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जैविक पिता अपने ही नाजायज बेटे को ले सकता है गोद, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
जैविक पिता ही बना बेटे का कानूनी पिता! इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया कि हिंदू कानून के तहत सिर्फ इसलिए adoption अमान्य नहीं हो जाता क्योंकि गोद लेने वाला व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता है। करीब 56 साल पुराने इस मामले में कोर्ट ने 1970 में हुए adoption को वैध माना और कहा कि कानून में जैविक लेकिन विवाहेतर जन्मे बेटे को गोद लेने पर कोई स्पष्ट रोक नहीं है।

प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिंदू दत्तक ग्रहण कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी हिंदू पुरुष को अपने ही जैविक लेकिन विवाहेतर जन्मे बेटे को गोद लेने से Hindu Adoptions and Maintenance Act, 1956 के तहत केवल इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि वह बच्चे का जैविक पिता है।
Justice Arun Kumar की पीठ ने 3 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। मामला वर्ष 1970 में हुए कथित adoption से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने निचली अदालत और प्रथम अपीलीय अदालत के उन निष्कर्षों को बरकरार रखा, जिनमें Ram Kesh को Badlu का वैध रूप से गोद लिया हुआ बेटा माना गया था। खास बात यह थी कि Badlu ही Ram Kesh के जैविक पिता भी बताए गए थे।
क्या था पूरा मामला?
विवाद Badlu की कृषि भूमि से जुड़ा था। Ram Kesh का दावा था कि उसकी मां की शादी Budh Ram से हुई थी, लेकिन Badlu उसके जैविक पिता थे। उसके अनुसार, Badlu ने 8 नवंबर 1970 को उसे गोद लिया था। बाद में Badlu ने 18 और 19 जून 1973 को अपनी कुछ जमीन defendants के पक्ष में बेच दी। Ram Kesh ने इन बिक्री विलेखों को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि इलाज के लिए Badlu को ले जाने के दौरान धोखे से बिक्री दस्तावेज तैयार कराए गए थे। वहीं defendants ने adoption से ही इनकार किया। उनका तर्क था कि Ram Kesh पहले से Badlu का जैविक बेटा था, इसलिए Badlu उसे गोद नहीं ले सकता था। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने Ram Kesh के पक्ष में फैसला सुनाया और adoption को वैध माना। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद मामला दूसरी अपील के रूप में हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने Hindu Adoptions and Maintenance Act, 1956 की Section 10 पर विचार करते हुए कहा कि यह प्रावधान illegitimate child को केवल उसके जन्म की स्थिति के आधार पर adoption के लिए अयोग्य नहीं ठहराता। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून में ऐसा कोई express provision नहीं है, जो किसी हिंदू पुरुष को अपने जैविक लेकिन illegitimate बेटे को गोद लेने से रोकता हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे को adoption में देने वाले व्यक्ति की क्षमता और बच्चे को गोद लेने वाले व्यक्ति की क्षमता अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं। इसलिए adoption की वैधता का फैसला उस समय लागू कानून और उसकी शर्तों के आधार पर किया जाना चाहिए।
'बच्चे को देना और लेना' जरूरी
हाईकोर्ट ने Hindu Adoptions and Maintenance Act की Section 11(vi) को महत्वपूर्ण माना। अदालत के अनुसार adoption की प्रक्रिया में बच्चे को वास्तव में जन्म के परिवार से गोद लेने वाले परिवार में स्थानांतरित करने की मंशा और 'giving and taking' यानी बच्चे को देने और लेने की वास्तविक प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने माना कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित होता है कि Ram Kesh की जैविक मां ने उसे Badlu को adoption में दिया था और Badlu ने उसे स्वीकार कर गोद लिया था। इसलिए केवल Badlu के जैविक पिता होने के आधार पर adoption को अमान्य नहीं किया जा सकता।
1970 के adoption में registered deed जरूरी नहीं
मामले में adoption deed मौजूद नहीं होने का तर्क भी दिया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि adoption वर्ष 1970 में हुआ था। Registered adoption document से संबंधित Section 16 की व्यवस्था बाद के संशोधन से आई और 1970 के adoption पर उसे उसी तरह लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए उस समय लागू कानून के तहत adoption को अन्य स्वीकार्य साक्ष्यों के जरिए साबित किया जा सकता था। अदालत ने पाया कि निचली अदालतों द्वारा स्वीकार किए गए साक्ष्य adoption को साबित करने के लिए पर्याप्त थे। हाईकोर्ट ने दूसरी अपील खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा। फैसले का महत्व यह है कि हिंदू दत्तक ग्रहण कानून में केवल जैविक पिता होने के आधार पर किसी हिंदू पुरुष को अपने जैविक illegitimate बेटे को adoption में लेने से स्वतः अयोग्य नहीं माना जा सकता। हालांकि adoption की वैधता के लिए कानून में निर्धारित अन्य आवश्यक शर्तों और प्रक्रिया का पालन जरूरी रहेगा।
