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‘शादी के वैदिक मंत्र भूल गया, इसलिए मौत की सजा?’ कलकत्ता हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की दलील ठुकराई, फांसी को उम्रकैद में बदला
शादी के मंडप में लिए गए सात फेरे और पढ़े गए वैदिक मंत्र क्या किसी हत्या के मामले में मौत की सजा का आधार बन सकते हैं? कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस सवाल का जवाब साफ शब्दों में ‘नहीं’ में दिया है। पत्नी की दिनदहाड़े हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को फांसी की सजा सुनाते हुए उसके वैवाहिक वचनों और पत्नी के प्रेम-त्याग को भुलाने तक को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ अपराध मानने की वजह बनाया था। लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि मौत की सजा तय करने के लिए केवल अपराध की भयावहता नहीं, बल्कि आरोपी के सुधार और पुनर्वास की संभावना भी देखना जरूरी है। कोर्ट ने फांसी की सजा को कठोर आजीवन कारावास में बदल दिया।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने पत्नी की हत्या के मामले में मौत की सजा पाए एक व्यक्ति को बड़ी राहत देते हुए फांसी की सजा को कठोर आजीवन कारावास में बदल दिया है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की उस reasoning पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें हिंदू विवाह के दौरान पढ़े जाने वाले वैदिक मंत्रों और पति-पत्नी के बीच प्रेम, स्नेह और त्याग को आधार बनाकर हत्या को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ माना गया था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि मौत की सजा तय करते समय धार्मिक विवाह संस्कारों को आधार नहीं बनाया जा सकता। मामले की सुनवाई कलकत्ता हाईकोर्ट की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच की डिवीजन बेंच—जस्टिस शंपा सरकार और जस्टिस स्मिता दास डे—ने की। फैसला 28 अगस्त 2026 को सुनाया गया। मामला State of West Bengal vs. Sujit Dey Bhowmik था और इसे Death Reference (D.R.) No. 3 of 2025 तथा संबंधित Criminal Appeal (DB) No. 32 of 2025 के साथ सुना गया।
20 जून 2023 को हुआ था वारदात
मामला 20 जून 2023 को दर्ज Maynaguri Police Station Case No. 237/2023 से जुड़ा है। पुलिस केस में IPC की धारा 498A, 307, 326 और 302 के तहत कार्रवाई हुई थी। बाद में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को धारा 302 और 307 के तहत दोषी ठहराया, जबकि धारा 498A और 326 के आरोपों से बरी कर दिया। रिकॉर्ड के मुताबिक, Sujit Dey Bhowmik ने अपनी पत्नी Mitali Dey Bhowmik पर कथित तौर पर कुल्हाड़ी से हमला किया था। पत्नी की मां और दादी ने बीच-बचाव की कोशिश की तो उन्हें भी चोटें आईं। अभियोजन ने प्रत्यक्षदर्शियों, घायल गवाहों, मेडिकल साक्ष्यों और कथित तौर पर बरामद कुल्हाड़ी सहित कई साक्ष्यों पर भरोसा किया।
ट्रायल कोर्ट ने क्यों दी थी फांसी?
Jalpaiguri के Additional Sessions Judge, 3rd Court ने 10 अप्रैल 2025 को conviction और 21 अप्रैल 2025 को sentence सुनाया था। पत्नी की हत्या के लिए IPC की धारा 302 के तहत मौत की सजा और धारा 307 के तहत आजीवन कारावास तथा एक लाख रुपये जुर्माना लगाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने हत्या को बेहद क्रूर, ठंडे दिमाग से किया गया और ‘दemonic’ प्रकृति का अपराध माना। खास तौर पर यह बात कोर्ट के लिए महत्वपूर्ण थी कि हत्या दिनदहाड़े पत्नी के पिता के घर में परिवार के सदस्यों के सामने हुई। लेकिन ट्रायल कोर्ट की reasoning का एक अहम हिस्सा पति-पत्नी के विवाह संस्कार से भी जुड़ा था। कोर्ट ने विवाह के दौरान पढ़े गए वैदिक मंत्रों और पति द्वारा पत्नी के प्रेम, स्नेह, योगदान और त्याग को कथित तौर पर भुला देने को मौत की सजा के पक्ष में विशेष परिस्थिति माना था।
हाईकोर्ट ने कहा—‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ तय करने का यह तरीका सही नहीं
डिवीजन बेंच ने conviction को बरकरार रखा, यानी हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि आरोपी निर्दोष है। कोर्ट ने चार प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही को विश्वसनीय माना और मेडिकल तथा अन्य साक्ष्यों से भी उसे corroboration मिला। इसलिए हत्या के लिए दोषसिद्धि कायम रही। लेकिन सजा के सवाल पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से असहमति जताई। हाईकोर्ट ने कहा कि मौत की सजा देते समय केवल अपराध की गंभीरता और क्रूरता देखना पर्याप्त नहीं है। अदालत को aggravating circumstances यानी अपराध को गंभीर बनाने वाले कारणों के साथ mitigating circumstances यानी आरोपी के पक्ष में मौजूद परिस्थितियों का भी संतुलन करना होता है।
‘वैदिक मंत्र’ मौत की सजा का आधार नहीं बन सकते
