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RTI में दस्तावेजों की जांच के दौरान तीसरे व्यक्ति को साथ नहीं ले जा सकते, गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
RTI को लेकर गुजरात हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों के निरीक्षण के दौरान आवेदक अपने साथ किसी तीसरे व्यक्ति को नहीं ले जा सकता। भाषा समझने के लिए बाहरी व्यक्ति की मदद की मांग भी कोर्ट ने खारिज कर दी।

सूचना के अधिकार यानी RTI Act के तहत दस्तावेजों का निरीक्षण करने वाले आवेदक को रिकॉर्ड देखने के दौरान किसी तीसरे व्यक्ति को साथ ले जाने का अधिकार नहीं है। गुजरात हाईकोर्ट ने Vala Jodhubhai Golanbhai बनाम RTI Officer मामले में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि निरीक्षण के दौरान किसी अन्य व्यक्ति को शामिल करने का मतलब उस तीसरे व्यक्ति को भी संबंधित जानकारी उपलब्ध कराना हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति में यह आशंका पैदा हो सकती है कि RTI आवेदक किसी तीसरे व्यक्ति के लिए माध्यम के रूप में काम कर रहा है, जो सूचना के अधिकार कानून के उद्देश्य के अनुरूप नहीं है।
यह मामला तब सामने आया जब RTI आवेदक ने बड़ी संख्या में उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड का निरीक्षण करने की मांग की। आवेदन की प्रकृति ऐसी थी कि मांगी गई जानकारी हासिल करने के लिए रिकॉर्ड के बड़े हिस्से को देखना जरूरी था। आवेदक ने दावा किया कि दस्तावेज जिस भाषा में हैं, उससे वह पूरी तरह परिचित नहीं है। इसलिए उसने रिकॉर्ड को समझने और अनुवाद करने के लिए तीसरे व्यक्ति की सहायता लेने की अनुमति मांगी। हालांकि संबंधित सार्वजनिक प्राधिकरण ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। प्राधिकरण का कहना था कि RTI के तहत सूचना मांगने वाला व्यक्ति स्वयं रिकॉर्ड का निरीक्षण कर सकता है, लेकिन निरीक्षण के दौरान किसी अन्य व्यक्ति को साथ लाने का अधिकार नहीं है। मामला आगे गुजरात हाईकोर्ट पहुंचा। कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या RTI Act के तहत रिकॉर्ड का निरीक्षण करने वाले व्यक्ति को अपने साथ किसी तीसरे व्यक्ति को ले जाने की अनुमति दी जा सकती है। कोर्ट ने परिस्थितियों को देखते हुए इस मांग को स्वीकार नहीं किया। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि आवेदक खुद रिकॉर्ड की भाषा या सामग्री से परिचित नहीं है और इसी कारण किसी अन्य व्यक्ति को साथ लेकर आता है, तो उस व्यक्ति को रिकॉर्ड देखने की अनुमति देना प्रथम दृष्टया उसे सूचना उपलब्ध कराने के समान होगा। कोर्ट ने आगे कहा कि तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी से यह धारणा भी बन सकती है कि RTI आवेदक किसी अन्य व्यक्ति के लिए केवल एक माध्यम या 'pawn' के रूप में कार्य कर रहा है। कोर्ट के मुताबिक यह RTI Act के उद्देश्य के अनुरूप नहीं है।
हालांकि हाईकोर्ट ने RTI आवेदक को पूरी तरह राहत से वंचित नहीं किया। कोर्ट ने संबंधित प्राधिकरण को निर्देश दिया कि आवेदक को स्वयं रिकॉर्ड का निरीक्षण करने का अवसर दिया जाए। इसके बाद आवेदक जिन दस्तावेजों की प्रतियां चाहता है, उन्हें निर्धारित प्रक्रिया और शुल्क के अधीन उपलब्ध कराया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड के निरीक्षण के दौरान आवेदक को स्वयं उपस्थित होना होगा और किसी तीसरे व्यक्ति को साथ ले जाने की अनुमति नहीं होगी। इस तरह कोर्ट ने एक तरफ RTI के तहत रिकॉर्ड देखने के आवेदक के अधिकार को बरकरार रखा, वहीं दूसरी तरफ निरीक्षण के दौरान तीसरे पक्ष की भागीदारी पर रोक लगा दी।
इस फैसले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि RTI Act के तहत नागरिकों को सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों के निरीक्षण का अधिकार प्राप्त है। लेकिन गुजरात हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस अधिकार का इस्तेमाल किसी अन्य व्यक्ति को रिकॉर्ड तक अप्रत्यक्ष पहुंच दिलाने के लिए नहीं किया जा सकता। यानी RTI के तहत जानकारी मांगने वाला व्यक्ति अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है, रिकॉर्ड देख सकता है और नियमों के अनुसार उसकी प्रतियां मांग सकता है, लेकिन निरीक्षण की प्रक्रिया में किसी तीसरे व्यक्ति को शामिल करने की मांग परिस्थितियों के आधार पर स्वीकार नहीं की जा सकती। फैसले से यह संदेश साफ है कि RTI Act पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन इसके तहत मिलने वाले अधिकारों का इस्तेमाल कानून के उद्देश्य के अनुरूप ही किया जाना चाहिए।
