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सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- बूथवार वोट गिनने की बजाय Totalizer सिस्टम क्यों नहीं? केंद्र और चुनाव आयोग से मांगा जवाब
बूथवार वोटों की गिनती से मिलेगी मुक्ति या बदलेगा चुनावी सिस्टम? EVM वोटों के लिए Totalizer व्यवस्था की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।

नई दिल्ली:
चुनावों में EVM से डाले गए वोटों की बूथवार गिनती के बजाय Totalizer सिस्टम लागू करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। कोर्ट ने पूछा कि आखिर वोटों की सामूहिक गिनती की व्यवस्था लागू करने में क्या बाधा है और इससे कोई नकारात्मक प्रभाव तो नहीं पड़ेगा। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने की। अदालत ने केंद्र से इस प्रस्ताव पर अपना रुख बताने को कहा है। साथ ही चुनाव आयोग को भी अपना प्रस्ताव केंद्र सरकार के सामने रखने का निर्देश दिया गया है।
क्या है Totalizer सिस्टम?
Totalizer एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें अलग-अलग मतदान केंद्रों की EVM को एक-एक करके गिनने के बजाय कई EVM के वोटों को एक साथ मिलाकर गिना जाता है। इसका उद्देश्य किसी खास बूथ पर किस उम्मीदवार को कितने वोट मिले, इसकी सटीक जानकारी तुरंत सार्वजनिक होने से रोकना है। मौजूदा व्यवस्था में प्रत्येक मतदान केंद्र की EVM के वोट अलग-अलग गिने जाते हैं। इससे उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों को यह पता चल सकता है कि किसी विशेष बूथ पर उन्हें कितना समर्थन मिला।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पूछा सवाल?
सुप्रीम कोर्ट के सामने तीन याचिकाएं थीं, जिनमें अन्य मांगों के अलावा यह अनुरोध किया गया था कि चुनाव परिणाम पूरे संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर घोषित किए जाएं और अलग-अलग बूथ की EVM से मिले वोटों का आंकड़ा सार्वजनिक न किया जाए। सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने मौजूदा बूथवार गिनती की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाया। कोर्ट ने यह भी पूछा कि Totalizer व्यवस्था लोकतंत्र के लिए किस तरह फायदेमंद होगी।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू ने बताया कि आयोग पहले Totalizer के फायदे और व्यावहारिक कठिनाइयों दोनों को सरकार के सामने रख चुका है। उनके अनुसार, सरकार की ओर से गठित एक विशेषज्ञ समिति ने भी इस प्रस्ताव की जांच की थी, लेकिन उसने इसे समर्थन नहीं दिया। एक Group of Ministers ने भी प्रस्ताव का विरोध किया था। इसके अलावा कई राजनीतिक दलों ने भी Totalizer प्रणाली पर आपत्ति जताई थी।
याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी?
याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अपनी दलील में कहा कि चुनाव आयोग का वर्तमान रुख उसके पुराने रुख से अलग है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 12 जनवरी 2018 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि आयोग कई वर्षों तक Totalizer व्यवस्था का समर्थन करता रहा है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, अगर कई EVM के वोटों को एक साथ जोड़कर परिणाम घोषित किया जाए तो किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार को किसी विशेष बूथ के मतदान पैटर्न की सटीक जानकारी नहीं मिलेगी।
बूथवार वोटिंग पैटर्न छिपाने से क्या फायदा?
याचिकाकर्ता का तर्क है कि बूथवार वोटिंग पैटर्न सामने आने से राजनीतिक दलों को यह पता चल सकता है कि किस इलाके या बूथ ने उन्हें समर्थन नहीं दिया। उनका दावा है कि ऐसी जानकारी चुनाव के बाद राजनीतिक तनाव या हिंसा का कारण बन सकती है। Totalizer व्यवस्था में अलग-अलग EVM के वोटों को मिलाकर परिणाम तैयार होने से इस तरह की सटीक बूथ-स्तरीय जानकारी सामने नहीं आएगी।
1961 के नियम का भी हुआ जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने Conduct of Elections Rules, 1961 के Rule 59A जैसे प्रावधान की संभावना पर भी केंद्र से राय मांगी। Rule 59A कुछ परिस्थितियों में बैलेट पेपर की गिनती के लिए Totalizer के इस्तेमाल की अनुमति देता है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या Law Commission की 255वीं रिपोर्ट में सुझाए गए तरीके के अनुरूप ऐसा प्रावधान EVM वोटों की गिनती में भी शामिल किया जा सकता है। चूंकि Conduct of Elections Rules में बदलाव करने की शक्ति केंद्र सरकार के पास है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से उसका पक्ष स्पष्ट करने को कहा है।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने Totalizer सिस्टम लागू करने का कोई आदेश नहीं दिया है। अदालत ने केवल केंद्र सरकार से इस प्रस्ताव पर अपनी स्थिति बताने और चुनाव आयोग से प्रस्ताव प्रस्तुत करने को कहा है। अब अगली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि केंद्र और चुनाव आयोग Totalizer व्यवस्था को लेकर क्या रुख अपनाते हैं और इसके लागू होने में कानूनी या व्यावहारिक बाधाएं क्या हैं।
