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नाबालिग से जुड़े POCSO केस में समझौता भी नहीं चलेगा, बालिग होने के बाद भी FIR रद्द नहीं कर सकता हाईकोर्ट: सिक्किम HC
POCSO केस में समझौते की गुंजाइश पर सिक्किम हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि घटना के वक्त अगर सर्वाइवर नाबालिग थी, तो मुकदमे के दौरान उसके बालिग होने और आरोपी के साथ समझौता करने से POCSO की आपराधिक कार्यवाही खत्म नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे गंभीर अपराध को महज निजी समझौते के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता।

गंगटोक:
सिक्किम हाईकोर्ट ने POCSO मामलों को लेकर एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि नाबालिग से जुड़े यौन अपराध के मामले में आरोपी और पीड़िता के बीच बाद में हुआ समझौता आपराधिक कार्यवाही खत्म करने का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने कहा कि अगर घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी और मुकदमे के दौरान वह बालिग हो गई, तब भी केवल आपसी समझौते के आधार पर POCSO की कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती। जस्टिस भास्कर राज प्रधान ने कहा कि यदि आरोपी और अब बालिग हो चुकी सर्वाइवर के बीच समझौता हो भी जाए, तब भी हाईकोर्ट CrPC की धारा 482 या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अभियोजन को सिर्फ समझौते के आधार पर खत्म नहीं कर सकता।
17 साल की उम्र में हुई थी कथित घटना
यह मामला गंगटोक के सदर पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR से जुड़ा था। आरोप था कि 26 नवंबर 2022 को जब कथित घटना हुई, उस समय सर्वाइवर की उम्र 17 वर्ष थी। आरोपी की उम्र उस समय करीब 19 वर्ष बताई गई। मामले में आरोपी के खिलाफ POCSO Act के तहत अपराध के साथ-साथ IPC की धारा 376 के तहत भी कार्रवाई शुरू की गई थी। मुकदमा आगे बढ़ने के दौरान दोनों परिवारों के बीच समझौता हो गया। इस बीच सर्वाइवर बालिग हो चुकी थी। समझौते के आधार पर आपराधिक कार्यवाही खत्म करने की मांग हाईकोर्ट के सामने रखी गई।
कोर्ट ने क्यों नहीं माना समझौता?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO Act का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से विशेष सुरक्षा प्रदान करना है। जब कथित अपराध के समय पीड़िता कानून की नजर में बच्ची थी, तो बाद में उसकी उम्र बढ़ जाने से अपराध की प्रकृति नहीं बदल जाती। कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या आरोपी और सर्वाइवर के बीच हुए समझौते तथा सर्वाइवर के बालिग हो जाने के आधार पर हाईकोर्ट अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर सकता है। कोर्ट ने इसका जवाब स्पष्ट रूप से नकारात्मक दिया।
बाद में बालिग होने से घटना के समय की उम्र नहीं बदलेगी
अदालत की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी सर्वाइवर का मुकदमे के दौरान 18 वर्ष की उम्र पार कर लेना उस समय की कानूनी स्थिति को खत्म नहीं करता, जब कथित अपराध हुआ था। यानी यदि अपराध के समय पीड़ित बच्ची थी और मामला POCSO Act के तहत दर्ज हुआ, तो बाद में बालिग होने या आरोपी के साथ समझौता करने से POCSO की कार्यवाही स्वतः समाप्त नहीं हो सकती।
हाईकोर्ट की शक्ति पर भी अहम टिप्पणी
जस्टिस भास्कर राज प्रधान ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट की CrPC की धारा 482 के तहत अंतर्निहित शक्तियां और संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अधिकार असीमित नहीं हैं। इन शक्तियों का इस्तेमाल कानून द्वारा संरक्षित बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के अभियोजन को महज निजी समझौते के आधार पर समाप्त करने के लिए नहीं किया जा सकता। यह फैसला POCSO मामलों में समझौते की कानूनी सीमा को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि ऐसे अपराध केवल आरोपी और पीड़ित के बीच निजी विवाद नहीं हैं, बल्कि बच्चों के खिलाफ गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं।
