नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2026 के पहले सप्ताह में हत्या के तीन अलग-अलग मामलों में निचली अदालतों और हाईकोर्ट की दोषसिद्धियों को पलट दिया। इन मामलों में एक छह साल के बच्चे की हत्या, दिनदहाड़े हुई हत्या और फिरौती के लिए अपहरण के बाद हत्या का मामला शामिल था। तीनों मामलों की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने एक समान समस्या उभरकर आई—अभियोजन पक्ष आरोपियों का अपराध संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। इन फैसलों ने आपराधिक मामलों में पुलिस जांच की गुणवत्ता, घटनास्थल से वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने और अभियोजन की ओर से उन साक्ष्यों को अदालत के सामने मजबूती से पेश करने के महत्व को फिर रेखांकित किया है।
दिनदहाड़े हत्या के मामले में पुलिस जांच पर सवाल
1 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने Dhrub Singh Etc. v. State of Bihar मामले में छह आरोपियों की हत्या की दोषसिद्धि रद्द कर दी। मामला 2017 के चुनाव के दिन बिहार में कथित दिनदहाड़े हुई हत्या से जुड़ा था। अभियोजन का आरोप था कि आरोपियों ने अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन की कहानी को मजबूत करने वाले कई महत्वपूर्ण भौतिक साक्ष्य जांच के दौरान सामने नहीं आए।
घटनास्थल से कारतूस तक बरामद नहीं हुए
कोर्ट ने खास तौर पर इस बात को गंभीर माना कि पुलिस घटनास्थल से कथित गोलीबारी के कारतूस बरामद नहीं कर सकी। इतना ही नहीं, कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए हथियार भी बरामद नहीं हुए। इसके अलावा घटनास्थल से जुटाई गई खून से सनी मिट्टी को भी रासायनिक जांच के लिए नहीं भेजा गया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जब अभियोजन का पूरा मामला गोलीबारी और आरोपियों की कथित भूमिका पर आधारित हो, तब ऐसे महत्वपूर्ण साक्ष्यों का अभाव अभियोजन की कहानी में गंभीर संदेह पैदा करता है।
'संदेह' के आधार पर नहीं हो सकती सजा
आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता जब तक अभियोजन उसका अपराध उचित संदेह से परे साबित न कर दे। सुप्रीम कोर्ट ने इसी कसौटी को लागू करते हुए पाया कि मामले में मौजूद कमियों को नजरअंदाज करके दोषसिद्धि कायम रखना उचित नहीं होगा। अदालत के फैसले का संदेश साफ है कि केवल आरोप, परिस्थितियां या कमजोर जांच के आधार पर किसी व्यक्ति को हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन को अदालत के सामने भरोसेमंद, ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य पेश करने होंगे।
तीन मामलों में सामने आया एक ही सवाल
सितंबर के पहले सप्ताह में जिन तीन हत्या मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धियां पलटीं, वे अपराध की प्रकृति के लिहाज से अलग-अलग थे। लेकिन सभी में अभियोजन की ओर से आरोपियों का अपराध संदेह से परे साबित करने में गंभीर कमी सामने आई। इन फैसलों से पुलिस जांच की प्रक्रिया पर भी बड़ा सवाल खड़ा होता है। घटनास्थल से भौतिक साक्ष्य की बरामदगी, हथियारों की रिकवरी, वैज्ञानिक जांच और साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में हुई छोटी सी चूक भी गंभीर आपराधिक मुकदमे में अभियोजन के पूरे मामले को कमजोर कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि हत्या जैसे गंभीर अपराध में भी दोषसिद्धि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर नहीं हो सकती। पुलिस की जांच मजबूत, वैज्ञानिक और निष्पक्ष होनी चाहिए तथा अभियोजन को प्रत्येक महत्वपूर्ण कड़ी को विश्वसनीय साक्ष्य से जोड़ना होगा।