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विवाह का विवाद पहले ही तय हो चुका तो पति दोबारा नहीं उठा सकता मुद्दा, मेंटेनेंस से बचने की कोशिश पर दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
पुराने वैवाहिक विवाद को दोबारा उठाकर पत्नी के भरण-पोषण से बचने की कोशिश पति को भारी पड़ी, दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ कहा—एक बार तय हो चुका विवाह विवाद फिर से नहीं खोला जा सकता।

नई दिल्ली:
पत्नी को भरण-पोषण देने की जिम्मेदारी से बचने के लिए पति पुराने और अंतिम रूप से तय हो चुके वैवाहिक विवाद को दोबारा नहीं उठा सकता। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि जब किसी सक्षम अदालत द्वारा विवाह के अस्तित्व का मुद्दा अंतिम रूप से तय हो चुका है, तो उसी सवाल को नई कार्यवाही में दोबारा चुनौती नहीं दी जा सकती। जस्टिस सौरभ बनर्जी ने पति की ओर से दायर रिवीजन याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। मामला धारा 125 CrPC के तहत पत्नी द्वारा मांगे गए भरण-पोषण से जुड़ा था। कोर्ट ने माना कि महिला कानूनी रूप से पत्नी है और इसलिए वह पति से भरण-पोषण पाने के अधिकार के दायरे में आती है।
क्या है पूरा मामला?
पति-पत्नी ने वर्ष 2002 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की थी। हालांकि, वर्ष 2003 में पति ने एक मुकदमा दायर कर दावा किया कि वह अविवाहित है। उसने अदालत से यह घोषणा करने की मांग की कि महिला उसकी पत्नी नहीं है और महिला को खुद को उसकी पत्नी बताने से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा भी मांगी। शुरुआत में ट्रायल कोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला दिया। इसके बाद पत्नी ने इस फैसले को चुनौती दी। वर्ष 2006 में अपीलीय अदालत ने पत्नी की अपील स्वीकार कर ली और विवाह के पक्ष में फैसला दिया। पति ने इसके बाद दूसरी अपील दायर की, लेकिन वर्ष 2011 में वह भी खारिज हो गई। इस तरह विवाह को लेकर विवाद न्यायिक रूप से अंतिम रूप से तय हो गया। इस बीच पत्नी ने 2008 में धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए कार्यवाही शुरू कर दी थी।
फैमिली कोर्ट ने कितना मेंटेनेंस दिया?
फैमिली कोर्ट ने पति को पत्नी को भरण-पोषण देने का आदेश दिया। कोर्ट ने आवेदन दाखिल किए जाने की तारीख से दिसंबर 2011 तक ₹7,000 प्रति माह, जनवरी 2012 से दिसंबर 2013 तक ₹10,000 प्रति माह और इसके बाद भी ₹10,000 प्रति माह देने का निर्देश दिया। इसके अलावा पति को मुकदमे के खर्च के तौर पर ₹11,000 का भुगतान करने का भी आदेश दिया गया। पति ने इसी आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी।
पति ने फिर उठाया विवाह पर सवाल
हाईकोर्ट में पति ने एक बार फिर दावा किया कि महिला उसकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं है और इसलिए वह धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण की हकदार नहीं है। पति ने यह भी तर्क दिया कि पहले की अपीलीय अदालत का फैसला तकनीकी आधार पर हुआ था और इसलिए उसे मेंटेनेंस मामले में बाध्यकारी नहीं माना जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि विवाह से जुड़ा विवाद पहले ही अंतिम रूप से तय हो चुका है। इसलिए पति अब उसी मुद्दे को किसी दूसरी कार्यवाही में दोबारा उठाकर पहले के फैसले के प्रभाव से बच नहीं सकता।
कोर्ट ने कहा- 'दूसरा मौका' नहीं दिया जा सकता
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि पहले की कार्यवाही का परिणाम अब अंतिम और निर्णायक है। पति को उसी तय मुद्दे को नए सिरे से उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने इस कोशिश को एक ही मुद्दे पर 'another bite at the cherry' यानी दोबारा मौका हासिल करने की कोशिश के तौर पर देखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब विवाह के अस्तित्व का सवाल पहले ही तय हो चुका है और वह फैसला अंतिम हो चुका है, तो पति केवल मेंटेनेंस की कार्यवाही से बचने के लिए उसी विवाद को फिर से नहीं खोल सकता।
पति पर पत्नी की देखभाल की कानूनी जिम्मेदारी हाईकोर्ट ने माना कि महिला याचिकाकर्ता की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है। ऐसे में वह धारा 125 CrPC के दायरे में आती है। कोर्ट ने कहा कि पति पर अपनी पत्नी के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पति की रिवीजन याचिका खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट द्वारा तय किए गए भरण-पोषण के आदेश को बरकरार रखा।
फैसले का महत्व
इस फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराया कि किसी विवाद के अंतिम रूप से तय हो जाने के बाद पक्षकार उसी मुद्दे को बार-बार नई कार्यवाही में चुनौती नहीं दे सकते। खासकर जब विवाह का अस्तित्व पहले ही न्यायिक फैसले से तय हो चुका हो, तो पति उस मुद्दे को दोबारा उठाकर धारा 125 CrPC के तहत अपनी पत्नी को भरण-पोषण देने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
