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8 साल की सजा के बाद सुकेश चंद्रशेखर की नई कानूनी चाल! दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा, फैसले से ‘अपमानजनक’ टिप्पणियां हटाने की मांग
सुप्रीम कोर्ट के जज बनकर न्यायिक अधिकारी पर जमानत देने का दबाव बनाने के मामले में 8 साल की सजा पाने वाले सुकेश चंद्रशेखर ने अब दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। सुकेश की मांग सजा कम कराने की नहीं, बल्कि उस फैसले में लिखी गई ‘अपमानजनक’ टिप्पणियों को हटाने की है, जिनमें ट्रायल कोर्ट ने उसके कथित कृत्य को न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ ‘संस्थागत अवज्ञा’ तक बताया था। अब हाईकोर्ट 3 नवंबर को पहले यह तय करेगा कि सजा के बाद Article 226 के तहत ऐसी याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं।

नई दिल्ली:
कथित ठग सुकेश चंद्रशेखर एक बार फिर अदालत की चौखट पर है। सुप्रीम कोर्ट के जज का रूप धारण कर एक न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने और अपने पक्ष में जमानत हासिल करने की कोशिश के मामले में 8 साल की कठोर कैद की सजा पाने के बाद अब सुकेश ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। इस बार उसकी शिकायत सजा को लेकर नहीं, बल्कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में उसके खिलाफ की गई कथित “अपमानजनक” टिप्पणियों को लेकर है। सुकेश ने मांग की है कि फैसले से इन टिप्पणियों को हटाया जाए। दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस मधु जैन ने मामले को 3 नवंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। फिलहाल अदालत ने टिप्पणियों की मेरिट पर कोई फैसला नहीं दिया है। सबसे पहले यह तय होगा कि दोषसिद्धि और सजा के बाद सुकेश Article 226 के तहत ऐसी याचिका दायर कर सकता है या नहीं।
राज्य ने याचिका की maintainability पर उठाया सवाल
राज्य सरकार ने सुकेश की याचिका की maintainability पर आपत्ति जताई है। राज्य का कहना है कि जब ट्रायल कोर्ट पहले ही उसे दोषी ठहरा चुका है और सजा भी सुना चुका है, तब वह Article 226 के तहत हाईकोर्ट के रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करके फैसले की टिप्पणियों को चुनौती नहीं दे सकता। सुकेश की ओर से दूसरी तरफ दलील दी गई कि उसके खिलाफ कई अन्य आपराधिक मामले अभी लंबित हैं और ट्रायल कोर्ट के फैसले में की गई प्रतिकूल टिप्पणियां उन मामलों में उसके खिलाफ पूर्वाग्रह पैदा कर सकती हैं। इसलिए वह इन टिप्पणियों को हटाने की मांग कर रहा है। हाईकोर्ट ने फिलहाल इस विवाद के गुण-दोष पर विचार नहीं किया है। 3 नवंबर को सबसे पहले इसी प्रारंभिक कानूनी सवाल पर बहस होगी।
आखिर सुकेश पर किस तरह का आरोप था?
यह मामला अप्रैल 2017 की घटना से जुड़ा है। आरोप है कि उस समय पुलिस हिरासत में मौजूद सुकेश ने एक पुलिस कांस्टेबल के मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया और दिल्ली की स्पेशल जज पूनम चौधरी से संपर्क किया। आरोप के अनुसार, पहले कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को सुप्रीम कोर्ट के एक जज का निजी सचिव बताया और बाद में खुद को वही जज बताते हुए न्यायिक अधिकारी पर सुकेश को जमानत देने का दबाव बनाया। कथित तौर पर फोन के जरिए ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की गई कि यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट के स्तर से आया है। मामले में आरोप था कि सुकेश ने न्यायिक प्रक्रिया को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज की पहचान और पद की प्रतिष्ठा का इस्तेमाल किया।
ट्रायल कोर्ट ने क्यों की इतनी कड़ी टिप्पणी?
ट्रायल कोर्ट ने सुकेश के आचरण को बेहद गंभीर माना। अदालत ने कहा कि सामान्य ठगी और किसी संवैधानिक न्यायिक पदाधिकारी की पहचान का इस्तेमाल करने में बड़ा अंतर है। फैसले में अदालत ने टिप्पणी की कि दुनिया में कई ऐसे ठग रहे हैं जिन्होंने कारोबारियों, कंपनियों, निवेशकों और आम लोगों को धोखा दिया है, लेकिन न्यायिक कार्यवाही की दिशा बदलने के इरादे से की गई इस तरह की धोखाधड़ी कहीं ज्यादा गंभीर है। अदालत ने आगे कहा कि सुकेश लंबे समय से caller ID spoofing, केंद्रीय मंत्रियों का रूप धारण करने और प्रभावशाली लोगों को यह विश्वास दिलाने जैसी गतिविधियों में शामिल रहा और उसे शायद यह विश्वास हो गया था कि बहुत बड़े आत्मविश्वास के साथ बोला गया झूठ कानून के शासन को भी झुका सकता है। ट्रायल कोर्ट के मुताबिक, किसी नौकरशाह या राजनीतिक बिचौलिए का रूप धारण करना एक तरह का transactional crime हो सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज या उनके सचिव का रूप धारण करना “institutional defiance” है।
सुकेश को मिली 8 साल की कठोर कैद
इस मामले में दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने सुकेश को IPC की धारा 170, 189 और 507 के तहत दोषी ठहराया। बाद में अदालत ने उसे कुल 8 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई। धारा 170 के तहत सरकारी कर्मचारी का रूप धारण करने, धारा 189 के तहत लोक सेवक को नुकसान पहुंचाने की धमकी देने और धारा 507 के तहत गुमनाम संचार के जरिए आपराधिक धमकी देने से संबंधित आरोप साबित माने गए। अदालत ने अलग-अलग धाराओं में दी गई सजाओं को लगातार चलाने का आदेश दिया, जिससे कुल सजा 8 साल हुई। साथ ही जुर्माना भी लगाया गया और हिरासत में बिताई गई अवधि का लाभ देने का निर्देश दिया गया।
2017 में कैसे खुला था कथित फर्जीवाड़ा?
