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UGC Pay Scale से मनमानी नहीं कर सकती यूनिवर्सिटी, शिक्षकों के अधिकारों का सम्मान जरूरी: सुप्रीम कोर्ट
यूनिवर्सिटी शिक्षकों के वेतनमान में मनमानी नहीं कर सकती! सुप्रीम कोर्ट ने Associate Professor को बड़ी राहत देते हुए कहा—UGC और MHRD के नियमों से हटकर वेतन तय नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों के वेतनमान को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय अपने शिक्षण कर्मचारियों के लिए लागू वैधानिक नियमों और University Grants Commission (UGC) के नियमों से मनमाने तरीके से अलग नहीं हो सकते। कोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालयों को अपने शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए और उनके अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि शिक्षक बड़ी संख्या में छात्रों को ज्ञान प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह फैसला उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार में Associate Professor के पद पर नियुक्त एक शिक्षक की याचिका पर सुनाया। शिक्षक को नियुक्ति विज्ञापन में बताए गए वेतनमान के बजाय कम Pay Scale दिया गया था।
क्या था पूरा मामला?
मामला वर्ष 2016 की नियुक्ति से जुड़ा है। विश्वविद्यालय की ओर से Associate Professor पद के लिए जारी विज्ञापन में वेतनमान ₹37,400–67,000 और Annual Grade Pay (AGP) ₹9,000 स्पष्ट रूप से दर्ज था। लेकिन चयन के बाद जारी नियुक्ति पत्र में शिक्षक को ₹15,600–39,100 का वेतनमान और ₹8,000 Grade Pay दिया गया।
विश्वविद्यालय ने इसे विज्ञापन में हुई Typographical Error यानी टाइपिंग की गलती बताया। शिक्षक ने अपने वेतनमान को UGC और Ministry of Human Resource Development (MHRD) के लागू नियमों के अनुसार तय करने की मांग की।
2018 से मिला संशोधित वेतनमान
शिक्षक ने इस संबंध में विश्वविद्यालय और अन्य अधिकारियों के सामने कई बार अपनी शिकायत रखी। मामला हाईकोर्ट तक भी पहुंचा। बाद में राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि Associate Professor पद पर चयनित उम्मीदवारों को MHRD और UGC के मानकों के अनुसार ₹37,400–67,000 का Pay Band और ₹9,000 AGP मिलना चाहिए।
हालांकि, शिक्षक को यह लाभ उनकी नियुक्ति की तारीख 2016 से देने के बजाय वर्ष 2018 से दिया गया।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे शिक्षक
विश्वविद्यालय के इस फैसले से असंतुष्ट शिक्षक ने दोबारा हाईकोर्ट का रुख किया। हालांकि हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट का कहना था कि कर्मचारी विज्ञापन में हुई Typographical Error का लाभ नहीं उठा सकता। इसके बाद शिक्षक ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय MHRD और UGC के लागू नियमों के तहत निर्धारित संशोधित वेतनमान को दरकिनार नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालयों को अपने शिक्षकों के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए और वे उन नियमों एवं दिशानिर्देशों से पीछे नहीं हट सकते, जिनके तहत शिक्षकों के वेतनमान निर्धारित किए गए हैं। कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि विश्वविद्यालय MHRD की 2008 की उस पहल की अनदेखी नहीं कर सकता, जिसके तहत छठे केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के शिक्षकों तथा समकक्ष कैडर के वेतनमान में संशोधन किया गया था। इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि केवल विज्ञापन में कथित टाइपिंग की गलती का हवाला देकर किसी शिक्षक को लागू UGC/MHRD Pay Scale से वंचित नहीं किया जा सकता। फैसला विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के वेतन और उनके वैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
