law-order

‘चांद तक पहुंच गए, लेकिन जाति व्यवस्था अब भी कायम’: मैनुअल स्कैवेंजिंग पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, महाराष्ट्र की नीति रद्द

देश चांद पर पहुंच गया, लेकिन इंसानों से आज भी सीवर साफ करवाना नहीं रुका। मैनुअल स्कैवेंजिंग पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि 75 साल की आजादी और संविधान के बावजूद जाति व्यवस्था की कठोर सच्चाई आज भी समाज के सामने है। कोर्ट ने राज्य को जिम्मेदारी से मुक्त करने वाली नीति को रद्द कर दिया।

Sonali04 सित. 2026, 06:36 PM IST
खबर शेयर करें:
‘चांद तक पहुंच गए, लेकिन जाति व्यवस्था अब भी कायम’: मैनुअल स्कैवेंजिंग पर बॉम्बे हाईकोर्ट सख्त, महाराष्ट्र की नीति रद्द

मुंबई: 

भारत चांद तक पहुंच चुका है, तकनीक के क्षेत्र में दुनिया के साथ कदम मिला रहा है, लेकिन देश में आज भी इंसानों से ऐसा काम कराया जा रहा है जो उनके सम्मान और गरिमा के खिलाफ है। मैनुअल स्कैवेंजिंग यानी हाथ से सीवर और गटर साफ करने की प्रथा को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि आजादी के 75 साल और संविधान लागू होने के दशकों बाद भी समाज में जाति व्यवस्था की कठोर सच्चाई सामने खड़ी है। बॉम्बे हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजुषा देशपांडे शामिल थीं, ने मैनुअल स्कैवेंजिंग की समस्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि समाज के एक वर्ग के लोगों को आज भी ऐसा काम करना पड़ता है, जिसे मानवीय गरिमा के खिलाफ माना जाता है। मामला सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतों तथा ऐसी घटनाओं में राज्य की जिम्मेदारी से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह मुद्दा आया कि निजी ठेकेदारों के जरिए काम कराए जाने की स्थिति में क्या राज्य खुद को जिम्मेदारी से अलग कर सकता है। हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया।


अदालत ने महाराष्ट्र सरकार की उस नीति को भी रद्द कर दिया, जिसके जरिए राज्य को ऐसी घटनाओं में जिम्मेदारी से मुक्त करने की कोशिश की गई थी। कोर्ट का स्पष्ट संदेश था कि केवल यह कह देने से कि सफाई का काम निजी ठेकेदार के माध्यम से कराया जा रहा था, सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। हाईकोर्ट ने मैनुअल स्कैवेंजिंग को केवल रोजगार या सफाई व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा मानने के बजाय इसे इंसानी गरिमा और सामाजिक समानता से जोड़कर देखा। अदालत ने समाज में मौजूद जातिगत भेदभाव की ओर भी ध्यान दिलाया, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से सीवर और मैला ढोने जैसे अमानवीय कामों का बोझ समाज के वंचित तबकों पर डाला जाता रहा है।

बेंच ने अपने आदेश में इस विरोधाभास को रेखांकित किया कि एक ओर देश वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों पर गर्व करता है, वहीं दूसरी ओर आज भी लोगों को अपनी जान जोखिम में डालकर सीवर में उतरना पड़ता है। कोर्ट की सख्ती का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि सीवर सफाई के दौरान जहरीली गैसों और ऑक्सीजन की कमी के कारण कई बार सफाईकर्मियों की जान चली जाती है। ऐसे मामलों में परिवारों के सामने आर्थिक और सामाजिक संकट खड़ा हो जाता है।


बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि मैनुअल स्कैवेंजिंग के खिलाफ कानून और संवैधानिक अधिकारों को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। राज्य और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी है कि सफाईकर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और किसी भी कीमत पर इंसानों को बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के सीवर में न उतारा जाए। कोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि तकनीकी विकास के बावजूद अगर समाज के किसी वर्ग को जीवन और सम्मान के बुनियादी अधिकारों से वंचित रहना पड़े, तो विकास की वास्तविक तस्वीर क्या है।