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा बताए गए ‘special reasons’ मुख्य रूप से हिंदू विवाह की रस्मों और वैदिक मंत्रों पर आधारित थे। हाईकोर्ट ने इस reasoning को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी को उसके पिता के घर में परिवार के सामने मारना अपने आप में आरोपी के ‘अत्यधिक क्रूर’ या ‘दemonic’ चरित्र को साबित नहीं करता। यानी अदालत के सामने सवाल यह नहीं था कि अपराध कितना भयावह था—बल्कि यह भी देखना था कि क्या इस अपराध के बावजूद आरोपी के सुधार और पुनर्वास की कोई वास्तविक संभावना मौजूद है।
सुबह परिवार ने साथ चाय पी थी, करीब आधे घंटे बाद हुआ हमला
हाईकोर्ट के फैसले में एक महत्वपूर्ण mitigating circumstance सामने आया। रिकॉर्ड के अनुसार घटना से कुछ समय पहले आरोपी, उसकी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों ने साथ में सुबह की चाय पी थी। इसके करीब आधे घंटे बाद झगड़ा हुआ और हमला हुआ। कोर्ट ने इस परिस्थिति को देखते हुए कहा कि घटना पूर्व नियोजित या premeditated होने की संभावना को लेकर भी सवाल पैदा होते हैं। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पति-पत्नी के संबंध अच्छे नहीं थे और हत्या से पहले झगड़ा हुआ था।
आरोपी का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं, जेल में व्यवहार भी संतोषजनक
फांसी को उम्रकैद में बदलने में आरोपी की व्यक्तिगत परिस्थितियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हाईकोर्ट ने पाया कि:
आरोपी का कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था।
जेल/Correctional Home में उसका व्यवहार संतोषजनक था।
Probation Officer ने उसके सुधार की संभावना बताई थी।
वह counselling से गुजर रहा था।
उसकी उम्र करीब 37 वर्ष थी।
उसका एक नाबालिग बेटा है, जिसने अपनी मां को खो दिया।
उसकी वृद्ध मां की जिम्मेदारी भी आरोपी पर थी।
उसकी सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को भी ट्रायल कोर्ट ने पर्याप्त रूप से नहीं देखा था।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर कहा कि हर गंभीर अपराध करने वाला व्यक्ति हमेशा के लिए सुधार से बाहर हो जाए, ऐसा मान लेना उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के ‘Rarest of Rare’ सिद्धांत का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया। इनमें Bachan Singh और Machhi Singh जैसे फैसले शामिल हैं, जिनमें मौत की सजा के लिए ‘rarest of rare’ सिद्धांत विकसित किया गया। कोर्ट ने यह भी Manoj v. State of Madhya Pradesh के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के मामलों में आरोपी और राज्य से उसके reform और rehabilitation की संभावना से जुड़ी जानकारी जुटाने की जरूरत पर जोर दिया था। हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत के आधार पर कहा कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी की prison conduct, psychological condition और rehabilitation की संभावना का पर्याप्त आकलन किए बिना मौत की सजा दे दी थी।
‘Life imprisonment rule, death penalty exception’
कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराया कि कठोर आजीवन कारावास सामान्य नियम है, जबकि मौत की सजा अपवाद है। कोर्ट ने कहा कि death penalty तभी उचित है जब life imprisonment अपराध की परिस्थितियों को देखते हुए पूरी तरह अपर्याप्त दिखाई दे और आरोपी के पक्ष में मौजूद mitigating circumstances को अधिकतम महत्व देने के बाद भी मौत की सजा ही एकमात्र विकल्प बचे।
दोषसिद्धि बरकरार, सिर्फ सजा बदली
इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने Sujit Dey Bhowmik को हत्या का दोषी मानने वाले ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष को नहीं बदला। यानी हाईकोर्ट ने हत्या के आरोप से बरी नहीं किया। बदलाव केवल sentence में हुआ। ट्रायल कोर्ट की death penalty को हटाकर उसे rigorous imprisonment for life में बदल दिया गया। पहले से जेल में बिताई गई अवधि को कानून के अनुसार सजा में set-off करने का निर्देश भी दिया गया।
कोर्ट का संदेश क्या है?
यह फैसला केवल एक व्यक्ति की फांसी को उम्रकैद में बदलने तक सीमित नहीं है। इसका बड़ा कानूनी संदेश यह है कि death penalty तय करते समय अदालत को भावनात्मक या नैतिक मूल्यांकन के बजाय स्थापित sentencing principles का पालन करना होगा। विवाह के धार्मिक संस्कार, पति-पत्नी के बीच कथित प्रेम या वैवाहिक वचन जैसे पहलू किसी अपराध की सामाजिक गंभीरता को समझने में संदर्भ दे सकते हैं, लेकिन वे अपने आप में किसी व्यक्ति को ‘rarest of rare’ अपराधी घोषित करने और मौत की सजा देने का कानूनी आधार नहीं बन सकते। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध जितना भी गंभीर हो, sentencing court को offender की reform और rehabilitation की संभावना पर विचार किए बिना मौत की सजा नहीं देनी चाहिए।
