बनी रहेगी। उन्होंने युवा वकीलों से कहा कि उन्हें सिर्फ कानूनी प्रावधान याद करने के बजाय पूरे विवाद को समझना सीखना होगा—क्या मामला मुकदमेबाजी तक जाना चाहिए, क्या बातचीत से समाधान संभव है, क्या समझौता किया जा सकता है और कब आगे बढ़ना है तथा कब रुकना है।

AI से बने फर्जी फैसलों से सावधान रहने की सलाह

जस्टिस नागरत्ना ने अदालतों में पेश होने वाले वकीलों को AI से तैयार किए गए फर्जी या गलत न्यायिक फैसलों पर निर्भर रहने से भी सावधान किया। उन्होंने युवा वकीलों को बातचीत, समझौता तैयार करने और मध्यस्थता की वास्तविक प्रक्रिया को समझने की सलाह दी। उन्होंने Arb-Med-Arb मॉडल का भी उल्लेख किया, जिसमें मध्यस्थता और आर्बिट्रेशन को एक-दूसरे के पूरक तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है।

‘वकील सिर्फ पेशा नहीं, भरोसे की जिम्मेदारी’

जस्टिस नागरत्ना ने कानूनी पेशे को सिर्फ नौकरी, व्यापार या करियर के रूप में देखने के बजाय इसे ‘ऑफिस ऑफ ट्रस्ट’ यानी भरोसे की जिम्मेदारी बताया। उन्होंने NLU दिल्ली से स्नातक होकर निकल रहे छात्रों से कहा कि वे ‘Officers of the Court’ और ‘Stewards of the Constitution’ के रूप में अपनी भूमिका को समझें और अपने ज्ञान तथा विवेक का इस्तेमाल कानून के शासन की सेवा में करें।

क्यों महत्वपूर्ण है यह टिप्पणी?

जस्टिस नागरत्ना का संदेश केवल युवा वकीलों के लिए नहीं बल्कि पूरी बार व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है। एक तरफ न्याय व्यवस्था लंबित मामलों, देरी और बढ़ती लागत जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ बार की संस्थाओं से पेशेवर नैतिकता, स्वतंत्रता और सदस्यों के भरोसे को बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है।

ऐसे समय में जस्टिस नागरत्ना का यह सवाल कि ‘क्या बार काउंसिल अपने ही सदस्यों का सम्मान हासिल कर रही है?’ कानूनी पेशे के भीतर संस्थागत जवाबदेही और आत्ममंथन की जरूरत को सामने रखता है।