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दूसरे बच्चे हैं तो भी मां की फैमिली पेंशन नहीं रोक सकते, आर्थिक रूप से सक्षम होना जरूरी: बॉम्बे हाईकोर्ट

‘दूसरे बच्चे हैं’ तो क्या मां का हक खत्म? बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ किया—अगर संतान मां को आर्थिक सहारा देने में सक्षम नहीं हैं, तो सिर्फ उनके जीवित होने के आधार पर फैमिली पेंशन से इनकार नहीं किया जा सकता।

Sonali05 सित. 2026, 06:37 PM IST
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दूसरे बच्चे हैं तो भी मां की फैमिली पेंशन नहीं रोक सकते, आर्थिक रूप से सक्षम होना जरूरी: बॉम्बे हाईकोर्ट

सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी आश्रित मां को फैमिली पेंशन देने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मृत ‘अविवाहित’ सरकारी कर्मचारी की आश्रित मां को केवल इस आधार पर फैमिली पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसके अन्य बच्चे भी जीवित हैं। अगर वे बच्चे मां को आर्थिक रूप से सहारा देने की स्थिति में नहीं हैं, तो सिर्फ उनके जीवित होने के आधार पर मां का पेंशन का अधिकार खत्म नहीं किया जा सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर सर्किट बेंच की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया। पीठ में जस्टिस मिलिंद एन. जाधव और जस्टिस नंदेश एस. देशपांडे शामिल थे। कोर्ट ने आश्रित मां के पक्ष में फैसला देते हुए फैमिली पेंशन के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।


क्या है पूरा मामला?

मामला एक ऐसे सरकारी कर्मचारी की मृत्यु से जुड़ा था, जिसकी शादी नहीं हुई थी। कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी मां ने फैमिली पेंशन का दावा किया। मां का कहना था कि वह अपने मृत बेटे पर आर्थिक रूप से निर्भर थी और उसकी मृत्यु के बाद उसके पास नियमित आय का पर्याप्त साधन नहीं था। हालांकि, पेंशन देने से इनकार करते हुए यह आधार लिया गया कि मां के अन्य बच्चे भी जीवित हैं। प्रशासन की ओर से यह तर्क सामने आया कि अन्य संतान मौजूद होने के कारण मां को पूरी तरह आश्रित नहीं माना जा सकता। इस फैसले को मां ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।


कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि केवल यह तथ्य कि आश्रित मां के अन्य बच्चे जीवित हैं, अपने आप में फैमिली पेंशन से इनकार करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि क्या अन्य संतान वास्तव में मां को आर्थिक सहायता देने की स्थिति में हैं। यदि वे स्वयं आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं या मां के भरण-पोषण का पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं करा सकते, तो केवल उनके अस्तित्व के आधार पर मां को पेंशन के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।


मां की वास्तविक आर्थिक निर्भरता देखना जरूरी

कोर्ट के फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ‘निर्भरता’ का आकलन केवल परिवार के सदस्यों की संख्या देखकर नहीं किया जा सकता। यह देखना जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में आर्थिक रूप से किस पर निर्भर था और उसकी मौजूदा आर्थिक स्थिति क्या है। यानी किसी महिला के दो या तीन बच्चे जीवित हैं, यह अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वे सभी उसका आर्थिक भरण-पोषण कर रहे हैं या करने की स्थिति में हैं।


‘अविवाहित’ सरकारी कर्मचारी की मां को राहत

मामला विशेष रूप से एक मृत अविवाहित सरकारी कर्मचारी की मां से जुड़ा था। ऐसे मामलों में कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार के आश्रित सदस्य के लिए फैमिली पेंशन महत्वपूर्ण आर्थिक सुरक्षा का माध्यम बनती है। हाईकोर्ट ने माना कि यदि मां वास्तव में मृत कर्मचारी पर निर्भर थी और उसके अन्य बच्चे आर्थिक रूप से उसका भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे केवल इस आधार पर पेंशन से वंचित करना उचित नहीं होगा कि उसके अन्य बच्चे मौजूद हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के आश्रित माता-पिता के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने साफ कर दिया कि फैमिली पेंशन के दावे पर फैसला करते समय केवल पारिवारिक स्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक आर्थिक निर्भरता और परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना होगा। इस फैसले से यह सिद्धांत सामने आया कि किसी आश्रित मां का वैधानिक लाभ केवल इसलिए नहीं छीना जा सकता कि उसके दूसरे बच्चे जीवित हैं, खासकर तब जब वे बच्चे उसके आर्थिक भरण-पोषण में सक्षम नहीं हों।