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25 साल बाद ST सर्टिफिकेट निकला अमान्य, फिर भी नहीं जाएगी पेंशन! सुप्रीम कोर्ट ने रिटायर्ड कर्मचारी को दी बड़ी राहत

ST सर्टिफिकेट 26 साल बाद अमान्य घोषित हुआ, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी की 30 साल से ज्यादा की सेवा को देखते हुए उसकी पेंशन और रिटायरमेंट लाभ बचा लिए। कोर्ट ने जाति प्रमाणपत्र को अमान्य ठहराने का फैसला बरकरार रखते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया और कहा कि लंबे समय तक सेवा करने के बाद रिटायर हुए कर्मचारी को उसके रिटायरमेंट और पेंशन संबंधी लाभों से वंचित करना उचित नहीं होगा

Sonali05 सित. 2026, 06:36 PM IST
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25 साल बाद ST सर्टिफिकेट निकला अमान्य, फिर भी नहीं जाएगी पेंशन! सुप्रीम कोर्ट ने रिटायर्ड कर्मचारी को दी बड़ी राहत

नई दिल्ली: 

सरकारी नौकरी में नियुक्ति के लिए इस्तेमाल किया गया ST प्रमाणपत्र कई साल बाद अमान्य घोषित हो जाए तो क्या कर्मचारी की पूरी सेवा और रिटायरमेंट लाभ खत्म हो जाएंगे? सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में रिटायर्ड कर्मचारी को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने कहा कि तीन दशक से ज्यादा समय तक सेवा करने और अब रिटायर हो चुके कर्मचारी को उसके रिटायरमेंट और पेंशन संबंधी लाभों से वंचित करना उचित नहीं होगा। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने 3 सितंबर 2026 को मामले की सुनवाई करते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया। हालांकि कोर्ट ने कर्मचारी के 'टोकरे कोली' अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित करने के स्क्रूटिनी कमेटी के फैसले को सही माना, लेकिन उनकी लंबे समय तक की गई सेवा को देखते हुए रिटायरमेंट और पेंशन लाभ सुरक्षित रखने का आदेश दिया।

1994 में हुई थी सरकारी नौकरी

मामला मुंबई नगर निगम में कार्यरत एक जूनियर इंजीनियर (सिविल) से जुड़ा है। कर्मचारी को वर्ष 1994 में 'टोकरे कोली' अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्ति मिली थी। वह लगातार सरकारी सेवा में कार्यरत रहे। बाद में उनके जाति प्रमाणपत्र की जांच हुई और वर्ष 2020 में स्क्रूटिनी कमेटी ने प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित कर दिया। इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। इसके बाद कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश से जारी रही नौकरी

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के कारण कर्मचारी अपनी सेवा में बने रहे। इसी दौरान उन्होंने अपनी नौकरी जारी रखी और अंततः 30 जून 2025 को सेवानिवृत्त हो गए। रिटायर होने के बाद कर्मचारी ने सुप्रीम कोर्ट के सामने वैकल्पिक रूप से मांग रखी कि भले ही जाति प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित करने का फैसला बरकरार रखा जाए, लेकिन उनकी लंबी सेवा के आधार पर पेंशन और अन्य रिटायरमेंट लाभों को सुरक्षित रखा जाए। इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2024 के 'Surekha Baljorsingh Thakur v. Caste Scrutiny Committee' फैसले का भी हवाला दिया।

'तीन दशक की सेवा के बाद लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता'

सुप्रीम कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए कर्मचारी के रिटायरमेंट और पेंशन संबंधी लाभ सुरक्षित रखने का फैसला किया। कोर्ट ने गौर किया कि कर्मचारी ने 1994 में सेवा शुरू की थी और 30 जून 2025 तक नौकरी की। यानी उन्होंने तीन दशक से अधिक समय तक सेवा की। कोर्ट ने कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए यह सुनिश्चित करना उचित है कि कर्मचारी को उसके रिटायरमेंट और पेंशन लाभों से वंचित न किया जाए। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने एक ओर जाति प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित करने वाले फैसले को बरकरार रखा, वहीं दूसरी ओर लंबे समय तक सेवा कर चुके और रिटायर हो चुके कर्मचारी के पेंशन एवं अन्य रिटायरमेंट लाभों को अनुच्छेद 142 के तहत संरक्षण प्रदान किया। यह फैसला इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि जाति प्रमाणपत्र की वैधता पर प्रतिकूल फैसला आने के बावजूद हर मामले में लंबे समय तक की गई सेवा के परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, यह राहत मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर दी गई है।