law-order

बड़ा बदलाव संभव: ट्रैफिक चालान भरते ही ‘गुनहगार’ न मान लिया जाए! सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी करेगी V-Courts पोर्टल में बदलाव की मांग पर विचार

ट्रैफिक चालान भरते समय अब आपको अनजाने में खुद को ‘गुनहगार’ घोषित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी! सुप्रीम कोर्ट ने V-Courts पोर्टल पर उठे इस अहम सवाल को ई-कमेटी के पास भेज दिया है। याचिका में मांग है कि चालान कंपाउंड करने के लिए ‘गिल्टी’ कबूल करने की अनिवार्यता खत्म कर अलग विकल्प दिया जाए।

Sonali02 सित. 2026, 03:28 PM IST
खबर शेयर करें:
बड़ा बदलाव संभव: ट्रैफिक चालान भरते ही ‘गुनहगार’ न मान लिया जाए! सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी करेगी V-Courts पोर्टल में बदलाव की मांग पर विचार

ट्रैफिक चालान भरने वाले लाखों लोगों के लिए सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी यह खबर बेहद अहम है। अगर किसी नागरिक को चालान का निपटारा करने के लिए ऑनलाइन प्रक्रिया में ‘गिल्टी’ यानी दोष स्वीकार करने का विकल्प चुनना पड़ता है, तो अब इसमें बदलाव हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को अपनी ई-कमेटी के पास भेजते हुए V-Courts पोर्टल में जरूरी बदलाव पर विचार करने को कहा है।

किसने दायर की याचिका?

यह याचिका प्रभजोत सिंह ढिल्लों ने दाखिल की थी। उनकी ओर से सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के सामने दलीलें रखीं। याचिका में मांग की गई कि V-Courts पोर्टल में ऐसा स्पष्ट और अलग विकल्प उपलब्ध कराया जाए, जिससे कंपाउंडेबल ट्रैफिक अपराध का निपटारा करते समय नागरिक को अनिवार्य रूप से ‘गिल्टी’ की plea न देनी पड़े। मामले का डायरी नंबर 31698-2026 है। 

CJI सूर्यकांत की बेंच ने क्या कहा?

मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की। पीठ ने याचिका में उठाए गए मुद्दे को V-Courts पोर्टल के बेहतर संचालन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना और मामले के कागजात ई-कमेटी को भेजने का निर्देश दिया। ई-कमेटी अब पोर्टल में आवश्यक सुधार की संभावना पर विचार करेगी। 

क्या है याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत?

याचिका में आरोप लगाया गया कि V-Courts पोर्टल का इंटरफेस कई जगह ऐसा है, जिससे नागरिकों को यह स्पष्ट नहीं होता कि जुर्माना भरना और अपराध स्वीकार करना अलग-अलग कानूनी चीजें हो सकती हैं। याचिकाकर्ता ने इसे ‘dark patterns’ और confusing interface बताया। दलील दी गई कि कुछ मामलों में नागरिक चालान का ऑनलाइन निपटारा करने के दौरान अनजाने में ‘गिल्टी’ की plea दर्ज कर देते हैं और इसका परिणाम conviction के रूप में सामने आ सकता है। याचिका के अनुसार, नागरिक को इसके कानूनी परिणामों की पर्याप्त जानकारी या स्पष्ट सहमति के बिना ऐसी प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहिए। 

आखिर कंपाउंडिंग क्या होती है?

कंपाउंडिंग का सामान्य अर्थ है कि कानून में अनुमति होने पर निर्धारित राशि या प्रक्रिया के जरिए अपराध का निपटारा किया जाता है। V-Courts व्यवस्था का उद्देश्य ही छोटे मामलों, खासकर ट्रैफिक चालानों, को ऑनलाइन तरीके से जल्दी और नागरिकों के लिए आसान बनाना है। ई-कमेटी की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक Virtual Courts में Motor Vehicle Act से जुड़े ट्रैफिक चालान मामलों को भी शामिल किया गया है।

Benetton India मामले का भी दिया गया हवाला

याचिका में दिल्ली हाईकोर्ट के Benetton India Pvt. Ltd. v. State of NCT of Delhi मामले का भी उल्लेख किया गया। याचिकाकर्ता ने मांग की कि उस मामले में V-Courts पोर्टल को लेकर की गई सिफारिशों पर भी अमल किया जाए। इनमें जुर्माना भरकर कंपाउंडिंग का विकल्प उपलब्ध कराने और केवल भुगतान को conviction के रिकॉर्ड के रूप में दर्ज न करने जैसी मांगें शामिल थीं। 

सिर्फ पोर्टल बदलाव ही नहीं, ये मांगें भी

याचिका में ट्रैफिक व्यवस्था से जुड़ी कुछ अन्य मांगें भी की गई हैं। इनमें पुलिस स्टेशनों पर तय दिनों और समय में ACP या अधिकृत अधिकारी की मौजूदगी की मांग शामिल है, ताकि ट्रैफिक संबंधी शिकायतों का समाधान हो सके। इसके अलावा दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के लिए ऐसा भरोसेमंद और सत्यापन योग्य सिस्टम बनाने की मांग भी की गई है, जिससे वाहन मालिकों को कथित ट्रैफिक उल्लंघन की सूचना कानून के मुताबिक निर्धारित समय के भीतर मिल सके। 

अब आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल खुद पोर्टल में बदलाव का अंतिम आदेश नहीं दिया है। उसने मामले को ई-कमेटी के पास विचार के लिए भेजा है। यानी अब यह कमेटी याचिका में उठाए गए मुद्दों और प्रस्तावित तकनीकी बदलावों पर विचार करेगी। अगर बदलाव स्वीकार किए जाते हैं, तो भविष्य में कंपाउंडेबल ट्रैफिक चालान के ऑनलाइन निपटारे की प्रक्रिया नागरिकों के लिए ज्यादा स्पष्ट हो सकती है और चालान का भुगतान करने तथा ‘दोष स्वीकार करने’ के बीच अंतर को पोर्टल पर साफ तौर पर दिखाया जा सकता है। ई-कमेटी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार Virtual Courts का उद्देश्य ही छोटे मामलों के निपटारे को अधिक प्रभावी बनाना और लोगों को बिना भौतिक रूप से अदालत पहुंचे मामलों के समाधान की सुविधा देना है।