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8 साल से ज्यादा जेल में बंद अंडरट्रायल को सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दी जमानत, आरोपी के पुराने रिकॉर्ड बने वजह; 6 महीने में ट्रायल पूरा करने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे अंडरट्रायल की जमानत याचिका खारिज कर दी, जो 8 साल से ज्यादा समय से जेल में बंद है। कोर्ट ने उसकी लंबी हिरासत और ट्रायल की धीमी रफ्तार पर चिंता जताई, लेकिन पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को देखते हुए राहत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को बड़ा निर्देश देते हुए पूरे मुकदमे को 6 महीने के भीतर पूरा करने को कहा।

नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने करीब साढ़े आठ साल से न्यायिक हिरासत में बंद एक अंडरट्रायल कैदी की जमानत याचिका खारिज कर दी है। मामला कोलकाता में एक ज्वेलरी शॉप में हुई कथित डकैती और चोरी से जुड़ा है। हालांकि, आरोपी की लंबे समय से चली आ रही हिरासत और ट्रायल की धीमी गति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को मुकदमे की पूरी कार्यवाही छह महीने के भीतर समाप्त करने का निर्देश दिया है। यह आदेश 1 सितंबर 2026 को जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पारित किया। आरोपी ने कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा उसकी जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
क्या है पूरा मामला?
मामला कोलकाता के एक ज्वेलरी शॉप में हुई कथित सेंधमारी और लूट से संबंधित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी और उसके साथियों को कोलकाता पुलिस के डिटेक्टिव डिपार्टमेंट की एंटी-डकैती सेक्शन ने तलाश कर पकड़ा था। आरोप है कि आरोपियों ने ज्वेलरी शॉप में घुसकर दुकान के मालिक और कर्मचारियों के साथ मारपीट की और डिस्प्ले बॉक्स में रखी सोने की ज्वेलरी लेकर फरार हो गए। कथित तौर पर करीब 752.100 ग्राम सोने की ज्वेलरी लूटी गई थी, जिसकी उस समय कीमत लगभग 21.66 लाख रुपये बताई गई थी।
8.5 साल की हिरासत के बावजूद जमानत क्यों नहीं?
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की लंबी हिरासत को लेकर चिंता जरूर व्यक्त की, लेकिन जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट के सामने आरोपी के आपराधिक इतिहास यानी antecedents भी महत्वपूर्ण रहे। पीठ ने माना कि आरोपी के खिलाफ पहले भी इसी तरह की प्रकृति के अपराधों से जुड़े मामले रहे हैं। इसी वजह से कोर्ट ने अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए उसे जमानत देने से इनकार करना उचित समझा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी गंभीरता से नोट किया कि आरोपी आठ साल से अधिक समय से जेल में है और ट्रायल की रफ्तार काफी धीमी है। इतनी लंबी अवधि तक विचाराधीन कैदी का जेल में रहना न्यायिक प्रक्रिया की गति को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
6 महीने में ट्रायल पूरा करने का निर्देश
जमानत याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह मामले की सुनवाई में तेजी लाए और पूरे ट्रायल को छह महीने के भीतर समाप्त करे।
इस तरह कोर्ट ने एक तरफ आरोपी के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को देखते हुए तत्काल जमानत देने से इनकार किया, वहीं दूसरी तरफ उसकी लंबी न्यायिक हिरासत को देखते हुए मुकदमे को जल्द खत्म करने का रास्ता भी साफ किया।
क्यों अहम है फैसला?
यह मामला उन अंडरट्रायल कैदियों की स्थिति को सामने लाता है जो लंबे समय तक जेल में रहते हैं, जबकि उनके खिलाफ मुकदमे का अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ होता। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जमानत नहीं दी, लेकिन ट्रायल में हो रही देरी को नजरअंदाज भी नहीं किया। छह महीने की समयसीमा तय कर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक चलने वाले ट्रायल को अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता।
