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सोशल मीडिया और अखबारों की खबरों पर नहीं, सबूतों के आधार पर फैसला करें अदालतें: पूर्व SC जज राजेश बिंदल

सोशल मीडिया या अखबारों की खबरों से नहीं, बल्कि अदालत के सामने मौजूद सबूतों के आधार पर फैसला होना चाहिए। पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस राजेश बिंदल ने चंडीगढ़ में यह बात कही।

Sonali04 सित. 2026, 06:36 PM IST
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सोशल मीडिया और अखबारों की खबरों पर नहीं, सबूतों के आधार पर फैसला करें अदालतें: पूर्व SC जज राजेश बिंदल

चंडीगढ़:

 सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस राजेश बिंदल ने अदालतों के फैसलों को लेकर एक अहम बात कही है। उन्होंने कहा कि अदालतों को किसी मामले का फैसला सोशल मीडिया, अखबारों में प्रकाशित खबरों या बाहर चल रहे जनमत के आधार पर नहीं, बल्कि कोर्ट के सामने पेश किए गए सबूतों और रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री के आधार पर करना चाहिए। जस्टिस राजेश बिंदल 30 अगस्त को चंडीगढ़ स्थित आत्मा राम लॉ ऑडिटोरियम में आयोजित ‘एकम न्याय डायलॉग’ में उद्घाटन भाषण दे रहे थे। इस दौरान उन्होंने जेंडर-न्यूट्रल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम, कानूनों के कथित दुरुपयोग, वैवाहिक विवादों और मध्यस्थता जैसे मुद्दों पर भी अपने विचार रखे।


‘सोशल मीडिया या अखबार हमारा आधार नहीं’

जस्टिस बिंदल ने कहा कि न्याय करते समय अदालत को यह देखना होता है कि उसके सामने रिकॉर्ड पर क्या सामग्री मौजूद है। सोशल मीडिया, अखबार या अदालत के बाहर किसी व्यक्ति द्वारा कही गई बातों को न्यायिक निर्णय का आधार नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने कहा कि अदालत का काम यह देखना है कि उसके सामने क्या साक्ष्य हैं और उसी के आधार पर न्याय किया जाए। किसी मामले को लेकर बाहर क्या धारणा बनाई जा रही है, यह अदालत के लिए निर्णायक नहीं हो सकता।


फैसला पुरुष के पक्ष में हो तो Bias, महिला के पक्ष में हो तो भी Bias?

पूर्व जज ने कहा कि अदालतों पर अक्सर पक्षपात के आरोप लगाए जाते हैं। यदि फैसला पुरुष के पक्ष में जाता है तो अदालत को पुरुषों के प्रति पक्षपाती बताया जाता है और यदि फैसला महिला के पक्ष में जाता है तो भी पक्षपात का आरोप लगाया जाता है। उन्होंने कहा कि अदालत किसी भी व्यक्ति की बात पर आंख बंद करके विश्वास नहीं कर सकती। न्यायिक प्रक्रिया में आरोपों के बजाय रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री और साक्ष्यों का महत्व होता है।


जेंडर-न्यूट्रल कानून पर क्या बोले?

जस्टिस बिंदल ने जेंडर-न्यूट्रल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि कानून के सामने समानता और कानूनों का समान संरक्षण संविधान की मूल गारंटी है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी कानून को केवल इसलिए स्वाभाविक रूप से पक्षपाती नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह किसी विशेष सामाजिक समस्या को दूर करने के लिए बनाया गया है। संसद या राज्य विधानमंडल कानून किसी पहचानी गई सामाजिक समस्या को हल करने के उद्देश्य से बनाते हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि वास्तविक समस्या तब पैदा होती है जब कानून में मौजूद प्रावधानों का दुरुपयोग किया जाता है।


झूठे मामलों में मौजूद कानूनी उपायों का इस्तेमाल कम

महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों से जुड़े कानूनों का जिक्र करते हुए जस्टिस बिंदल ने कहा कि कानूनों में झूठे आरोप लगाने या गलत तरीके से गिरफ्तार अथवा फंसाए गए लोगों के लिए भी कुछ कानूनी उपाय मौजूद हैं। लेकिन व्यवहार में इन उपायों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम होता है। उन्होंने अपने न्यायिक अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि अदालतों के सामने ऐसे वैवाहिक और आपराधिक मामले भी आते हैं, जिनमें बाद में आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलते। उन्होंने ऐसे मामलों का भी उल्लेख किया जहां वैवाहिक विवाद में परिवार के कई सदस्यों को आरोपी बना दिया जाता है।


मध्यस्थता से सुलझ सकते हैं वैवाहिक विवाद

जस्टिस बिंदल ने बढ़ते वैवाहिक मुकदमों पर भी चिंता जताई और विवादों को लंबे समय तक अदालत में खींचने के बजाय मध्यस्थता को अपनाने की जरूरत बताई।

उन्होंने कहा कि कई वैवाहिक विवाद बातचीत और मध्यस्थता के जरिए सुलझाए जा सकते हैं। कई बार पति-पत्नी अदालत पहुंचते समय यह मान लेते हैं कि न्यायिक फैसला ही एकमात्र समाधान है, जबकि मध्यस्थता के जरिए दोनों पक्ष बिना इस सवाल के भी समाधान तक पहुंच सकते हैं कि सही कौन था और गलत कौन।


बच्चे की कस्टडी में सबसे जरूरी उसका हित

बच्चों की कस्टडी को लेकर होने वाले विवादों का जिक्र करते हुए जस्टिस बिंदल ने कहा कि पति-पत्नी की लड़ाई में कई बार बच्चे के हित को नजरअंदाज कर दिया जाता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कस्टडी विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बच्चे का वर्तमान और भविष्य का कल्याण होना चाहिए। कुल मिलाकर, जस्टिस बिंदल का संदेश स्पष्ट था कि अदालतों का फैसला सोशल मीडिया ट्रेंड, अखबारों की खबरों या सार्वजनिक धारणा से प्रभावित नहीं होना चाहिए। न्यायिक निर्णय का आधार वही सामग्री होनी चाहिए जो कानून के मुताबिक अदालत के सामने पेश की गई हो।