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दहेज हत्या मामले में पति को जमानत देने वाले जज पर जांच की सिफारिश, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की बेल

दहेज हत्या के मामले में पति को जमानत देना एक न्यायिक अधिकारी को भारी पड़ गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत रद्द करते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सामग्री और BSA की धारा 118 के तहत वैधानिक अनुमान मौजूद था, फिर भी बिना उचित कारण जमानत देना विवेकाधिकार का “मनमाना इस्तेमाल” था। हाईकोर्ट ने मामले की प्रशासनिक जांच की सिफारिश भी की है।

Sonali04 सित. 2026, 06:35 PM IST
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दहेज हत्या मामले में पति को जमानत देने वाले जज पर जांच की सिफारिश, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द की बेल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में मृतका के पति को जमानत देने वाले अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के खिलाफ प्रशासनिक जांच की सिफारिश की है। कोर्ट ने पाया कि मामले में पति के खिलाफ पर्याप्त सामग्री मौजूद थी और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 118 के तहत दहेज हत्या का वैधानिक अनुमान भी लागू होता था, इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने बिना उचित कारण बताए पति को जमानत दे दी। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने पति की जमानत रद्द करते हुए मामले को हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के समक्ष रखने का निर्देश दिया है, ताकि यह तय किया जा सके कि संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ जांच की जरूरत है या नहीं।

क्या है पूरा मामला?

मामला उत्तर प्रदेश के जालौन जिले का है। वर्ष 2025 में संबंधित थाने में पति के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 और 80(2) तथा दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। आरोप था कि महिला की शादी के सात साल के भीतर असामान्य परिस्थितियों में मौत हुई। पोस्टमार्टम में एंटी-मॉर्टम हैंगिंग और दम घुटने यानी asphyxia के संकेत मिले थे। आरोप यह भी था कि मौत से कुछ समय पहले महिला को दहेज की मांग पूरी न होने को लेकर प्रताड़ित किया गया था।

इसके बावजूद जालौन के अपर सत्र न्यायाधीश, कोर्ट नंबर-1 ने मृतका के पति को जमानत दे दी थी।

धारा 118 BSA क्यों महत्वपूर्ण?

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 दहेज हत्या के मामलों में एक महत्वपूर्ण वैधानिक अनुमान प्रदान करती है। यदि किसी महिला की शादी के सात साल के भीतर दहेज हत्या की परिस्थितियों में मौत होती है और यह दिखाया जाता है कि मौत से ठीक पहले उसे दहेज को लेकर आरोपी द्वारा क्रूरता या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था, तो कोर्ट यह अनुमान लगा सकता है कि संबंधित व्यक्ति ने दहेज हत्या की है। इसी प्रावधान को देखते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पति को जमानत देने के तरीके पर सवाल उठाया।

जज ने अपनी सफाई में क्या कहा?

हाईकोर्ट ने पहले संबंधित अपर सत्र न्यायाधीश से स्पष्टीकरण मांगा था कि उन्होंने धारा 118 BSA के तहत अनुमान लागू होने के बावजूद पति को जमानत कैसे दी।

अपने जवाब में अपर सत्र न्यायाधीश सतीश चंद्र द्विवेदी ने स्वीकार किया कि रिकॉर्ड में दहेज की मांग को लेकर आरोपी द्वारा मृतका को प्रताड़ित किए जाने की सामग्री मौजूद थी। उन्होंने यह भी माना कि महिला की मौत शादी के सात साल के भीतर हुई थी और धारा 118 BSA का अनुमान भी लागू होता था। हालांकि, उन्होंने बताया कि पति को उसकी सास और ससुर के साथ समानता यानी ‘parity’ के आधार पर जमानत दी गई थी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि पर्याप्त सामग्री और धारा 118 BSA के तहत वैधानिक अनुमान मौजूद होने के बावजूद बिना कारण बताए पति को जमानत देना विवेकाधिकार का मनमाना इस्तेमाल था। कोर्ट ने कहा कि इस तरह जमानत देने से संदेह पैदा होता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह संबंधित न्यायिक अधिकारी की व्यक्तिगत ईमानदारी या सत्यनिष्ठा पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है। कोर्ट ने कहा कि मामले में हुई कथित “गलत और मनमाने तरीके से शक्ति के इस्तेमाल” की प्रशासनिक स्तर पर जांच की आवश्यकता है। इसलिए मामले को प्रशासनिक समिति के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया है।

साथ ही, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई पति की जमानत रद्द कर दी।