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तलाक के बाद पासपोर्ट से पूर्व पति/पत्नी का नाम हटाने के लिए Divorce Decree जरूरी नहीं: केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

तलाक के बाद जिंदगी से रिश्ता खत्म हो गया, लेकिन पासपोर्ट पर पूर्व पति या पत्नी का नाम अब भी दर्ज है? इसे हटाने के लिए हर बार अदालत की Divorce Decree लेकर दौड़ना जरूरी नहीं है। केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि जब Passport Rules में ऐसी अनिवार्यता नहीं है, तो सिर्फ Office Memorandum के जरिए तलाक की डिक्री को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट की यह टिप्पणी न सिर्फ तलाकशुदा लोगों के लिए राहत देने वाली है, बल्कि यह भी स्पष्ट करती है कि प्रशासनिक निर्देश कानून से ऊपर नहीं हो सकते।

Sonali31 अग. 2026, 04:58 PM IST
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तलाक के बाद पासपोर्ट से पूर्व पति/पत्नी का नाम हटाने के लिए Divorce Decree जरूरी नहीं: केरल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली/कोच्चि: 

तलाक के बाद पासपोर्ट में दर्ज पूर्व पति या पत्नी का नाम हटाने के लिए अब हर मामले में अदालत की Divorce Decree पेश करना जरूरी नहीं है। केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पासपोर्ट नियमों में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है, तो केवल मंत्रालय के Office Memorandum के आधार पर आवेदक से तलाक की डिक्री नहीं मांगी जा सकती। जस्टिस मुरली पुरुषोत्तमन ने कहा कि कार्यपालिका के निर्देश या Office Memorandum उन वैधानिक नियमों को बदल, संशोधित या उनके ऊपर नहीं हो सकते। अदालत ने Regional Passport Officer को निर्देश दिया कि पूर्व पति का नाम हटाने के लिए दाखिल पासपोर्ट reissue आवेदन को Divorce Decree पर जोर दिए बिना कानून के अनुसार प्रोसेस किया जाए और एक महीने के भीतर उचित आदेश पारित किया जाए।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला Ayshath Bunayath और एक अन्य की ओर से दायर WP(C) No. 7780/2026 से जुड़ा था। याचिकाकर्ता महिला के पासपोर्ट में उनके पूर्व पति का नाम spouse के रूप में दर्ज था। दोनों का विवाह 31 अगस्त 2015 को हुआ था, लेकिन बाद में संबंध खराब हो गए और दोनों अलग रहने लगे। इसके बाद दोनों ने Mutual Divorce के लिए ‘Mubaraat Naama’ निष्पादित किया। 9 जुलाई 2025 को हुए इस समझौते के जरिए मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विवाह समाप्त किया गया। महिला ने पासपोर्ट दोबारा जारी कराने के लिए आवेदन किया और उसमें पूर्व पति का नाम तथा उनसे जुड़ा surname हटाने का अनुरोध किया। पूर्व पति ने भी नाम हटाने पर अपनी सहमति का affidavit दिया। लेकिन Passport Authority ने आवेदन रोक दिया और कहा कि spouse का नाम हटाने के लिए competent court की Divorce Decree पेश करनी होगी।

Passport Authority ने किस आधार पर डिक्री मांगी?

Passport Authority ने Ministry of External Affairs के 6 सितंबर 2024 के Office Memorandum का हवाला दिया था। इस Memorandum में spouse का नाम हटाने के लिए “Divorce order/decree” को documentary proof के रूप में निर्धारित किया गया था। केंद्र की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि Passport Authorities इन निर्देशों से बंधी हैं और वे Mubaraat Naama, mutual affidavit या अन्य दस्तावेजों को Divorce Decree के विकल्प के तौर पर स्वीकार नहीं कर सकतीं।

हाईकोर्ट ने क्यों नहीं मानी यह दलील?

