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16 साल जेल में काटे, फिर सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी! 6 साल के बच्चे की हत्या में दोषसिद्धि पर उठे सवाल
16 साल से ज्यादा जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 6 साल के बच्चे की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी कर दिया। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने कहा कि अभियोजन की परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कहानी में कई महत्वपूर्ण कड़ियां गायब थीं और आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित नहीं हो सका।

नई दिल्ली:
16 साल से अधिक समय जेल में बिताने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2007 के एक हत्या मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी कर दिया है। मामला छह साल के बच्चे की हत्या से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी में कई महत्वपूर्ण लिंक गायब थे और आरोपी के खिलाफ अपराध संदेह से परे साबित नहीं हो सका। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत और हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें उसे हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2007 में छह साल के बच्चे की हत्या से संबंधित था। हत्या के आरोप में आरोपी को गिरफ्तार किया गया और उसके खिलाफ मुकदमा चलाया गया। ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर उसे दोषी ठहराया था। बाद में हाईकोर्ट ने भी उसकी सजा को बरकरार रखा। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी। अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पूरे साक्ष्य और अभियोजन की कहानी की जांच की।
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी में कई ‘Missing Links’
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन का पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित था। ऐसे मामलों में अभियोजन को घटनाओं की ऐसी पूरी और मजबूत कड़ी स्थापित करनी होती है, जिससे आरोपी के अलावा किसी अन्य व्यक्ति की संलिप्तता की संभावना खत्म हो जाए। लेकिन मौजूदा मामले में कोर्ट को साक्ष्यों की इस कड़ी में कई महत्वपूर्ण कड़ियां गायब मिलीं। अदालत ने माना कि उपलब्ध परिस्थितियां आरोपी के अपराध की ओर पूरी तरह और निर्णायक रूप से इशारा नहीं करती थीं।
‘संदेह से परे अपराध साबित करना जरूरी’
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में केवल संदेह या परिस्थितियों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन पक्ष को आरोपी के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करना होता है। पीठ ने कहा कि जब परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला पूरी नहीं होती और उसमें महत्वपूर्ण कड़ियां गायब रहती हैं, तो दोषसिद्धि को कायम रखना सुरक्षित नहीं है।
16 साल की सजा के बाद मिली बड़ी राहत
इस मामले में आरोपी ने करीब 16 साल से अधिक समय जेल में बिताया। इतने लंबे समय तक कारावास में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट का बरी करने का फैसला उसके लिए बड़ी राहत है। कोर्ट ने अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए आवश्यक ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं थे।
निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की अपील मंजूर करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और हाईकोर्ट द्वारा उसे बरकरार रखने वाले फैसले को रद्द कर दिया। इसके साथ ही आरोपी को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया। यह फैसला एक बार फिर इस कानूनी सिद्धांत को रेखांकित करता है कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित हत्या के मामले में अभियोजन को घटनाओं की पूरी, विश्वसनीय और ऐसी कड़ी स्थापित करनी होती है जो आरोपी के अपराध के अलावा किसी अन्य संभावना के लिए जगह न छोड़े। यदि इस कड़ी में महत्वपूर्ण ‘missing links’ रह जाते हैं, तो आरोपी को संदेह का लाभ मिलना चाहिए।