इस मामले का सबसे अहम पहलू यह था कि जिस न्यायिक अधिकारी को फोन किया गया था, उन्होंने कथित कॉल की सत्यता जांचने का फैसला किया। स्पेशल जज पूनम चौधरी ने संबंधित सुप्रीम कोर्ट जज के वास्तविक कार्यालय से संपर्क किया। वहां पता चला कि उस कार्यालय से ऐसा कोई फोन नहीं किया गया था और जिस व्यक्ति को कथित तौर पर निजी सचिव बताया गया था, वह उस जज के कार्यालय में काम ही नहीं करता था। इसके बाद शिकायत दर्ज हुई और जांच आगे बढ़ी। इसी जांच ने कथित impersonation और न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने की कोशिश का मामला सामने लाया।
गृह मंत्रालय और Collegium का भी कथित तौर पर लिया गया नाम
मामले से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, कथित कॉलर ने खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बताते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट Collegium का हवाला भी दिया था। जमानत देने के लिए कथित तौर पर न्यायिक अधिकारी पर दबाव बनाया गया और ऐसा न करने पर पेशेवर नुकसान की चेतावनी दी गई। यही वजह है कि अभियोजन और ट्रायल कोर्ट ने इसे सिर्फ एक फोन कॉल या सामान्य impersonation नहीं माना, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास माना।
121 पेज के फैसले में साक्ष्यों पर विस्तार से चर्चा
ट्रायल कोर्ट का 20 अगस्त 2026 का फैसला 121 पेज का बताया गया है। इसमें अदालत ने गवाहों, फोन कॉल से जुड़े साक्ष्यों और अन्य परिस्थितिजन्य तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को एक साथ देखते हुए अभियोजन के मामले पर विचार किया। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन ने संबंधित आरोपों को संदेह से परे साबित किया।
AI, Voice Cloning और Fake Calls का भी कोर्ट ने किया जिक्र
सजा सुनाते समय अदालत ने आधुनिक तकनीक के दुरुपयोग को भी गंभीरता से देखा। आज AI-generated audio, voice cloning, deepfake और spoofed communication जैसी तकनीकों के जरिए किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान और आवाज का इस्तेमाल करना आसान होता जा रहा है।
ऐसे माहौल में अदालत ने माना कि इस तरह के अपराधों पर प्रभावी deterrent message देना जरूरी है, खासकर तब जब कथित impersonation का इस्तेमाल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किया गया हो।
अब 3 नवंबर को क्या होगा?
सुकेश की मौजूदा याचिका में अभी उसकी दोषसिद्धि को चुनौती देने का मुख्य सवाल नहीं है। वह ट्रायल कोर्ट के फैसले में इस्तेमाल किए गए कुछ कथित “derogatory” remarks हटाने की मांग कर रहा है। लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट पहले यह देखेगा कि दोषसिद्धि और सजा के बाद Article 226 के तहत ऐसी याचिका maintainable है या नहीं।
अगर हाईकोर्ट याचिका को सुनवाई योग्य मानता है, तभी आगे इन टिप्पणियों को हटाने की सुकेश की मांग के merits पर सुनवाई का रास्ता खुलेगा। फिलहाल अगली महत्वपूर्ण तारीख 3 नवंबर है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां आरोप केवल किसी व्यक्ति की पहचान की नकल करने तक सीमित नहीं रहे। ट्रायल कोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जज और उनके सचिव की पहचान का इस्तेमाल करके एक न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करने की कोशिश की गई। यानी कथित तौर पर जिस संस्था के आदेश के सामने पूरा देश कानून के तहत चलता है, उसी संस्था की पहचान और प्रतिष्ठा को अपने निजी कानूनी फायदे के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की गई। यही वह पहलू है जिसने अदालत को सामान्य धोखाधड़ी से अलग इस मामले को ज्यादा गंभीर मानने के लिए प्रेरित किया। देश में फर्जी जज, फर्जी कोर्ट, नकली न्यायिक अधिकारी और spoofed calls से जुड़े मामले सामने आने के बीच सुकेश का यह मामला न्यायिक संस्थाओं की पहचान और विश्वसनीयता के दुरुपयोग का एक अहम उदाहरण बन गया है।