केरल हाईकोर्ट ने Passport Rules, 1980 के Schedule III और Passport Information Booklet के प्रावधानों की जांच की। अदालत ने पाया कि संबंधित statutory rules में तलाक के बाद existing passport से spouse का नाम हटाने के लिए court-issued Divorce Decree जमा करने की अनिवार्यता नहीं है। कोर्ट ने साफ किया कि जब संसद द्वारा बनाए गए कानून और उसके तहत बनाए गए Rules ऐसी शर्त नहीं लगाते, तब एक executive Office Memorandum के जरिए अतिरिक्त अनिवार्यता नहीं थोपी जा सकती। यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत है—Executive instruction किसी statutory rule को override नहीं कर सकता।

मुस्लिम पर्सनल लॉ में ‘Mubaraat’ को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणी

मामले में तलाक ‘Mubaraat’ के जरिए हुआ था। यह मुस्लिम पर्सनल लॉ में आपसी सहमति से विवाह समाप्त करने का एक मान्य तरीका है। हाईकोर्ट ने अपने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि Mubaraat आपसी सहमति से पूर्ण हो सकता है और इसके लिए हर स्थिति में judicial confirmation आवश्यक नहीं है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि Family Court की declaration का उद्देश्य ऐसे extra-judicial divorce का public record तैयार करना हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर मामले में divorce की validity के लिए judicial decree अनिवार्य हो जाए।

कोर्ट का अंतिम आदेश क्या है?

केरल हाईकोर्ट ने Regional Passport Officer को निर्देश दिया कि महिला के passport reissue application को पूर्व पति का नाम हटाने के लिए Divorce Decree पेश करने की शर्त लगाए बिना प्रोसेस किया जाए। अदालत ने संबंधित अधिकारी को copy of judgment प्राप्त होने के बाद अधिकतम एक महीने के भीतर आवेदन पर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया।

यह पहली बार नहीं जब केरल हाईकोर्ट ने ऐसा रुख अपनाया

इस फैसले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि केरल हाईकोर्ट पहले भी इसी तरह के मामलों में Passport Rules और executive instructions के बीच टकराव पर टिप्पणी कर चुका है। मार्च 2026 में Justice Murali Purushothaman की ही अदालत ने एक अन्य मामले में पूर्व spouse का नाम passport से हटाने के मामले में कहा था कि यदि statutory rules किसी दस्तावेज की मांग नहीं करते, तो केवल administrative guidelines के आधार पर ऐसी शर्त नहीं लगाई जा सकती। इससे पहले Justice Amit Rawal की पीठ ने भी कहा था कि Passport Rules, 1980 के तहत spouse का नाम बदलने या हटाने के लिए marriage या dissolution of marriage का proof अनिवार्य नहीं है और Rules के विपरीत Compendium of Instructions को आधार बनाकर आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता।

हाल का एक और महत्वपूर्ण मामला

जुलाई 2026 में केरल हाईकोर्ट के सामने एक अलग स्थिति आई, जिसमें Dubai के Personal Status Court से प्राप्त divorce decree के आधार पर पूर्व पति का नाम passport से हटाने की मांग की गई थी। उस मामले में Passport Authority ने विदेशी divorce decree को सीधे स्वीकार करने से इनकार किया और Indian Civil Court से declaratory order की आवश्यकता बताई। यह मामला विदेशी अदालत के divorce decree की भारत में recognition से जुड़ा अलग कानूनी प्रश्न था। इसलिए मौजूदा फैसला यह नहीं कहता कि हर विदेशी divorce decree स्वतः भारत में मान्य होगी या हर passport मामले में कोई दस्तावेज कभी नहीं मांगा जा सकता। इसका मुख्य सवाल existing passport से former spouse का नाम हटाने और statutory Passport Rules पर executive instructions की प्राथमिकता से जुड़ा है।

Supreme Court का पुराना सिद्धांत भी महत्वपूर्ण

Passport और matrimonial records से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि passport application में marriage या dissolution of marriage से संबंधित जानकारी के बावजूद हर परिस्थिति में अलग से court decree प्रस्तुत करना अनिवार्य नहीं माना जा सकता। केरल हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में इसी कानूनी दृष्टिकोण और अपने पुराने फैसलों को आधार बनाया।

क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

इस निर्णय का सीधा असर उन तलाकशुदा लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जिन्हें passport में दर्ज पूर्व पति या पत्नी का नाम हटाने के लिए केवल administrative requirement के कारण अतिरिक्त अदालती प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। फैसले का व्यापक संदेश यह है कि Passport Authorities को आवेदन निपटाते समय सबसे पहले यह देखना होगा कि संबंधित requirement statutory Rules में है या केवल departmental/executive instruction में। अगर कानून में किसी दस्तावेज की अनिवार्यता नहीं है, तो केवल Office Memorandum के जरिए उस दस्तावेज को अनिवार्य बनाना चुनौती के दायरे में आ सकता है।