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‘चांद तक पहुंच गए, लेकिन जाति के कलंक से आजाद नहीं’: manual scavenging पर बॉम्बे HC की महाराष्ट्र सरकार को फटकार

बॉम्बे हाई कोर्ट ने मैनुअल स्कैवेंजिंग और सीवर-सफाई के दौरान होने वाली मौतों को लेकर महाराष्ट्र सरकार की मुआवजा नीति पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि एक ही तरह का जोखिम उठाने वाले सफाई कर्मियों के बीच उनके नियोक्ता के आधार पर मुआवजे में भेदभाव नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने राज्य को ‘Hazardous Cleaning’ के दौरान हुई मौतों की पहचान कर प्रत्येक मृतक के आश्रितों को 30 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

Kalpana Gautam05 सित. 2026, 06:35 PM IST
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‘चांद तक पहुंच गए, लेकिन जाति के कलंक से आजाद नहीं’: manual scavenging पर बॉम्बे HC की महाराष्ट्र सरकार को फटकार

मुंबई: भारत के चांद तक पहुंचने के बावजूद जाति आधारित भेदभाव और मैनुअल स्कैवेंजिंग जैसी अमानवीय प्रथा का जारी रहना देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र में सफाई कर्मियों की मौत के मामलों में मुआवजा देने की व्यवस्था पर सुनवाई करते हुए यह सख्त टिप्पणी की। जस्टिस भारती एच. डांगरे और जस्टिस मंजुषा ए. देशपांडे की पीठ ने कहा कि 21वीं सदी में भारत अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर गर्व करता है, लेकिन समाज में जाति व्यवस्था अब भी ऐसी स्थितियां पैदा कर रही है, जिनमें कुछ लोगों को मानव गरिमा के खिलाफ काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। अदालत ने मैनुअल स्कैवेंजिंग को संविधान में निहित समानता और गरिमा के अधिकार के विपरीत बताया।


निजी क्षेत्र के सफाई कर्मियों के लिए अलग मुआवजा क्यों?

मामला महाराष्ट्र सरकार की दिसंबर 2019 और अप्रैल 2025 की Government Resolutions (GRs) में शामिल उन प्रावधानों से जुड़ा था, जिनके तहत निजी परिसरों, सोसायटियों और निजी संस्थानों में काम करने वाले सफाई कर्मियों की मौत की स्थिति में मुआवजे की जिम्मेदारी मुख्य रूप से संबंधित निजी संस्था या ठेकेदार पर डाली गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस व्यवस्था के कारण हादसे में जान गंवाने वाले सफाई कर्मियों के परिवारों को तत्काल राहत पाने के लिए सरकारी कार्यालयों और निजी संस्थाओं के बीच भटकना पड़ता है। अदालत ने माना कि इससे निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मियों के आश्रितों को सरकारी या स्थानीय निकायों के अधीन काम करने वाले कर्मियों की तुलना में असमान स्थिति में रखा जा रहा है।


हाई कोर्ट ने कहा- पहले राज्य दे मुआवजा, बाद में वसूली करे

अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजे के भुगतान में देरी नहीं होनी चाहिए। राज्य और स्थानीय निकायों को मृतक सफाई कर्मी के आश्रितों को तत्काल मुआवजा देना होगा। इसके बाद यदि किसी ठेकेदार, निजी संस्था या अन्य जिम्मेदार पक्ष की गलती सामने आती है, तो राज्य उससे मुआवजे की रकम वसूल सकता है। कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य पीड़ित परिवार को राहत देने में देरी करना नहीं, बल्कि मैनुअल स्कैवेंजिंग जैसी अमानवीय और खतरनाक प्रथा को खत्म करना तथा प्रभावित परिवारों का पुनर्वास सुनिश्चित करना है।


हर मृतक के परिवार को 30 लाख रुपये

पीठ ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि वह छह महीने के भीतर उन सभी लोगों की पहचान करे, जिनकी मौत 2013 के कानून में परिभाषित ‘Hazardous Cleaning’ के दौरान हुई है। ऐसे प्रत्येक मृतक के आश्रितों को 30 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाना है। साथ ही राज्य और स्थानीय निकायों को मृतक सफाई कर्मियों तथा उनके परिवारों के पुनर्वास के लिए भी कदम उठाने होंगे। अदालत ने साफ किया कि पुनर्वास में ‘Sanitation Workers’ और ‘Manual Scavengers’ के बीच भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।


2013 का कानून होने के बावजूद क्यों जारी है खतरा?

भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग पर रोक और प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013 लागू है। इसके बावजूद सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के दौरान लोगों की मौत के मामले सामने आते रहे हैं। हाई कोर्ट ने माना कि कानून और सरकारी योजनाएं मौजूद होने के बावजूद उनके प्रभावी क्रियान्वयन में कमी है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है; स्थानीय प्रशासन को सुरक्षा मानकों, सुरक्षात्मक उपकरणों और निर्धारित प्रक्रियाओं का वास्तविक पालन सुनिश्चित करना होगा।


पहले भी मुआवजे को लेकर सख्त टिप्पणी कर चुका है हाई कोर्ट

इसी व्यापक मुद्दे पर जनवरी 2026 की सुनवाई में भी बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा था कि मुआवजा देने की जिम्मेदारी को लेकर भ्रम नहीं होना चाहिए। अदालत ने राज्य सरकार के रुख को रिकॉर्ड करते हुए कहा था कि राज्य मुआवजा दे और दोषी ठेकेदार से बाद में रकम वसूल सकता है। इससे पहले जुलाई 2026 में बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने नांदेड में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मारे गए दो लोगों के परिवारों को 30-30 लाख रुपये देने का आदेश दिया था। अदालत ने मैनुअल स्कैवेंजिंग के जारी रहने को सभ्य समाज पर गंभीर कलंक बताया था।


अदालत का संदेश साफ

बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि सफाई कर्मी सरकारी कर्मचारी हों, निजी ठेकेदार के जरिए काम कर रहे हों या किसी निजी सोसायटी के लिए काम कर रहे हों—खतरनाक सफाई के दौरान उनकी जान जाने पर उनके परिवार के मुआवजे के अधिकार में भेदभाव नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मैनुअल स्कैवेंजिंग को खत्म करने की जिम्मेदारी केवल किसी निजी ठेकेदार की नहीं, बल्कि कानून लागू करने वाली राज्य और स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं की भी है।