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PMLA केस में आरोपी को मेडिकल बेल, बॉम्बे हाईकोर्ट बोला- जेल और आजाद नागरिक के इलाज में 'गुणात्मक अंतर'
₹137 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग केस में आरोपी कारोबारी को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के चलते बॉम्बे हाईकोर्ट से मेडिकल बेल मिली। कोर्ट ने कहा—जेल में अंडरट्रायल कैदी और आजाद नागरिक को मिलने वाले इलाज में ‘गुणात्मक अंतर’ होता है।

मुंबई:
₹137 करोड़ के कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी कारोबारी उशिक महेश गाला को बॉम्बे हाईकोर्ट ने मेडिकल बेल दे दी है। कोर्ट ने कहा कि जेल में बंद अंडरट्रायल कैदी को मिलने वाली चिकित्सा सुविधा और बिना किसी प्रतिबंध के रहने वाले एक आम नागरिक को मिलने वाले इलाज में 'गुणात्मक अंतर' होता है। आरोपी की गंभीर स्वास्थ्य स्थिति और लगातार मेडिकल निगरानी की जरूरत को देखते हुए कोर्ट ने उसे मेडिकल बेल देने को उचित माना। यह आदेश जस्टिस मिलिंद एन. जाधव ने 24 अगस्त 2026 को Bail Application No. 1836 of 2026 में पारित किया। गाला ने PMLA मामले में मेडिकल आधार पर जमानत की मांग की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी राहत मुख्य रूप से स्वास्थ्य और पोस्ट-ऑपरेटिव रिहैबिलिटेशन की जरूरत के आधार पर दी जा रही है।
क्या है पूरा मामला?
उशिक महेश गाला को प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने 17 नवंबर 2025 को कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया था। यह मामला पहले से दर्ज आर्थिक अपराधों से जुड़े अनुसूचित अपराधों के आधार पर PMLA के तहत ED की जांच से संबंधित है। इससे पहले गाला को स्वास्थ्य कारणों से मेडिकल बेल भी मिल चुकी थी। दिसंबर 2025 में उन्हें गॉल ब्लैडर की सर्जरी के लिए मेडिकल बेल दी गई थी। इसके बाद मेडिकल स्थिति को देखते हुए राहत की अवधि बढ़ाई गई।
तीन बड़ी सर्जरी से गुजरे आरोपी
कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक गाला को वर्ष 2022 में Bariatric यानी Sleeve Gastrectomy सर्जरी से गुजरना पड़ा था। इसके बाद 7 फरवरी 2026 को गॉल ब्लैडर हटाने की सर्जरी हुई। लगातार स्वास्थ्य समस्याओं और मोटापे के कारण उन्हें पेट में हर्निया की समस्या हुई, जिसके लिए 10 जुलाई 2026 को Hernia Repair Surgery कराई गई।
उनके डॉक्टर ने जुलाई 2026 में उन्हें नवंबर 2026 तक पूर्ण बेड रेस्ट और पोस्ट-ऑपरेटिव रिहैबिलिटेशन की सलाह दी थी। कोर्ट के सामने पेश मेडिकल रिकॉर्ड में उनकी लगातार निगरानी और देखभाल की जरूरत सामने आई।
ED ने मेडिकल बेल का विरोध किया
ED की ओर से दलील दी गई कि आरोपी की स्थिति इतनी गंभीर या जानलेवा नहीं है कि उसे जेल से बाहर इलाज की अनुमति दी जाए। एजेंसी ने कहा कि जेल अस्पताल या सरकारी अस्पताल में भी उसका इलाज और फॉलो-अप किया जा सकता है। ED ने यह भी कहा कि PMLA की धारा 45(1) के तहत जमानत की कड़ी शर्तें लागू होती हैं और आरोपी ने उन शर्तों को पूरा नहीं किया है।
कोर्ट ने क्यों दी मेडिकल बेल?
जस्टिस मिलिंद जाधव ने आरोपी की मेडिकल रिपोर्ट और उसकी लगातार बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए ED की दलील स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने कहा कि गाला को तीन सर्जरी से गुजरना पड़ा है और उसे पोस्ट-ऑपरेटिव रिहैबिलिटेशन के साथ लगातार मेडिकल मॉनिटरिंग की जरूरत है। कोर्ट ने कहा कि अंडरट्रायल कैदी के रूप में जेल बैरक या जेल अस्पताल में मिलने वाले उपचार और बिना किसी प्रतिबंध के रहने वाले नागरिक को मिलने वाली चिकित्सा देखभाल में 'qualitative difference' है। कोर्ट के अनुसार, इस मामले में संक्रमण से बचाव, पर्याप्त देखभाल और संभावित जटिलताओं की निगरानी के लिए बेहतर वातावरण जरूरी है।
PMLA की धारा 45(1) का अपवाद बना आधार
हाईकोर्ट ने PMLA की धारा 45(1) के प्रावधान पर भी भरोसा किया। इस प्रावधान में 'sick or infirm' यानी बीमार या अस्वस्थ व्यक्ति के लिए विशेष अपवाद मौजूद है। कोर्ट ने पूर्व के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि आरोपी इस अपवाद के दायरे में आता है, तो धारा 45 की सामान्य कठोर शर्तों से राहत मिल सकती है।
क्या शर्तें लगाई गईं?
हाईकोर्ट ने गाला को ₹2 लाख के PR Bond और इतनी ही राशि के एक या अधिक जमानतदारों पर रिहा करने का आदेश दिया। उसे देश छोड़ने की अनुमति नहीं होगी और पासपोर्ट जांच अधिकारी के पास जमा करना होगा। उसे जांच में सहयोग करना होगा और गवाहों को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि हर छह महीने में J.J. Hospital में स्वास्थ्य जांच कराई जाएगी। मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर अभियोजन को जरूरत पड़ने पर मेडिकल बेल रद्द कराने के लिए अदालत का रुख करने की स्वतंत्रता रहेगी।
