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CBI की जांच पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार, पूर्व Indian Bank मैनेजर लोन फ्रॉड केस में बरी

बैंक लोन फ्रॉड के 35 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट ने CBI की जांच पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए। अदालत ने पूर्व Indian Bank मैनेजर को बरी करते हुए कहा कि CBI न तो आरोप साबित कर पाई और न ही केस को सही तरीके से पेश कर सकी।

Sonali02 सित. 2026, 03:28 PM IST
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CBI की जांच पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार, पूर्व Indian Bank मैनेजर लोन फ्रॉड केस में बरी


नई दिल्ली: 

करीब 35 साल पुराने लोन फ्रॉड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व Indian Bank Branch Manager वी. बालकृष्णन को बड़ी राहत दी है। 1 सितंबर 2026 को जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने उनकी दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए उन्हें आरोपों से “क्लीन एक्विटल” दे दिया। कोर्ट ने CBI की जांच और अभियोजन की कहानी पर बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि CBI अपना मामला साबित करने के साथ-साथ उसे सही तरीके से फ्रेम करने में भी “बुरी तरह विफल” रही। कोर्ट ने अभियोजन की कहानी को “fabricated” यानी मनगढ़ंत बताया और कहा कि इसका कोई ठोस आधार नहीं है।


क्या था पूरा मामला?

यह मामला वर्ष 1991-92 का है। उस समय वी. बालकृष्णन चेन्नई की Anna Nagar Branch में Indian Bank के Branch Manager थे। CBI ने आरोप लगाया था कि उन्होंने Indian Overseas Bank के एक सेवानिवृत्त अधिकारी पी. कुमारदेवन के साथ मिलीभगत करके A4 और A5 के नाम पर लोन मंजूर किए, जबकि कथित तौर पर इन पैसों का इस्तेमाल कुमारदेवन ने किया था। CBI के अनुसार, A4 के नाम 13.50 लाख रुपये का लोन और A5 के नाम 10 लाख रुपये का लोन मंजूर किया गया था। आरोप यह भी था कि लोन के लिए गिरवी रखी गई संपत्तियों का मूल्य वास्तविक कीमत से अधिक दिखाया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि इन लोन की मंजूरी में Indian Bank के Regional Office की भी भूमिका थी।


सुप्रीम कोर्ट ने CBI के सबूतों में क्या खामी पाई?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन ने जिन चेकों के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की कि लोन की रकम कुमारदेवन को मिली थी, उन पर मौजूद हस्ताक्षर की पहचान ही ठीक से साबित नहीं की गई। ऐसे दस्तावेज भी पेश नहीं किए गए, जिनसे कथित हस्ताक्षर की तुलना की जा सके। कुमारदेवन के साथ काम कर चुके गवाहों से भी उन हस्ताक्षरों की पहचान कराने के लिए उचित सवाल नहीं पूछे गए। कोर्ट ने यह भी पाया कि संपत्तियों के कथित overvaluation को साबित करने के लिए 1991-92 के समय की वास्तविक बाजार कीमत से संबंधित पर्याप्त दस्तावेज पेश नहीं किए गए। केवल 2010 में हुई नीलामी की कीमत देखकर यह मान लेना उचित नहीं था कि 20 साल पहले संपत्ति की कीमत कम थी।


नीलामी में बैंक को मिला लोन से कहीं ज्यादा पैसा

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि बैंक ने बाद में गिरवी रखी संपत्तियों की नीलामी की। A5 से संबंधित एक संपत्ति की नीलामी से बैंक को 1.17 करोड़ रुपये मिले, जबकि संबंधित लोन खाते में करीब 16.42 लाख रुपये की राशि समायोजित की गई। इसी तरह A4 से संबंधित संपत्तियों की नीलामी से 2.42 करोड़ रुपये मिले, जबकि लोन खाते में करीब 5.35 लाख रुपये समायोजित किए गए। एक अन्य संपत्ति से 34.50 लाख रुपये मिलने का भी रिकॉर्ड सामने आया। कोर्ट ने पाया कि लोन की बकाया राशि पूरी तरह वसूल होने के बाद भी अतिरिक्त रकम बैंक के पास बनी हुई थी।


अतिरिक्त रकम पर बैंक से रिपोर्ट तलब

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि नीलामी से मिली अतिरिक्त रकम संबंधित कानूनी वारिसों को क्यों नहीं दी गई। अदालत ने Anna Nagar Branch के मौजूदा Branch Manager को रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट में लोन खातों की स्थिति, नीलामी से प्राप्त रकम, लोन की संतुष्टि और अतिरिक्त राशि के इस्तेमाल या बैंक के पास रखे जाने की जानकारी देनी होगी। कोर्ट ने संबंधित गिरवी संपत्तियों के title deeds भी पेश करने को कहा है। इस मुद्दे पर आगे सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 को होगी।

पूर्व मैनेजर को मिली क्लीन एक्विटल सुप्रीम कोर्ट ने Trial Court और High Court के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें बालकृष्णन को दोषी ठहराया गया था। अदालत ने साफ किया कि उन्हें अभियोजन द्वारा लगाए गए आरोपों से “clean acquittal” दिया गया है। अगर वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं और हिरासत में हैं तो उन्हें रिहा करने का निर्देश दिया गया है।