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“बच्चा कोई 50-50 बंटवारे की चीज नहीं!” बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

माता-पिता के अधिकारों से ऊपर बच्चे का कल्याण—बॉम्बे हाईकोर्ट ने कस्टडी विवाद में बड़ा संदेश देते हुए कहा कि भारतीय कानून ‘Joint Parenting’ को मान्यता नहीं देता। कोर्ट ने चेताया कि हर मामले में बच्चे को 50-50 समय बांटना उलटे विवाद और बच्चे पर मानसिक असर का कारण बन सकता है।

Sonali02 सित. 2026, 03:28 PM IST
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“बच्चा कोई 50-50 बंटवारे की चीज नहीं!” बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला


मुंबई:

 तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी को लेकर माता-पिता के बीच होने वाली कानूनी लड़ाई पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने बेहद अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि कस्टडी के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण माता-पिता के अधिकार नहीं, बल्कि बच्चे का कल्याण है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय कानूनों में ‘Joint Parenting’ की कोई स्वतंत्र कानूनी मान्यता नहीं है। हर मामले में बच्चे को माता-पिता के बीच 50-50 समय बांटना न तो जरूरी है और न ही हर परिस्थिति में बच्चे के हित में है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 1 सितंबर 2026 को 14 वर्षीय बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामले में यह टिप्पणी की। जस्टिस गौरी गोडसे ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बच्चे के माता-पिता के बीच Shared Parenting की व्यवस्था बनाई गई थी। हाईकोर्ट ने मामले को दोबारा विचार के लिए फैमिली कोर्ट भेज दिया। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी का फैसला करते समय यह नहीं देखा जाना चाहिए कि माता या पिता में से किसका अधिकार ज्यादा है। असली सवाल यह होना चाहिए कि बच्चे के लिए कौन-सी व्यवस्था सबसे बेहतर और सुरक्षित है। बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य, भावनात्मक स्थिरता, सामाजिक विकास और मानसिक शांति जैसे पहलुओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।


50-50 कस्टडी हर बच्चे के लिए सही नहीं

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से 50-50 कस्टडी के फॉर्मूले को लेकर सावधानी बरती। कोर्ट ने कहा कि बच्चे को बराबर समय के लिए दोनों माता-पिता के पास रखना हर मामले में व्यावहारिक समाधान नहीं हो सकता। यदि माता-पिता के बीच पहले से विवाद है तो ऐसी व्यवस्था बच्चे को लगातार एक घर से दूसरे घर जाने की स्थिति में डाल सकती है और भविष्य में और अधिक संघर्ष पैदा कर सकती है। अदालत ने हालांकि यह भी माना कि बच्चे के लिए दोनों माता-पिता का प्यार और साथ महत्वपूर्ण है। इसलिए कस्टडी एक माता-पिता को मिलने का मतलब यह नहीं कि दूसरे माता-पिता को बच्चे की जिंदगी से बाहर कर दिया जाए।


क्या था पूरा मामला?

मामला SRB vs DA से संबंधित था और यह Writ Petition No. 14746 of 2024 के जरिए बॉम्बे हाईकोर्ट पहुंचा। दोनों माता-पिता ने बांद्रा फैमिली कोर्ट के सितंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी थी। 14 वर्षीय बच्चे से बातचीत के बाद फैमिली कोर्ट ने पाया था कि बच्चा अपनी मां के साथ रहना चाहता है, लेकिन वह अपने पिता से भी भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है। फैमिली कोर्ट ने Shared Parenting की व्यवस्था बनाते हुए बच्चे का सामान्य निवास मां के साथ रखा था। साथ ही पिता को छुट्टियों के दौरान 50 प्रतिशत समय बच्चे के साथ बिताने और शिक्षा से जुड़े 50 प्रतिशत खर्च में योगदान करने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को रद्द करते हुए कहा कि Shared Parenting को केवल माता-पिता के अधिकारों के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता। ऐसी व्यवस्था तभी उचित होगी जब वह बच्चे के सर्वोत्तम हित में हो।


पिता से मिलना बच्चे का भी अधिकार

हाईकोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण बात कही कि बच्चे का अपने पिता के साथ समय बिताना केवल पिता का अधिकार नहीं है, बल्कि बच्चे का भी अधिकार है। इसलिए मां को पिता और बच्चे के बीच मुलाकात को सहज बनाने के लिए वास्तविक प्रयास करने चाहिए। अंतिम कस्टडी का फैसला होने तक बच्चे की फिजिकल कस्टडी मां के पास रहेगी। वहीं पिता को दिवाली, क्रिसमस और गर्मी की छुट्टियों के एक हिस्से में बच्चे के साथ रहने की अनुमति दी गई है। कोर्ट का संदेश साफ है—कस्टडी में बराबर समय नहीं, बच्चे की भलाई सबसे जरूरी है। माता-पिता के अधिकारों की लड़ाई में बच्चे की मानसिक शांति और भविष्य से समझौता नहीं किया जा सकता।