general

समुद्र का बढ़ता स्तर: मुंबई और कोलकाता पर मंडरा रहा लाखों लोगों के विस्थापन का खतरा, UN की चेतावनी!

जलवायु परिवर्तन का असर अब भविष्य की आशंका भर नहीं रह गया है। समुद्र का बढ़ता स्तर दुनिया के तटीय शहरों और समुदायों के लिए मौजूदा और तेजी से बढ़ता खतरा बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों में 1.4 करोड़ से अधिक लोग स्थायी जलमग्नता के कारण अपने घर खोने के तत्काल जोखिम में हैं।

Kalpana Gautam02 सित. 2026, 07:27 PM IST
खबर शेयर करें:
समुद्र का बढ़ता स्तर: मुंबई और कोलकाता पर मंडरा रहा लाखों लोगों के विस्थापन का खतरा, UN की चेतावनी!
नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन का असर अब भविष्य की आशंका भर नहीं रह गया है। समुद्र का बढ़ता स्तर दुनिया के तटीय शहरों और समुदायों के लिए मौजूदा और तेजी से बढ़ता खतरा बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों में 1.4 करोड़ से अधिक लोग स्थायी जलमग्नता के कारण अपने घर खोने के तत्काल जोखिम में हैं। इनमें भारत के मुंबई और कोलकाता तथा बांग्लादेश की राजधानी ढाका जैसे शहर शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्ट ‘Challenges related to sea level rise and ways and approaches to address it’ में कहा गया है कि समुद्र का बढ़ता स्तर अब कोई दूर की समस्या नहीं है। समुद्र का स्तर ऐतिहासिक रूप से अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है और इसकी रफ्तार भी तेज हो रही है। इसका असर तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों के घरों के साथ-साथ बुनियादी ढांचे, पानी की आपूर्ति, स्वास्थ्य और आजीविका पर भी पड़ रहा है।

मुंबई और कोलकाता क्यों हैं चिंता के केंद्र में?
मुंबई और कोलकाता दोनों ही घनी आबादी वाले तटीय महानगर हैं। समुद्र के बढ़ते स्तर के साथ-साथ भूमि का धंसना, तटीय बाढ़ और तेज तूफानों जैसी घटनाएं जोखिम को और बढ़ा सकती हैं। UN के अनुसार दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों में समुद्र का बढ़ता स्तर सिर्फ आर्थिक नुकसान का सवाल नहीं है, बल्कि इसका सबसे गंभीर परिणाम मानव विस्थापन हो सकता है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि तटीय इलाकों के जोखिम का आकलन केवल संपत्ति और आर्थिक नुकसान के आधार पर नहीं होना चाहिए। कितने लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ सकते हैं, कितने परिवारों की आजीविका प्रभावित होगी और किन समुदायों के पास सुरक्षित स्थानों पर जाने के सीमित विकल्प हैं—इन सामाजिक पहलुओं को भी उतनी ही गंभीरता से देखना जरूरी है।

2024 में समुद्र स्तर बढ़ने की रफ्तार रही रिकॉर्ड

UN की रिपोर्ट के अनुसार 2014 से 2023 के बीच वैश्विक समुद्र स्तर औसतन 4.7 मिलीमीटर प्रति वर्ष की दर से बढ़ा। लेकिन 2024 में यह दर बढ़कर 5.9 मिलीमीटर प्रति वर्ष हो गई, जिसे रिकॉर्ड वृद्धि बताया गया है। इस तेजी के पीछे महासागरों का असाधारण रूप से गर्म होना और ग्लेशियरों का पिघलना प्रमुख कारण हैं। रिपोर्ट के मुताबिक समुद्र का स्तर 2050 तक बढ़ता रहेगा, क्योंकि जलवायु प्रणाली में पहले से मौजूद गर्मी के प्रभाव लंबे समय तक बने रहेंगे। समुद्र स्तर में हुई कुछ वृद्धि अब अपरिवर्तनीय भी हो चुकी है, हालांकि भविष्य में होने वाली वृद्धि की मात्रा इस बात पर निर्भर करेगी कि दुनिया ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कितनी तेजी से कटौती करती है।


सिर्फ घर ही नहीं, पानी और स्वास्थ्य पर भी खतरा

समुद्र का बढ़ता स्तर तटीय शहरों की सड़कें, परिवहन व्यवस्था, ऊर्जा नेटवर्क, इमारतें और जल एवं सीवेज प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है। समुद्री पानी के भीतर आने से भूजल स्रोतों में खारापन बढ़ने का खतरा भी है। इससे पीने के पानी की उपलब्धता, खेती और सिंचाई प्रभावित हो सकती है। स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी खतरा बढ़ सकता है। बाढ़ और सीवेज व्यवस्था के बाधित होने से जलजनित बीमारियों का जोखिम बढ़ता है। लंबे समय तक विस्थापन और असुरक्षा का असर लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।


दुनिया के तटीय इलाकों के लिए बढ़ता संकट

UN के अनुसार दुनिया की करीब 77 करोड़ आबादी ऐसे तटीय क्षेत्रों में रहती है जो हाई-टाइड लाइन से पांच मीटर से भी कम ऊंचाई पर हैं। ये समुदाय बाढ़, तटीय कटाव, खारे पानी के बढ़ते प्रभाव और पारिस्थितिकी तंत्र के नुकसान के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में इसका असर अलग होगा। अमेरिका के मियामी और न्यूयॉर्क तथा चीन के ग्वांगझोउ जैसे शहरों में बड़ी चिंता अरबों डॉलर की तटीय संपत्तियों और बुनियादी ढांचे के नुकसान की है। इसके विपरीत दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों में सबसे बड़ा खतरा लोगों के विस्थापन का है।


अब तैयारी का समय

संयुक्त राष्ट्र ने समुद्र स्तर में वृद्धि से निपटने के लिए लंबे समय की अनुकूलन योजनाओं, बेहतर वैज्ञानिक आंकड़ों, तकनीकी क्षमता और पर्याप्त एवं अनुमानित वित्तीय सहायता की जरूरत पर जोर दिया है। तटीय शहरों के लिए बाढ़ सुरक्षा, जल प्रबंधन, बेहतर शहरी नियोजन और संवेदनशील आबादी के लिए पुनर्वास योजनाएं अब भविष्य की तैयारी नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता बनती जा रही हैं। मुंबई और कोलकाता के लिए UN की चेतावनी इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन का संकट अब दूर-दराज के द्वीपीय देशों तक सीमित नहीं है। भारत के दो बड़े महानगर भी बदलती जलवायु की कीमत चुकाने वाले प्रमुख शहरों में शामिल हो सकते हैं। आने वाले दशकों में यह तय करने वाली सबसे अहम बात होगी कि तटीय शहर समुद्र के बढ़ते खतरे के सामने कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी तैयारी करते हैं।