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‘बच्चे को अपराधी की तरह नहीं देखा जा सकता’, सुप्रीम कोर्ट ने 21 साल पुरानी सजा पलटी, नाबालिग होने का दावा स्वीकार
21 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया है, जो नाबालिगों के अधिकारों पर बड़ी लकीर खींचता है। कोर्ट ने साफ कहा कि अपराध के समय बच्चा था, तो उसे उम्रभर “अपराधी” की पहचान के साथ नहीं देखा जा सकता। महावीर उर्फ अवनीश की दोषसिद्धि रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग होने के दावे को स्वीकार किया और कहा कि तकनीकी प्रक्रिया के आधार पर बच्चे को जुवेनाइल जस्टिस कानून के संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता।

नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों के अधिकारों को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए 21 साल पुराने मामले में आरोपी महावीर उर्फ अवनीश की दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी बच्चे को स्थायी रूप से अपराधी की पहचान नहीं दी जा सकती। यदि अपराध किए जाने के समय आरोपी की उम्र 18 वर्ष से कम थी, तो उसे जुवेनाइल जस्टिस कानून के तहत मिलने वाले संरक्षण से केवल इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने अपनी नाबालिग होने की बात कई साल बाद उठाई है। यह फैसला 2 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने महावीर उर्फ अवनीश बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में सुनाया। कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की याचिका खारिज कर दी गई थी।
क्या था पूरा मामला?
मामला मध्य प्रदेश के मुरैना जिले का है और वर्ष 2004 की घटना से जुड़ा है। भूरी नाम की महिला और उसकी नवजात बच्ची के शव रेलवे ट्रैक पर मिले थे। इसके बाद महिला के पति, ससुराल वालों और अन्य रिश्तेदारों के खिलाफ हत्या, दहेज मृत्यु और सबूत मिटाने समेत कई आरोपों में मुकदमा दर्ज हुआ। मुकदमे के दौरान कई गवाह अपने बयानों से मुकर गए। ट्रायल कोर्ट ने हत्या और दहेज मृत्यु के आरोपों में आरोपियों को बरी कर दिया, लेकिन महावीर को भारतीय दंड संहिता की धारा 201 पार्ट-II के तहत सबूत मिटाने के अपराध में तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने भी उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी।
21 साल बाद सामने आया नाबालिग होने का दावा
महावीर ने बाद में दावा किया कि घटना के समय वह नाबालिग था और उसकी उम्र केवल 17 वर्ष थी। उसकी उम्र की जांच जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, मुरैना में हुई। स्कूल की मार्कशीट और जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेजों के आधार पर बोर्ड ने उसकी जन्मतिथि 1 जुलाई 1987 मानी। इस हिसाब से 13 सितंबर 2004 को घटना के समय महावीर की उम्र 18 वर्ष से कम थी। इसके बावजूद हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को गलत बताया। कोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल होने का दावा मामले के किसी भी चरण में उठाया जा सकता है। यहां तक कि मुकदमा समाप्त होने के बाद भी यदि विश्वसनीय दस्तावेज उपलब्ध हों तो अदालत को उस दावे की जांच करनी होगी। पीठ ने जोर दिया कि जुवेनाइल होने का निर्धारण अपराध की तारीख पर आरोपी की उम्र के आधार पर किया जाता है, न कि मुकदमे या अपील के समय उसकी उम्र के आधार पर। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों को अपराधी के रूप में स्थायी पहचान देना जुवेनाइल जस्टिस कानून की भावना के खिलाफ है। कानून का उद्देश्य नाबालिगों को केवल सजा देना नहीं, बल्कि उनके सुधार, पुनर्वास और समाज में दोबारा शामिल होने का रास्ता तैयार करना है।
धारा 201 की सजा भी रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि के मूल आधार पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि हत्या और दहेज मृत्यु के आरोप साबित नहीं हुए थे। ऐसे में केवल सबूत मिटाने के आरोप के आधार पर धारा 201 पार्ट-II के तहत दोषसिद्धि बनाए रखना उचित नहीं था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने महावीर की दोषसिद्धि और सजा को रद्द कर दिया। यह फैसला इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि नाबालिगों के अधिकारों और जुवेनाइल जस्टिस कानून के संरक्षण को तकनीकी आधार पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
