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परीक्षा में नकल की बड़ी सजा तभी, जब छात्र को सामग्री इस्तेमाल करते पकड़ा जाए: दिल्ली हाईकोर्ट

वॉशरूम में नकल की पर्ची मिलने पर पूरे सेमेस्टर के पेपर रद्द करने की सजा पर दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि बड़ी सजा के लिए सिर्फ नकल की सामग्री मिलना काफी नहीं, छात्र को उसका वास्तव में इस्तेमाल करते हुए पकड़ा जाना भी साबित होना चाहिए।

Sonali01 सित. 2026, 05:11 PM IST
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परीक्षा में नकल की बड़ी सजा तभी, जब छात्र को सामग्री इस्तेमाल करते पकड़ा जाए: दिल्ली हाईकोर्ट

नई दिल्ली:

परीक्षा में नकल के आरोपों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने छात्रों के हित में अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी छात्र पर बड़ी शैक्षणिक सजा लगाने के लिए सिर्फ नकल की सामग्री का मिलना पर्याप्त नहीं है। यह भी साबित होना जरूरी है कि छात्र वास्तव में उस सामग्री का इस्तेमाल नकल करने के लिए कर रहा था। इसी आधार पर कोर्ट ने एक कानून के छात्र के पूरे सेमेस्टर के सभी पेपर रद्द करने की सजा को अनुपातहीन मानते हुए कम कर दिया। जस्टिस जसमीत सिंह ने मामले की सुनवाई करते हुए छात्र को benefit of doubt दिया। कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा पर्याप्त सबूत नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि छात्र को नकल की पर्ची का वास्तव में इस्तेमाल करते हुए पकड़ा गया था।


क्या है पूरा मामला?

मामला दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक कानून के छात्र से जुड़ा है। छात्र भारतीय न्याय संहिता (BNS) के पेपर LB-104 की परीक्षा दे रहा था। परीक्षा के दौरान वह वॉशरूम गया। आरोप लगाया गया कि एक प्रोफेसर उसके पीछे वॉशरूम पहुंचे और वहां छात्र को एक पर्ची की मदद से नकल करते हुए देखा। इसके बाद विश्वविद्यालय ने छात्र के खिलाफ अनुचित साधन यानी Unfair Means का मामला दर्ज किया। शुरुआत में विश्वविद्यालय ने Clause C के तहत छात्र को अगले सेमेस्टर के अंत तक किसी भी परीक्षा में बैठने से डिबार कर दिया था। छात्र ने फैसले के खिलाफ अपील की। Review Committee ने 13 मई 2025 को अपने ईमेल के जरिए सजा को Clause C से बदलकर Clause B कर दिया। इसके तहत छात्र के मौजूदा सेमेस्टर में दिए गए सभी पेपर रद्द कर दिए गए। इसके बाद छात्र ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया।


हाईकोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने विश्वविद्यालय की जांच रिपोर्ट और परीक्षा संबंधी दिशानिर्देशों का अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा स्पष्ट बयान नहीं था, जिससे यह साबित हो कि छात्र वॉशरूम में नकल की सामग्री का इस्तेमाल कर रहा था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय की अनुशासनात्मक कार्रवाई में आपराधिक मुकदमे की तरह संदेह से परे अपराध साबित करना जरूरी नहीं है। यहां संभावनाओं के संतुलन का मानक लागू होता है। हालांकि, इस मामले में उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह भी पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुआ कि छात्र ने नकल की पर्ची का वास्तविक इस्तेमाल किया था।


पूरे सेमेस्टर की सजा को माना अनुपातहीन

जस्टिस जसमीत सिंह ने कहा कि पूरे सेमेस्टर के सभी पेपर रद्द करना गंभीर सजा है और इससे छात्र के अकादमिक करियर पर बड़ा असर पड़ सकता है। इसलिए ऐसी सजा के लिए आरोप के समर्थन में पर्याप्त आधार होना जरूरी है। कोर्ट ने छात्र को benefit of doubt देते हुए सजा को कम कर दिया। अब कार्रवाई कथित अनुचित साधन वाले BNS पेपर तक सीमित रहेगी, जबकि पूरे सेमेस्टर के बाकी पेपर रद्द नहीं होंगे।


फैसले का महत्व

दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि परीक्षा में नकल की सामग्री रखने पर विश्वविद्यालय कार्रवाई नहीं कर सकता। कोर्ट ने केवल यह स्पष्ट किया है कि गंभीर और व्यापक शैक्षणिक सजा देने से पहले यह देखना जरूरी है कि छात्र ने वास्तव में उस सामग्री का इस्तेमाल नकल के लिए किया था या नहीं।